...is "Celebrating (un)Common Creativity!" Fan fiction, artworks, extreme genres & smashing the formal "Fourth wall"...Join the revolution!!! - Mohit Trendster
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Sunday, February 14, 2021

जैसे वे कभी थे ही नहीं...(लघुकथा)

जॉली जीत और बॉबी जीत, सफल फिल्मकार भाइयों की जोड़ी थी। दोनों कुल 57 फ़िल्में बना चुके थे। जॉली की मृत्यु हुई तो बॉबी का रचनात्मक सफर भी खत्म हो गया। अब सिर्फ़ किसी अवार्ड समारोह, टीवी शो में मेहमान के तौर पर बॉबी साल में 2-4 बार लोगों के सामने आता था।

उनके पुराने नौकर ने ड्राइवर से कहा - "जॉली सर के जाने के बाद बॉबी सर के इंटरव्यू बदल गए हैं।"

ड्राइवर - "मैंने इतना ध्यान नहीं दिया...शायद गम में रहते होंगे, बेचारे।"

नौकर - "नहीं, जॉली सर के ज़िंदा रहते हुए, इन दोनों की फ़िल्मों पर बात करते समय बॉबी सर बारीकी से बताते थे कि जॉली सर ने किसी फ़िल्म में क्या-क्या और कितना अच्छा काम किया था। अब उनके इंटरव्यू में वह बारीकी सिर्फ़ अपने लिए रह गई है। जैसे..."

ड्राइवर - "जैसे?"

नौकर किसी के पास न होने पर भी दबी आवाज़ में बोला - "...जैसे जॉली सर कभी थे ही नहीं।"

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#ज़हन

Image by Daniel Frank

Tuesday, December 3, 2019

बहस-नेटर: हर बहस का अंत (कहानी)


प्रकाश अपनी सोशल मीडिया इमेज को लेकर बड़ा सजग रहता था। उसका मानना था कि जीवन में कोई भूल-चूक हो जाए तो चलता है पर इंटरनेट की आभासी दुनिया के प्रवासियों के सामने ज़रा सी भी कोताही नहीं। उसे कौनसे महान लोग या घटनाएं प्रेरणा देते हैं, कौनसी बातों और रुचियों को वह फॉलो करता है...सोशल मीडिया साइट्स पर सब नपा तुला दर्शाना। आभासी दुनिया के किसी मुद्दे पर अगर किसी दूसरे इंसान का मत उससे अलग हुआ प्रकाश झल्ला जाता था लेकिन अब सोशल मीडिया पर 'बड़प्पन' का नाटक भी करना है। इस कारण वह ऐसे दिखाता जैसे उसे फर्क नहीं पड़ा और वह इन बातों से ऊपर है। सामान्य बहस होने पर पहले वह कुछ ख़बरों, लेख वगैरह के लीक से हटकर और ढाई किलोमीटर लंबे लिंक लेकर आता। उसका मकसद सामने वाले इंसान को समझाने के बजाय तुरंत उसके हथियार डलवाना होता था ताकि उसका फैनबेस उसपर शंका न करे।  
इस बीच प्रकाश के खास गुर्गे उसका गुणगान कर देते, टिप्पणियों पर पसंद और दिल चिपका देते, वहीं प्रकाश से अलग विचार वाले इंसान की टिप्पणियों पर मज़ाक उड़ाती बातें और इमोजी डाल देते। ऐसे में वह मुद्दा पढ़ने वाले लगभग सभी अपने-आप प्रकाश को सही और दूसरे व्यक्ति को बचकाना मान लेते। ऐसी सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लेकर वह न जाने कितने लोगों को ब्रेनवाश करता।

फिर भी बात न बनती तो अंत में वह बह्रमास्त्र छोड़ता - "तुम इस फील्ड की बात कर रहे हो...क्या इस क्षेत्र से जुड़ी तुमने फलाना-फलाना कुछ किताबें पढ़ी भी हैं जो तुम 'मुझसे' (जिसको इतना ज्ञान है) से बहस करने की हिम्मत कर रहे हो?"

मुख्य विषयों और बातों की सबसे चर्चित कुछ दर्जन किताबें वह वाकई घोट कर पी चुका था। इनके अलावा दूसरी कई किताबों का सार पढ़ने में प्रकाश की गहरी रुचि थी। ज़ाहिर है सीखने के लिए कम और धौंस जमाने या आगे किसी बहस-'शो ऑफ' में स्टाइल झाड़ने के लिए ज़्यादा। सतही मेहनत के महल को पक्का बनाए रखने के लिए वह एक काम और करता। प्रकाश किसी से बहस या उसका मज़ाक उड़ाने से पहले जांच लेता था कि कहीं सामने वाला इस क्षेत्र का बड़ा ज्ञानी तो नहीं। अगर हाँ तो घुमा-फिरा कर और ध्यान बंटाकर विषय बदल देता या उस व्यक्ति को दूसरे क्षेत्र की बहस में लाने की कोशिश करता।

एक दिन प्रकाश की बहस इंजीनियरिंग कर रहे लड़के प्रवीण से हुई। बहस एक राज्य की राजनीती पर थी। प्रकाश को अपने जीतों की सूची में एक आसान जीत और दिख रही थी। लड़के ने प्रकाश की बात से अलग पक्ष रख उसकी शान में गुस्ताख़ी कर दी थी...सज़ा तो बनती थी। बात बढ़ती गई और प्रकाश ने अपने सारे पैंतरे आज़माए। कई लोग प्रकाश की तरफदारी करने आए और प्रवीण के कुछ साथी छात्रों ने उसका समर्थन किया। अंत में प्रकाश ने उस राज्य की राजनीती पर 5-7 मशहूर किताबों और कुछ शोध कार्यों का ज़िक्र किया। जवाब में प्रवीण ने अपनी पढ़ी, सुनी-देखी हुई सामग्री की बात कही....लेकिन असंगठित लेख आदि चाहे जितनी संख्या में हों...कहाँ मशहूर पुस्तकों के आगे टिक पाते। (ऐसा प्रकाश और आभासी दुनिया के कई लोगों का मानना था) अति आत्मविश्वास में प्रकाश ने यह भी स्वीकार लिया कि उस राज्य पर उसने इतना ही पढ़ा है और यह उन 'बच्चों' के सामने आई सामग्री से कहीं ज़्यादा महत्व रखता है। 

"अच्छी बात है, सर। हाल ही में मद्रास यूनिवर्सिटी और कोंकण यूनिवर्सिटी के साझा प्रयास से सबके इस्तेमाल के लिए मुफ़्त 'बहसनेटर' नामक सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है। इसमें दो या ज़्यादा पक्षों के तर्क के पीछे जानकारी के सभी स्रोतों की निष्पक्षता और जानकारी के स्तर की तुलना की जाती है।"

प्रकाश ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी। उसने जवाब दिया - "ऐसा नहीं हो सकता...किसी भी क्षेत्र में ज्ञान और जानकारी की कोई सीमा नहीं होती। तो फिर कौन ज़्यादा और कौन कम?"

प्रवीण को ऐसे सवाल की ही उम्मीद थी - "सहमत हूँ, वैसे तो किसी भी क्षेत्र में जानकारी की कोई सीमा नहीं पर किसी विषय पर दो पक्षों को तुलनात्मक रूप से कितनी जानकारी पता है और उसमें से कितनी सही, गलत या विवाद करने लायक है का एक अंदाज़ा लगता है, नतीजे में 5-10 प्रतिशत का अंतर हो सकता है पर ज़्यादा नहीं।"

प्रकाश का धैर्य टूट रहा था - "हाँ, तो यह सब मुझे क्यों बता रहे हो?"

प्रवीण - "आपकी बताई किताबों, शोध आदि को एक पक्ष में रखा और हमारे बताए गए लेख, वीडियो आदि सामग्री दूसरे पक्ष में...सॉफ्टवेयर से मिला रिजल्ट यह है कि इस विषय पर आपके पक्ष की तुलना में हमारे पक्ष के पास 79.2% ज़्यादा जानकारी है। हाँ, संभव है कि इस सॉफ्टवेयर में कमियां हों पर यहाँ 20-30 नहीं बल्कि लगभग 80% का अंतर दिख रहा है। आपको बाकी विषयों की जानकारी होगी पर यहाँ तो कम से कम चुप ही रहें। 

एक आखिरी बात और क्योंकि मैंने आपका ऑनलाइन ढोंग काफी समय से देखा है। मुझे पता है इसके बाद आप मेरा और मेरे दोस्तों का मज़ाक उड़ाएंगे, इस सॉफ्टवेयर को हवाई बताएंगे और अपने खलिहर फॉलोअर्स से हमें बुली करवाएंगे। आप यहाँ ही नहीं रुकेंगे कुछ दिन बाद आप इस विषय पर अपनी बात को सही साबित करते हुए लंबी पोस्ट लिखेंगे और उसके फॉलो-अप में बातें लिखते रहेंगे क्योंकि आप तो कभी गलत नहीं हो सकते। आप तो फ़रिश्ते पैदा हुए हो जो आज तक किसी भी विषय में कमतर या गलत साबित नहीं हुआ। किताबें पढ़ना अच्छी बात है पर उसके बाद आप जो ओछी हरकतें करते हैं वह सब गुड़ गोबर कर देती हैं। मेरी बस एक सलाह है, खुद को सही मानें पर फालतू की आत्ममुग्धता से बचें। सामने वाला इंसान कुछ कह रहा है तो पहले उसकी बात को समझें। कोई विपरीत पक्ष आने पर आप उस इंसान की बात को ऐसे नकारते हैं जैसे वह परसों पैदा हुआ हो। जिन वेबसाइट जैसे रेडिट, क्वोरा आदि का हमनें हवाला दिया है वहां अनगिनत मुद्दों पर तो करोड़ो शब्दों की सामग्री पड़ी है जिसमें से सब नहीं तो लाखों शब्द काम के हैं और दर्जनों किताबों के बराबर हैं। किसी ने अगर असंगठित जगहों से थोड़ी-थोड़ी जानकारी ली है तो इसका यह मतलब नहीं कि उसे 'कुछ' पता ही नहीं। हो सकता है उसके थोड़े-थोड़े दशमलव जुड़कर आपके एक जगह के चौके-छक्के से कहीं ज़्यादा हो जाएं। मैं देखना चाहूंगा कि बहसनेटर पर आप और सोशल मीडिया पर ज्ञान की दुकान खोले बैठे कई लोग बाकी विषयों में कितने पानी में हैं। आपकी प्रोफाइल मैंने हैक कर ली है...घबराएं नहीं कोई गलत इस्तेमाल नहीं करूंगा पर पिछले कुछ महीनों के आपके स्टंट बहसनेटर पर तोलकर आपकी सभी सोशल मीडिया प्रोफाइलों पर आपके नाम से ही डाल रहा हूँ। आगे दोबारा नौटंकी की कोशिश की तो फिर से प्रोफाइल हैक करके ऐसा करूंगा। पुलिस को ज़रूर बताएं...मुझे आपके इनबॉक्स में मिली सामग्री की कसम आपसे कम ही सज़ा होगी। इस बहस से जुड़े और बाकी 'काम के' सारे स्क्रीनशॉट ले लिए हैं। धन्यवाद!"

प्रकाश का उसी के खेल में शिकार हो चुका था। उसका आभासी स्टारडम और दिमाग अपनी जगह पर आ गए।

समाप्त!

#ज़हन

Monday, July 9, 2018

कुबोध (कहानी) #ज़हन


इंटरनेट क्रांति के बाद समान विचार, व्यवसाय और रुचियों वाले लोग काफी करीब आ गये थे। जहाँ किसी और दौर में अनमोल जैसे नये लेखक के लिए स्थापित साहित्यकारों से बात करना सपना होता वहीं अब सोशल मीडिया पर रोज़ बड़े नामों से बातचीत हो जाया करती थी। कुछ बातें लंबी खींच जाती तो कुछ थोड़े शब्दों में निपट जाती। कुछ बड़े नामों को सोशल मीडिया की लत लग गयी थी...पर समस्या यह थी कि वे बड़े नाम थे। अब पूरा दिन ऑनलाइन भी रहना था और आम जनता के लिए खुद को व्यस्त भी दिखाना था। उनकी प्रोफाइल व अक्सर साझा की गयी जानकारी बड़ी अच्छी लगती। ऐसा लगता जैसे हर बात, हर पोस्ट-अपडेट में बड़ा समय दिया गया है। ऐसे ही एक 'कुछ बड़े' सज्जन सुबोध दिखाते कि उन्हें अपनी ऑनलाइन छवि का कोई फर्क नहीं पड़ता पर नामचीन लोगों-कलाकारों के साथ उनकी तस्वीरें, उनको टैग करती लंबी पोस्ट्स देखकर लगता कि उनके सबसे बड़े राज़दार तो सुबोध साहब हैं। मानो अपने सोशल मीडिया के लिए उन्होंने अलग से पी.आर. (जनसंपर्क) अधिकारी रखा हुआ हो। सुबोध की ऑनलाइन जगमगाहट से आकर्षित अनमोल अक्सर उनकी तस्वीरों, बातों और पोस्ट्स पर अपने विचार रखता पर उसे कोई जवाब नहीं मिलता। जबकि सुबोध की बातों पर इतना मज़मा नहीं होता था कि वे कभी अनमोल से बात तक ना कर पायें। उनसे कहीं बड़े और व्यस्त लोग अनमोल की बातों से प्रभावित होकर उससे चर्चा करते रहते थे।

"व्यस्त लेखकों के पास कहाँ समय होता होगा कि सबको जवाब दें।"

ऐसा सोचकर अनमोल बात भूल गया। कई वर्षों तक गाहे बगाहे सुबोध की ऑनलाइन गतिविधि देखने के बाद अनमोल ने गौर किया कि सुबोध अपने साथ काम करने वालों और अपने स्तर से ऊपर के कलाकारों पर ही ध्यान देते हैं....या अगर कोई किसी कारणवश देश या विदेश की ख़बरों में आया हो। अनमोल जैसे बहुत से लोग सुबोध को दिखते नहीं थे। 

अनमोल अपनी रिटेल नौकरी करते हुए लिखता रहा और उसके एकसाथ 3 उपन्यास प्रकाशित हुए। अनमोल जल्द ही बाजार में 'बड़ा नाम' बन गया और उसकी किताबों के अधिकार एक नामी फिल्म निर्माता ने खरीद लिए। खबर आते ही सुबोध का रडार गड़गड़ाया और उन्होंने अनमोल को टैग करते हुए उसकी मेहनत, लगन, फलाना-ढिमका पर ढाई किलोमीटर की पोस्ट कर दी। वह जनता को दिखा रहे थे कि "देखो, मैं एक और बड़े नाम -अनमोल को जानता हूँ।" अनमोल ने सुबोध की पोस्ट की बातें पढ़ी और "भक!" बोलकर...उन्हें ब्लॉक कर मन की शान्ति पायी। 

समाप्त!
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Thursday, April 5, 2018

झूठी भावना पर सच्चा आशीर्वाद (कहानी) #ज़हन

Artwork #WIP by Esmeralda Platania‎

सोशल मीडिया स्टार रूपल के पास कोई ख़ास हुनर नहीं था। अपनी तस्वीरें, निजी ज़िंदगी इंटरनेट के माध्यम से दुनिया को परोसने के बदले में कुछ नाम और पैसा मिल जाया करता था। वैसे उसके कई हज़ार फॉलोवर्स थे पर यहाँ "कुछ" का मतलब उसके जैसी बिना हुनर वाली बड़ी हस्तियों के मुक़ाबले काफी कम। फिर भी स्थानीय स्तर पर उसका अच्छा काम चल जाता था। भावनात्मक मुद्दों पर इंटरनेट से काट-छांट कर बनी उसकी बातें, कई सामाजिक कैंपेन की आड़ लेकर अपने पब्लिसिटी कैंपेन चलाना आदि रूपल की खूबी थी। रूपल की माँ श्रीमती सुनैना लिवर कैंसर से पीड़ित थी। पिछले कई हफ़्तों से वह इस लिवर कैंसर की पोस्ट्स से लोगो की सहानुभूति का लिवरेज ले रही थी। ऐसी भावनात्मक बातों पर आम बातों, फोटोज़ से कहीं ज़्यादा प्रतिक्रिया आती थी। इस वजह से आभासी दुनिया में रूपल के "प्रशंसकों" की संख्या तेज़ी से बढ़ रही थी। रूपल को जब पता चला कि उसकी माँ की बीमारी गंभीर हो चली है और वें अब कुछ ही दिनों की मेहमान हैं तो वह चिंता में पड़ गयी। इधर सुनैना अपनी बच्ची को दिलासा दे रहीं थी कि उनके बिना भी इतना कुछ है दुनिया में वह किसी बात की चिंता ना करे। यहाँ रूपल की चिंता सुनैना की सोच से कुछ अलग थी। 

दो दिन बाद ही सुनैना ने नींद में दुनिया छोड़ दी पर शायद उनकी आत्मा में दुनियादारी का मोह बचा था। इस कारण अपने परिजनों को देखने और उनके मन में झाँकने को रुक गयीं। सब जगह से अच्छी-बुरी यादें, अपनों के मन की बातें टटोल कर आखिर में सुनैना की आत्मा रूपल के पास पहुँची। 

"रो नहीं रही है? ज़रूर सदमा लग गया है बेचारी को! हे भगवान! मेरी लाली ने गुम चोट की तरह अपने ग़म को मन में दबा लिया। ज़रा मन में तो झाँकू इसके..."

रूपल के मन में दंगे चल रहे थे....

"क्या यार! थोड़े दिन बाद नहीं जा सकती थी मम्मी? इतना मटेरियल जमा कर रखा था मैंने....थोड़ा-थोड़ा करके ऑनलाइन डालती। अब खुद उनकी डेथ की अपडेट नहीं कर सकती...सब कहेंगे मातम की जगह नौटंकी कर रही हूँ। काश रश्मि, प्रियंका लोग आ जायें तो वो तो अपनी फोटोज़, अपडेट्स में टैग-मैंशन कर ही देंगी...उनकी फॉलोइंग भी अच्छी है।"

बेटी की नादानी पर सुनैना मुस्कुरा उठी। किसी माँ को अपने बच्चों पर गुस्सा आता ही कहाँ है? जाते-जाते माँ ने रूपल की इच्छा पूरी कर दी...समूह में रूपल की माँ की मौत वाली खबर फैलने से 2-4 नहीं बल्कि दर्जनों रूपल जैसी सोशल मीडिया हस्तियां 'सांत्वना' की कैंडी लेकर उसके घर पहुँची। उस दिन सौइयों फोटो में दिख रही रूपल और उसके दुख की सुनामी में इंटरनेट बह गया। एक घटना से रूपल के इंटरनेट वाले आभासी जानकारों की गिनती लाखों-करोड़ों में पहुँच गयी...माँ का आशीर्वाद जो साथ था।

समाप्त!
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Thursday, March 8, 2018

भूमिका या परिणाम? #ज़हन


परिचय में एक व्यापारी हैं जो फिल्मों, साहित्य में रूचि लेते हैं। वो एक स्थानीय फिल्म बना रहे हैं जिसमें खुद ही हीरो बन गये हैं। उन्होंने ये भी एलान किया है कि अभी इस क्रम में अपनी सोची कहानियों पर कुछ फिल्में और करेंगे, जिनमें भी वो खुद ही नायक होंगे। साथ वाले बहुत से चाटुकार खुश हैं कि लंबे समय का आसान रोज़गार मिल गया है। इन्ही व्यापारी सज्जन के शहर में मौकों की तलाश में हज़ारों थिएटर अभिनेता, लेखक, कलाकार घिसटते हुए जीवन व्यतीत कर रहे हैं....लेकिन हर विधा का हीरो तो साहब को खुद बनना है। यहाँ एक और ध्यान देने वाली बात है कि "हर विधा" मतलब ग्लिटर वाली-चमकदार शेखी बघारने लायक विधा, बाकी लाइटिंग, साउंड आदि नहीं। 

अपने जीवन की फिल्म में हर कोई मुख्य किरदार में होता है। समय के साथ उसे अपनी क्षमताएं, सीमाएं पता चलती हैं और उनके अनुसार वह जीवन जीता है। किन्ही बातों और अवसर पर उसका नायक का किरदार जँचता है पर बाकी अधिकतर जगहों पर उसका नायक के रोल में आना अटपटा लगता है। अनगिनत समीकरणों से बनी दुनिया में बहुत भीड़ है और प्रकृति सभी को भिन्न-भिन्न बातों में नायक बनने के अवसर देती है। ऐसा हो सकता है कि कोई सामान्य से अधिक जगहों पर नायक बना अच्छा लगे पर अपने मन में ये ग़लतफ़हमी पालकर हर जगह ज़बरदस्ती मुख्य रोल में घुसना गलत है। तो हीरो बनने चले इन व्यापारी सज्जन के साथ होगा ये कि इनकी फिल्म इनके परिचय तक सिमट कर रह जायेगी। हाँ, अगर ये अपने अनुभव और हुनर वाले रचनात्मक काम करते हुए अन्य कामों का ज़िम्मा अपने-अपने क्षेत्र के महारथीयों को देते तो इनका इतना पैसा लगाना सार्थक होता और फिल्म के व्यावसायिक रूप से हिट होने की सम्भावना भी बढ़ जाती। 

कुछ दशमलव प्रतिशत में ऐसे प्रयोग चल सकते हैं पर उन अपवादों में वाकई अनेक हुनर होते हैं जो दूसरों को बिना बताये दिख जाते हैं। हर जगह हीरो/हीरोइन बनने के पीछे ये दंभ होता है कि "हमें तो ऊपरवाले ने औरों से अलग ख़ास मिट्टी से बनाया है।" ये सोचने वाले भूल जाते हैं कि ऊपरवाले ने तो सभी को अलग बनाया है। इसी अहंकार के कारण ना जाने कितने महान काम होने से रह जाते हैं। खुद सोचें जब नयी सोच के साथ अपनी-अपनी विधा में दक्ष लोग साथ काम करेंगे तो क्या कमाल कर डालेंगे! बस श्रेय लेने के चक्कर में बात बिगड़ जाती है। अगर आप वाकई किसी नयी जगह श्रेय पाना चाहते हैं तो पहले उसमे उचित समय, मेहनत दें नहीं तो मन ही मन खुद को 56 बातों का हीरो माने लोग तो हर गली में बैठे हैं। काम में अपनी भूमिका को बढ़ाने या मुख्य बनाने के बजाय अगर काम के परिणाम को बेहतर बनाने पर ज़ोर हो तो भविष्य के कामों में अपनेआप व्यक्ति की भूमिका बड़ी होने लगती है। 

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Tuesday, December 12, 2017

कला में संतुलन की कला :) #Hindi_Article


“लाइफ इज़ नॉट फेयर”, ये प्रचलित कहावत है। मैंने पहले कई बार कलाकारों की दयनीय स्थिति पर बात रखी है। आज एक अलग सिरे से विचार रख रहा हूँ।  कलाकार अगर प्रख्यात हो जाये तो जीवन सही है और अगर ना हो तो लाइफ इज़ नॉट फेयर? नहीं! मैंने अलग क्षेत्रों के कई तरह के कलाकारों में एक बात देखी, जिसे शायद वो समझा ना पाएं। प्रख्यात होना बहुत से कलाकारों के लिए हानिकारक होता है। कई लोग लगातार अपनी कला में कुछ ना कुछ करते, उसके बारे में सोचते रहना चाहते हैं। प्रख्यात होने के बाद व्यक्ति को अवसर मिलते हैं, जीवन-यापन सुगम हो जाता है, पर उस स्तर पर आने के बाद व्यक्ति क्या खो देता है…

जब आपके हर काम पर जनता की नज़र हो और हर कला के पीछे किसी और के लाखों या करोड़ों रुपये लगे हों तो अपने आप दबाव बन जाता है। वो स्वच्छंदता जो इंडिपेंडेंट आर्टिस्ट के पास होती है, उसका काफी सीमा तक बलिदान देना पड़ता है। उदाहरण के लिए बड़े स्तर पर एक म्यूजिक एल्बम या किताब प्रकाशित होने पर उसके प्रचार-प्रसार, लोगों को उस किताब/संगीत के अवयव बार-बार समझाने में काफी समय व्यर्थ होता है। कई वर्षों तक ऐसा होने पर कलाकार अपने सक्रीय जीवन का (जब उसका मस्तिष्क और शरीर अच्छी हालत में रचनात्मकता का साथ देते हैं) बहुत बड़ा हिस्सा और शक्ति प्रमोशन, फॉलो-अप आदि गतिविधियों में बिता देता है।

कलाकार की रचनात्मक स्वतंत्रता केवल उसके लिए ही नहीं समाज के लिए महत्वपूर्ण है। सफल होने के बाद जुड़े लेबल, पैसे और औद्योगिक प्रतिबद्धता के सीमित दायरे में वह पूरी तरह अपनी मर्ज़ी का मालिक नहीं हो पाता। चाहे बाहर से वह अपने निर्णय लेता दिखे पर उसके अवचेतन मन में आ चुकी बातें अक्सर उसे रोक लेती हैं। साथ ही प्रयोगों के आभाव में एक कलाकार के रूप में उसका विकास धीमा पड़ जाता है। हालाँकि, छोटी संख्या में कलाकार ऐसे भी हैं जो इन दो बातों के बीच संतुलन बनाने में सफल हो जाते हैं। ये संतुलन पूर्णतः व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। ऐसा तभी संभव है जब कला को अपनी प्राथमिकता रखा जाए, चाहे व्यक्ति किसी भी स्तर पर पहुँच चुका हो।

इस नये कोण से बातों को देखने का आशय संतुलन बनाने का महत्त्व बताना था। याद रखें कला चलाये रखने के लिए कुछ हद तक सफलता भी ज़रूरी है। पैसों के अभाव, मजबूरियों में कला ही छोड़नी पड़े से बेहतर चाहे खालिस कमर्शियल ही सही कला का जारी रहना है। 

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Artwork - Richard F.
#ज़हन

Monday, July 10, 2017

विकिपीडिया और बिकाऊ मीडिया के पार की दुनिया (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


नाखून चबाती मशहूर अभिनेत्री मेघना कमल कमरे में इधर-उधर टहल रही थी। फ़ोन पर अपने मैनेजर पर चिल्लाती हुई वो टीवी न्यूज़ चैनल्स बदल-बदल कर खुद पर आ रही खबरों को देखने लगी। पिछली रात पास के अपार्टमेंट में से किसी ने उसकी एक वीडियो बनाई थी जिसमें वो एक पिल्ले को किक मारती हुई अपने बंगले से बाहर कर रही थी। शुरुआत में हरकत कर रहा पिल्ले का शरीर मेघना की 5-7 लातें खाने के बाद निर्जीव हो गया। विडिओ पर ना सिर्फ जानवर के अधिकारों वाली संस्थाओं की तीखी प्रतिक्रिया आ रही थी बल्कि देश-विदेश की जनता मेघना की इस हरकत से गुस्से में थी। बड़े निर्माताओं, निर्देशकों पर मेघना को अपनी फिल्मों से बाहर करने, कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का दबाव बढ़ रहा था। कुछ ही देर में मेघना के घर के बाहर मीडिया का तांता लग गया। 

मेघना ने अपने पिता और बीते ज़माने के सुपरस्टार अभिनेता हरीश कमल को फ़ोन किया। 
"पापा...आई ऍम सॉरी, मेरी वजह से आपका नाम भी उछल रहा है। नशे में करियर बर्बाद कर लिया! सब ख़त्म हो गया!"

हरीश शांत स्वर में मेघना को समझाने लगे - "चिंता मत कर मेघू बेटे! ऐसे करियर बर्बाद होने लगते तो मैं कबका एक्टिंग छोड़ चुका होता। तेरा वीडियो मैंने देखा है। एक पार्सल भेजा है तुझे, बाकी फ़ोन पर नहीं समझाऊंगा। अपने मैनेजर और टीम को बुला ले उन्हें समझा दिया है, उनकी बात ध्यान से सुनकर वैसा ही करना... "

उस शाम मेघना ने अपने घर पर ही प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी। कुछ सवालों के जवाब देने के बाद वह अपनी रिहर्स की हुई लाइनों पर आ गई। 

"मैं जानती थी कि भारत के ज़्यादातर लोगो की जो मानसिकता हैं उनसे मुझे ऐसी ही प्रतिक्रिया मिलेगी। कल रात मैंने जानबूझ कर एक रोबोटिक खिलौने पप्पी को मारा, जो दूर से एकदम असली लगता है। यह देखिये इस पार्सल में उस से मिलता-जुलता खिलौना है। मेरा उद्देश्य लोगो में निरीह जानवरों के अधिकार, उनपर होने वाली हिंसा, मानव आबादी से कम होते जंगलों के लिए जागरूकता बढ़ाना था और देश क्या पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए इस स्टंट से बेहतर मुझे कोई उपाय नहीं लगा। इस बीच मुझे चुभने वाली एक सच्चाई का सामना करना पड़ा, एक लड़की के लिए चाहे वो एक सफल अभिनेत्री ही सही इस देश के लोग अपनी छोटी सोच दिखा ही देते हैं। भारत के लोगो और कई सेलेब्रिटीज़ की बातों ने मुझे आहत किया है।"

इतना कहते ही मेघना प्रेस वार्ता में रोने लगी। कैमरों की चमक से आँगन जगमगा उठा। हर ओर मेघना की तारीफ़ और चर्चे थे। इस घटना के बाद मेघना को कुछ अवार्ड मिले, तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने मेघना को अपना गुडविल एम्बेस्डर बनाया और वो बड़े बजट निर्माताओं की पहली पसंद बन गयी। एक दिन हरीश कमल ने मेघना को हँसते हुए बताया कि मेघना का किया कांड तो कुछ भी नहीं उन्होंने अपने समय में कितने कानून तोड़े, लोगो को गायब तक करवाया पर आज भी देश उन्हें पूजता है। 

समाप्त!
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Image - Watercolor Painting by artist Shilpi Mathur
#mohitness #mohit_trendster

Tuesday, April 18, 2017

मरणोपरांत आशीर्वाद (कहानी) #ज़हन


पत्नी के देहांत के बाद रविन्दु सामंत गहरे अवसाद में चले गए थे। उनकी दिनचर्या अपने कमरे तक सीमित हो गयी थी। वहीं उनके तीन बच्चो की अब और इंतज़ार करने की इच्छा नहीं थी। एक शांत दिन उनके 3 बच्चो ने उन्हें बेहोशी की दवा सुंघा कर बेहोश किया और फिर पंखे से टांग कर उन्हें मार दिया गया, कुछ इस तरह कि पत्नी की मौत के शोक में उनकी मौत एक आत्महत्या लगे। उनकी लिखाई से मिलता-जुलता नोट रखने जा रहा उनका छोटा बेटा राजदीप कुछ देखकर ठिठक गया। पुलिस के सामने दी जाने वाली अपनी कहानी का रिहर्सल कर रहे उसके बड़े भाई-बहन ने कारण पूछा तो जवाब आया - "यहाँ तो पहले से एक नोट पड़ा है!"

"नोट है या ऐसे ही कोई रसीद-वसीद?"

राजदीप - "नोट ही है, लिखा है वो हम पर बोझ नहीं बनना चाहते थे और संपत्ति हम तीनो में बाँटकर आज रात पापा हमेशा के लिए ऋषिकेश के एक आश्रम जाने वाले थे।"

3-4 क्षण अवाक रहने के बाद तीनो बिना नज़रे मिलाये फिर अपने काम में लग गए। कुछ समय बाद पुलिस औपचारिकता निभा कर चली गई। एक हफ्ता बीतने के बाद रविन्दु सामंत के इंश्योरेंस एजेंट की शिकायत पर पुलिस का जांच दल दोबारा उनके घर आया। बीमा एजेंट के अनुसार रविन्दु सामंत के सुसाइड नोट की लिखावट उनकी राइटिंग से पूरी तरह नहीं मिलती थी। पुलिस टीम द्वारा जांच के लिए कुछ सामग्री जप्त की गयी और थोड़े दिन के बाद नतीजे की पुष्टि की बात हुई। तीनों भाई-बहन के चेहरे सफ़ेद पड़ गए और उन्हें जेल दिखने लगा। उन्हें यकीन था कि पुलिस के विशेषज्ञ लिखावट में अंतर पकड़ लेंगे। 5 दिनों बाद उन्हें सभी पत्र और जांच के लिए जप्त की गयी सामग्री वापस कर दी गयी। राजदीप अचंभित था कि आखिर कैसे दोनों लिखावट मिल गयीं और वो लोग बच गए? वह सारे पत्र देखने लगा और एक कागज़ देखकर उसे सांप सूँघ गया।  भाई ने कहा "चलो जान बची, पर तू सिर पकडे क्यों कांप रहा है? ठण्ड रख! अब कोई नहीं आ रहा हमें पकड़ने।"

राजदीप - "सुसाइड नोट की राइटिंग तो मैच हो गयी पापा की लिखावट से पर यह सुसाइड नोट वो नहीं जो मैंने लिखा था... "

समाप्त!
#mohitness #mohit_trendster #मोहित_शर्मा_ज़हन

Tuesday, April 11, 2017

लालच का अंकुर (कहानी) #ज़हन


वास्तु वन्य अभयारण्य की खासियत उसके तरह-तरह के पशु, पक्षी थे। इतने कम क्षेत्रफल में इतनी अधिक विविधता पर्यटकों को लुभाती थी क्योंकि उन्हें पता था कि यहाँ आने पर उन्हें कई जंगली और लुप्तप्राय जानवर ज़रूर दिखेंगे। वास्तु अभयारण्य की दुर्गम स्थिति और अच्छी सुरक्षा के कारण अभी तक यह स्थान तस्करों, शिकारियों से बचा हुआ था। अभयारण्य के पास ही हाथी-महावतों की बस्ती थी जो पर्यटकों और वन अधिकारीयों को अनुज्ञप्त जंगली क्षेत्र में घुमाते थे। 12 महीने मेहनत के बाद भी मुश्किल से सभी महावत परिवारों का गुज़ारा चलता था। अपने पशु साथियों से महावतों का प्रेम ऐसा था कि चाहे अपने लिए कुछ कम पड़ जाए पर हाथियों को कोई कमी नहीं होनी चाहिए। एक बार किसी महावत ने लालचवश हाथीदांत के लिए तस्कर से संपर्क किया, जब यह बात बस्ती में फैली तो उसे वन अधिकारीयों के हवाले कर दिया गया और उसके परिवार को बस्ती से निकाल दिया गया। 

बस्ती का कोई मुखिया नहीं था पर 2-3 वृद्ध महावतों की बात सब मानते थे, जिनमे से एक का नाम था सुमंकुट्टी। जंगल में कुछ चेक पोस्ट्स का निर्माण कार्य चल रहा था, जिसके शोर से उनके 2 हाथी भटक गए और उनमे से एक का शरीर बिजली के तार से छू गया। तेज़ करंट लगने से वो हाथी मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया। उसके चारो ओर बैठे डेढ़ दर्जन महावत और उनके परिवार शोक में डूबे थे। कुछ देर बाद सुमंकुट्टी के लड़के सूर्यकुट्टी ने उनके कान मे कुछ कहा। अपने लड़के की बात सुनकर वो आगबबूला हो गए और छड़ी से सूर्यकुट्टी की पिटाई करने लगे। लोगो के पूछने पर उन्होंने बताया कि उनका पुत्र मरने वाले हाथी के दांत तस्करो को बेचने की बात कर रहा है ताकि कुछ पैसे आ सकें। 

अपने संगी-साथियों की शंका भरी नज़रों को भांप कर सुमंकुट्टी बोले, "आप लोगो ने पहले इक्का-दुक्का हाथीयों के मरने पर भी ऐसे सवाल किये हैं कि जब हाथी मर गया तो उसके दांत को बेचें या ना बेचें क्या फर्क पड़ता है, जो तब मैंने टाल दिए या सही से सबको समझा नहीं पाया। बात मृत हाथी या जीवित हाथी की नहीं है। एक बार तस्कर उद्योग रुपी शेर के मुँह में खून लग गया तो हमारे हाथी और यह पूरा अभयारण्य उनकी नज़र में आ जाएगा, वो नये हथकंडे, लालच लेकर आयेंगे और फिर यह वास्तु पशु विहार केवल नाम का अभयारण्य रह जाएगा...हमारे अलावा सरकार क्या करती है उसपर हमारा बस नहीं पर अपने से जितना ज़्यादा हो सके उतना अच्छा इसलिए लालच का अंकुर फूटने से पहले ही बीज हटाना बेहतर है। "

समाप्त!

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Other Titles: अन-अंकुरित, अन-अंकुरण 
Read कुपोषित संस्कार (कटाक्ष)
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster

Wednesday, March 29, 2017

जीत का समझौता (कहानी)


इंटरकॉन्टिनेंटल कप के पहले दौर में हारकर बाहर होने के बाद पापुआ न्यू गिनी क्रिकेट खेमे के एक कोने में 2 खिलाडियों के बीच गंभीर वार्ता चल रही थी। 

"आप जब खुद यह टीम नहीं छोड़ रहे हैं तो मुझसे ऐसा करने के लिए क्यों कह रहे हैं?" परेशान होकर मेज़ के कोने को मसलने की कोशिश करते क्रिकेटर पॉल ने अपने गुरु जैसे सीनियर जिम्मी से पूछा। 

जिम्मी सोच रहा था कि किस तरह ऐसे वाक्य गढ़े जो पॉल की चिंता को कम करें। फिर अपने निर्णय का ध्यान करते हुए वह बोला - "मुझे पापुआ न्यू गिनी में क्रिकेट का भविष्य नहीं दिखता। बाहर निजी क्रिकेट लीग्स में तुम जैसे खिलाडियों को अच्छे अवसर मिलते हैं।"

पॉल - "आप मुझसे बेहतर क्रिकेट खेलते हैं। तो अकेले मेरे जाने का क्या मतलब?"

जिम्मी - "बात को समझो पॉल! तुम अभी से बाहर जाकर संघर्ष करोगे तब जाकर कुछ सालों बाद उसका फल मिलेगा। यहाँ से निकलने में जितनी देर करोगे उतना ही बाहर की लीग्स में सफल होने की सम्भावना कम हो जायेगी। दो साल बाद वर्ल्ड कप क्वालिफाइंग टूर्नामेंट है, जिसमे पापुआ न्यू गिनी के जीतने की और अपना एक दिवसीय दर्जा बचाने की ना के बराबर उम्मीद है। मैंने किशोरावस्था से 2 दशक से अधिक इस देश के क्रिकेट में लगाएं हैं। ना के बराबर ही सही पर दशमलव में कुछ उम्मीद तो है? बस उसी के लिए रुका हूँ...पर तुम्हे यह सलाह नहीं दूंगा।"

पॉल - "आप मेरे आदर्श रहे हैं..."

जिम्मी - "मुझे अपना आदर्श क्रिकेट मैदान के अंदर तक मानो, उसके बाहर अपनी स्थिति अनुसार बातों को समझो और करो। तुम देश के बाहर जाकर किसी विदेशी टीम में नाम कमाओगे तो भी इसी देश के वासी कहलाओगे, इस धरती का नाम रोशन करोगे, क्रिकेट के टैलेंट स्काउट्स तुम्हारे नाम का हवाला देकर यहाँ नए खिलाड़ी खोजने आयेंगे। हारे हुए संघर्ष से बेहतर जीता हुआ समझौता है।"

पॉल के झुके सिर को हामी में हिलता देख जिम्मी ने खुद को दिलासा दिया कि इस डूबते जहाज़ से उसने एक यात्री को बचा ही लिया। 

समाप्त!

#ज़हन

Saturday, February 18, 2017

राजा की मिसमिसाहट (हास्य कहानी)

Digital Artwork - Andrei Militaru‎

बहुत पुरानी बात है...ऐसा लेखक को लगता है पर आप अपने हिसाब से टाइमलाइन सेट कर लो, कोई फॉर्मेलिटी वाली बात नहीं है। मैटरनल काका नाम का एक राजा था, जिसके द्वारा स्थापित पीपणीगढ़ नामक एक विशाल राज्य था, मतलब भोम्पूगढ़ जितना विशाल नहीं पर फिर भी विशाल मेगा मार्ट से बड़ा तो कहूंगा मैं! तो राजा मैटरनल काका को अपनी सेना और आम जनता को परेशान कर के बड़ा सुख मिलता था। आखिर अपने से कमज़ोर को सताने में किसे मज़ा नहीं आता? पता नहीं किसी वैद्य ने उन्हें मानसिक थेरेपी बताई थी या यह चीज़ मैटरनल ने स्वयं सोची थी। 

एक दिन मैटरनल काका रोज़ की खुराफात करने निकले थे और उन्हें टीले के पीछे एक सिर पर बड़े सलीके से काढ़े गए बाल दिखे। अचानक उनके मन में मिसमिसी छूटने लगी और उनकी उँगलियों में थिरकन मचने लगी। वो तेज़ी से उन बालो के स्वामी के पास पीछे से आये और ऐसे कोण से लात जमाई की वह व्यक्ति कलामंडी खाता हुआ नीचे जाकर गिरा। उसका शरीर मिट्टी में लोटमपोट हो गया पर उसके बाल अभी तक व्यवस्थित थे। यह बात पूर्णतावादी मैटरनल को कहाँ रास आने वाली थी? राजा ने उस भ्रमित व्यक्ति का खोपड़ा पकड़ के मिट्टी में लोटा दिया। कुछ इस तरह कि बेचारे व्यक्ति का एक-एक बाल भूरा हो जाए। 

अपनी विजय का आनंद उठाते मैटरनल काका को तब झटका लगा जब वह व्यक्ति एक सिद्ध मुनि निकला। धूलधुसरित मुनि पहले थोड़ी देर बच्चो की तरह रोये, फिर शांत होने के बाद जब वो राजा को श्राप देने को हुए तो मैटरनल अपने सैनिको के साथ वहाँ से भाग गया। उसे लगता था कि श्राप सिर्फ आमने-सामने दिया जा सकता है, ऐसा ही उसने कथाओं में सुना था। मुनि के नाक, कान, मुँह में मिट्टी भर गयी थी इसलिए वो आराम से श्राप सोच नहीं पाए और गुस्से में उन्होंने राजा के राज्य के कई गाँवो  को अजीब सा श्राप दे डाला। उस दिन के बाद से किसी गाँव में सिर्फ लड़के जन्म लेने लगे और किसी गाँव में सिर्फ लड़कियां। शुरुआत के कुछ महीने तो सब सामान्य रहा पर धीरे-धीरे लोगो को आभास हुआ कि किसी अपशगुन या श्राप के कारण राज्य के गाँवों में यह अजीब असंतुलन बढ़ रहा है। राजा के साथ रहने वाले मंत्री ने सभी घटनाओ का अवलोकन किया और पाया की मैटरनल द्वारा किसी सिद्ध व्यक्ति को परेशान करने के कारण ऐसा हो रहा है। राजा को सलाह दी गयी कि अबतक जिन सिद्ध लोगो, मुनियों को उसने परेशान किया है सबसे क्षमा मांग ले। वहीं मैटरनल काका अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था, उसने सभी गर्भवती महिलाओं, जवान युवक-युवतियों को उनके गाँव के अनुसार इस तरह चिन्हित कर बसाया कि आगे पैदा होने वाले शिशुओं में गाँव के हिसाब से निर्धारित हो रहे लिंग की बाधा ना रहे। राजा ने ऐसी अकलमंदी जीवन में पहली बार दिखाई थी और परिणाम जानने के लिए वह उत्सुक था...कुछ महीनो बाद हद हो गयी! अब राज्य में पैदा होने वाले सभी बच्चे अलैंगिक या किन्नर के रूप में पैदा होने लगे, इसलिए कहते हैं ज़्यादा ओवरस्मार्टनेस कई बार गोबरस्मार्टनेस में बदल जाती है। 

राजा हार कर सभी मुनियों के पास गया और अपनी भूली-बिसरी भूलों की क्षमा-याचना की, तब एक गंजे ऋषि ने उसे बताया कि किस तरह मैटरनल काका ने उसे पूजा करते हुए टीले से गिराया और उसे धूल-मिट्टी में लोटा दिया। राजा के मौका-ए-वारदात से भागने के बाद उसने झुंझलाहट में मैटरनल के राज्य को ऐसा श्राप दिया। उस दिन के बाद से मुनि प्रतिशोध में जलता रहा और उसने अपने सुन्दर, घने बाल राजा के पश्चयताप करने तक के लिए कटवा लिए (या शायद कुछ इतिहासकारो की माने तो उस घटना के बाद उन्हें काफी डेंड्रफ हो गई थी इसलिए बाल कटवा लिए)। अपनी बात वापस लेने और बाल दोबारा उगाने की उसकी एक ही शर्त थी...

...मुनि ने मैटरनल को पूरी शिद्दत से कीचड़, मिट्टी लोटा-लोटा के परमसुख की प्राप्ति की और अपना श्राप वापस लिया। राज्य के सभी नवजात सामान्य हुए और राजा को अपनी गलती का सबक मिला... मतलब अब वो किसी अनजान व्यक्ति का पूरा बैकग्राउंड देखकर उसे छेड़ता है। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Sunday, February 5, 2017

अमीर की हाय (कहानी) #ट्रेंडस्टर

दूसरे हृदयघात के बाद आराम से उठने के बाद उद्योगपति तुषार नाथ का व्यक्तित्व बदल गया था। पहले व्यापार पर केंद्रित उनका नजरिया अब किसी छोटे बच्चे जैसा हो गया था। छोटी-छोटी बातों पर चिढ जाना, उम्र के हिसाब से गलत खान-पान और व्यापार में हो रहे घाटे पर ध्यान ना देना अब उनके लिए आम हो गया था। परिवार और परिचितों को साफ़ लग रहा था कि उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। 

एक दिन उन्होंने अपनी दुकानों के सभी कर्मचारियों और अपने परिचित जनो को एक मंदिर के पास बुलाया। सभी चकित और कारण जानने के लिए आतुर थे कि ऐसी क्या आपात स्थिति आन पड़ी जो तुषार नाथ जी ने दो-ढाई सौ लोगो को अपने घर से अलग एक जगह बुलाया। तुषार जी की हरकतें और चेहरे के हाव-भाव देख कर लग रहा था कि कुछ गड़बड़ है। वो एक मंच पर चढ़े और माइक्रोफोन से सभी एकत्रित लोगो को संबोधित करने लगे। 

"हेल्लो फ्रेंड्स! आज मैं आप सबको भोला भिखारी से मिलवाना चाहता हूँ।" इतना कहकर उन्होंने मंदिर की सीढ़ियों पर अंगड़ाई ले रहे एक भिखारी की तरफ इशारा किया। 

एक कर्मचारी अपने मित्र से बोला - "मैं पहले ही कहता था कि हार्ट अटैक के बाद से बुडढा सटक गया है! लगता है अपनी संपत्ति इस भिखारी को देने वाला है।"

कुछ ऑफ टॉपिक बातें करने के बाद तुषार नाथ को अपना असल मुद्दा याद आया - "....हाँ, तो मैं कह रहा था कि आप सभी लोग भोला को हाय दो। मतलब हॉय-हेल्लो वाला नहीं जो दिल से किसी के लिए हाय निकलती है वो वाली हाय!"

ये क्या था? मतलब ये हुआ क्या? कुछ अचंभित, कुछ अपनी हँसी छुपाते पर सबके मन में यही बात थी। 

तुषार नाथ - "मंदिर से लौटते हुए गलती से मेरा पैर इसके पैसे वाले कटोरे पर लग गया और इसके सिक्के सीढ़ियों पर नीचे बिखर गए। जब गुस्से में यह मेरी ओर मुझे मारने को बढ़ा तो मेरे गार्ड ने इसे 1 थप्पड़ लगा दिया। फिर इसने बोला कि एक गरीब की बड़ी हाय लगेगी मुझे....पर इस नादान को पता नहीं कि मैं कौन हूँ! इसलिए आप सब अमीरो, मिडिल क्लास लोगो को यहाँ भोला को लगभग 200 सामूहिक हाय लगाने के लिए बुलाया है।"

किसी त्यौहार पर मंदिर के पास से जयकारों की तेज़ ध्वनि आती थी। आज एक सामान्य दिन ऐसी ही एक आवाज़ गूँजी....

"....हाय!"

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन
Artwork: Katan Walker

Friday, October 7, 2016

Watercolor Painting - Roots


Namastey! These days I am sharing some ideas with talented artist friend Jyoti Singh. She wants to create dozens of watercolor, oil and acrylic paintings for exhibitions,  art lovers before the first quarter of 2017. So, I am giving her inputs, visuals on a regular basis. I am loving this brainstorming exercise. This (Watercolor-A3) is one of the paintings based on my ideas. Title - Roots 

What inferences did you make from this....

Sunday, September 4, 2016

Kaddu le lo (Audio Story) #mohitness

Kaddu le lo (Secular Audio Story), कद्दू ले लो (धर्मनिरपेक्ष कहानी) Social Message


*) - Youtube: http://goo.gl/AeI1Bv
*) - SoundCloud: http://goo.gl/klCe7H 
*) - Vimeo: http://goo.gl/uaQ4Ih

Duration - 5 Minutes 28 Seconds

#message #social #mohitness #mohit_trendster #freelancetalents #freelance_talents #religion #fiction #debate #dark #humor #satire #ज़हन #ज़हनजोरी

Thursday, August 4, 2016

Podcast: Views on Antiziganism/Antigypsyism (Hindi) - Mohit Trendster


दुनिया भर में फैले रोमा, सिंटी समुदाय (जिन्हें जिप्सी भी कहा जाता है), के साथ सदियों से हो रहे भेदभाव और अत्याचार पर मेरे कुछ विचार। इस समस्या से जुड़े कुछ और मुद्दे आगे रखने की कोशिश करूँगा। इस से पहले रोमा लोगो पर "सभ्य रोमानी" बंजारा और "उदार प्रयोग" नामक 2 कहानियां लिखा चुका हूँ। - मोहित शर्मा ज़हन 

Friday, July 22, 2016

अर्द्धअच्छा काम (कहानी)

दिनेश ऑफिस से थका हारा घर पहुंचा। उसकी पत्नी रूपाली जो 1 महीने बाद अपने मायके से लौटी थी, उसके पास आकर बैठी। दोनों बीते महीने की बातें करने लगे। फिर दिनेश ने महीने की बातों के अंत के लिए एक किस्सा बचा कर रखा था। "परसो एक आदमी फ़ोन पर बात कर रहा था। जल्दबाज़ी में ऑफिस के बाहर बैग छोड़ गया, मैंने फिर वापस किया...नहीं तो काफी नुक्सान हो जाता बेचारे का।"

रूपाली - "अरे वाह...प्राउड ऑफ़ यू! आखिर पति किसके हो! पर इसमें क्या ख़ास बात है जो बताने से पहले इतना हाइप बना रहे थे?"

दिनेश - "पहले मैंने बैग चेक किया। उसमे वीडियो कैमरा, डाक्यूमेंट्स, 75 हज़ार रुपये, घडी-कपडे टाइप सामान था। तो 17 हज़ार रुपये निकाले बाकी सामान एक बंदे से उसके पते पर छुड़वा दिया।"

रुपाली - "हौ! चोर! ऐसा क्यों किया? गलत बात!"

दिनेश - "देखो जैसा लोग काम करते हैं, वैसा उन्हें फल मिलता है, लापरवाही करोगे तो कुछ सज़ा मिलनी चाहिए ना? मुझे तो भगवान ने बस साधन बनाया। अब उस आदमी आदमी को सबक मिलेगा।"

रुपाली - "ये देखो गीता पढ़ कर भगवान कृष्ण के दूत बनेंगे सर। अरे लौटा दो बेचारे के पैसे।"

दिनेश - "नहीं हो सकता, ये देखो।"

रुपाली - "यह क्या है?"

दिनेश - "जो फ़ोन तुम्हे गिफ्ट किया उसकी रसीद। 16990 रुपये का है, अब 10 रुपये लौटाने क्या जाऊं। इसकी एक-एक ऑरेंज चुस्की खा लेते हैं।"

रुपाली - "यू आर सच ए..."

दिनेश - "आखिर पति किसका हूँ?"

समाप्त!

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- मोहित शर्मा ज़हन

Sunday, July 3, 2016

स्वर बंधन (लघुकथा) - मोहित शर्मा ज़हन


आलीशान बंगले में एक अंधी महिला ने प्रवेश किया। स्टाफ मे नई सेविका ने उत्सुकतावश हेड से पूछा। 

"ये कौन है?"

स्टाफ हेड - "मैडम के बच्चे चीकू की देखभाल के लिए..."

सेविका - "पर ये तो देख नहीं सकती? क्या मैडम या साहब को दया आ गई इस बेचारी पर और कहने भर को काम दे दिया?"

स्टाफ हेड - "तुझे साहब लोग धर्मशाला वाले लगते हैं? उनकी मजबूरी है इसलिए चला रहे हैं। ये औरत पहले से ही बच्चे की देखभाल करती थी, एक दुर्घटना में इसकी आँखें चली गईं, पर अब भी नन्हा चीकू इसकी लोरी, कहानियां सुने बिना नहीं सोता है। जब चीकू थोड़ा बड़ा होगा इस बेचारी का यहाँ आना बंद हो जाएगा।"

समाप्त!

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