...is "Celebrating (un)Common Creativity!" Fan fiction, artworks, extreme genres & smashing the formal "Fourth wall"...Join the revolution!!! - Mohit Trendster
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Saturday, November 19, 2016
Thursday, August 4, 2016
Podcast: Views on Antiziganism/Antigypsyism (Hindi) - Mohit Trendster
दुनिया भर में फैले रोमा, सिंटी समुदाय (जिन्हें जिप्सी भी कहा जाता है), के साथ सदियों से हो रहे भेदभाव और अत्याचार पर मेरे कुछ विचार। इस समस्या से जुड़े कुछ और मुद्दे आगे रखने की कोशिश करूँगा। इस से पहले रोमा लोगो पर "सभ्य रोमानी" बंजारा और "उदार प्रयोग" नामक 2 कहानियां लिखा चुका हूँ। - मोहित शर्मा ज़हन
Location:
India
Wednesday, January 22, 2014
Netaji Tribute Ghulam-e-Hind (Vibhuti Dabral & Mohit Trendster)
A tribute to Netaji Subhas Chandra Bose
with Artist Mr. Vibhuti Dabral
"Bose's arrest and subsequent release set the scene for his escape to Germany, via Afghanistan and the Soviet Union. A few days before his escape, he sought solitude and on this pretext avoided meeting British guards and grew a beard on the night of his escape, he dressed as a Pathan to avoid being identified. Bose escaped from under British surveillance at his house in Calcutta. On 19 January 1941, accompanied by his nephew Sisir K. Bose in a car that is now on display at his Calcutta home."
Wrote Biographical Ghazal on him last year
"वो कोई पीर रहा होगा ..."
ग़ुलामी के साये मे जो आज़ाद हिन्द की बातें करता था ...
किसी दौर मे खून के बदले जो आज़ादी का सौदा करता था ...
बचपन मे ही स्वराज के लिये अपनों से दूर हुआ होगा ...
बस अपनी सोच के गुनाह पर जो मुद्दतों जेल गया होगा ...
वो कोई पीर रहा होगा ....
क्या बरमा ...अंडमान ..
क्या जर्मनी ...जापान ...
शायद ये जहाँ था उसके लिए छोटा ...
किसी दौर ने गोरो पर बंगाली जादू चढ़ते देखा होगा ..
फरिश्तो ने जिसका सजदा किया होगा ....
वो कोई पीर रहा होगा ....
अंदर सरपरस्त साधू .... बाहर पठान का चोगा ...
खुद की कैद को उसने अपनी रज़ा पर छोड़ा था ..
अंग्रेजो की आँखों का धोखा ....
कहाँ ऐसा हिन्द का हमनवां होगा ..
वो कोई पीर रहा होगा ...
जहान को कुछ बताने ..रविन्द्र सी ग़ज़ल सुनाने ...
या शायद धूप-छाँव का हिसाब करने ज़मी पर यूँ ही आ गया ..
न उसके आने का हिसाब था ..और न जाने का ...
और कहने वाले कहते है वो 1945 के आसमां मे फ़ना हो गया ...
काश रूस पर सियासी बर्फ़ न जमा होती ...
अगर ये बात सच होती तो अनीता-एमिली की आँखों ने दगा दिया होगा ...
गाँधी से जीतकर भी जिसने महात्मा को जिया होगा ...
वो कोई पीर रहा होगा ...
वाकिफ जिंदगी मे जो कभी रुक न सका ....
गुमनामी मे दरिया पार किया होगा ...
दूर कहीं या पास यहीं कितनी मायूसी मे मुल्क को जीते-मरते देखा होगा ...
आज़ाद होकर अपने ज़हन से दूर हुआ होगा ...
वो कोई पीर रहा होगा...
वो कोई पीर रहा होगा...
- Mohit Sharma (Trendster)
Monday, December 23, 2013
Tuesday, November 5, 2013
Rooh Ghulam-e-Hind Deewani (रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी) - Tribute Poetry
Dedicated to Kargil War Heroes! (1999)
16 October 2013
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी,
सजी दुलहन सी बने सयानी।
फसलों की बहार फिर कभी ....
गाँव के त्यौहार बाद में ...
मौसम और कुछ याद फिर कभी ....
ख्वाबो की उड़ान बाद में।
मांगती जो न दाना पानी,
जैसे राज़ी से इसकी चल जानी?
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी।
वाकिफ है सब अपने जुलेखा मिजाज़ से,
मकरूज़ रही दुनिया हमारे खलूस पर,
बस चंद सरफिरो को यह बात है समझानी,
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी।
वक़्त की धूल ज़हन से झाड़,
शिवलिंग से क्यों लगे पहाड़?
बरसो शहादत का चढ़ा खुमार,
पीढ़ियों पर वतन का बंधा उधार,
काट ज़ालिम के शीश उतार।
बलि चढ़ा कर दे मनमानी,
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी।
यहीं अज़ान यहीं कर कीर्तन,
यहीं दीवाली और मोहर्रम,
मोमिन है सब बात ये जानी,
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी।
काफिर कौन बदले मायने,
किसी निज़ाम को दिख गए आईने।
दगाबाज़ जो थे ....चुनिन्दा कर दिये,
आड़ लिए ऊपर दहशत वाले ...कुछ दिनों मे परिंदा कर दिये।
ज़मीन की इज्ज़त लूटने आये बेगैरत ....
जुम्मे के पाक दिन ही शर्मिंदा हो गये।
बह चले हुकुम के दावे सारे ....जंग खायी बोफोर्स ....
छंट गया सुर्ख धुआं कब का....दब गया ज़ालिम शोर ....
रह गया वादी और दिलो में सिर्फ....Point 4875 से गूँजा "Yeh Dil Maange More!!"
ज़मी मुझे सुला ले माँ से आँचल में ....और जिया तो मालूम है ...
अपनी गिनती की साँसों में यादों की फांसे चुभ जानी ...
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी।
- Mohit Sharma (Trendster / Trendy Baba)
Friday, January 25, 2013
वो कोई पीर रहा होगा... (Netaji Subash Chandra Bose Tribute)
A Tribute to Netaji Subash Chandra Bose
ग़ुलामी के साये मे जो आज़ाद हिन्द की बातें करता था ...
किसी दौर मे खून के बदले जो आज़ादी का सौदा करता था ...
बचपन मे ही स्वराज के लिये अपनों से दूर हुआ होगा ...
बस अपनी सोच के गुनाह पर जो मुद्दतों जेल गया होगा ...
वो कोई पीर रहा होगा ....
क्या बरमा ...अंडमान ..
क्या जर्मनी ...जापान ...
शायद ये जहाँ था उसके लिए छोटा ...
किसी दौर ने गोरो पर बंगाली जादू चढ़ते देखा होगा ..
फरिश्तो ने जिसका सजदा किया होगा ....
वो कोई पीर रहा होगा ....
अंदर सरपरस्त साधू .... बाहर पठान का चोगा ...
खुद की कैद को उसने अपनी रज़ा पर छोड़ा था ..
अंग्रेजो की आँखों का धोखा ....
कहाँ ऐसा हिन्द का हमनवां होगा ..
वो कोई पीर रहा होगा ...
जहान को कुछ बताने ..रविन्द्र सी ग़ज़ल सुनाने ...
या शायद धूप-छाँव का हिसाब करने ज़मी पर यूँ ही आ गया ..
न उसके आने का हिसाब था ..और न जाने का ...
और कहने वाले कहते है वो 1945 के आसमां मे फ़ना हो गया ...
काश रूस पर सियासी बर्फ़ न जमा होती ...
अगर ये बात सच होती तो अनीता-एमिली की आँखों ने दगा दिया होगा ...
गाँधी से जीतकर भी जिसने महात्मा को जिया होगा ...
वो कोई पीर रहा होगा ...
वाकिफ जिंदगी मे जो कभी रुक न सका ....
गुमनामी मे दरिया पार किया होगा ...
दूर कहीं या पास यहीं कितनी मायूसी मे मुल्क को जीते-मरते देखा होगा ...
आज़ाद होकर अपने ज़हन से दूर हुआ होगा ...
वो कोई पीर रहा होगा...
वो कोई पीर रहा होगा...
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