...is "Celebrating (un)Common Creativity!" Fan fiction, artworks, extreme genres & smashing the formal "Fourth wall"...Join the revolution!!! - Mohit Trendster
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Saturday, January 18, 2020

मज़ा आना चाहिए बस...(लघु-कहानी) #ज़हन


गगन कई महीनों बाद अपने दोस्त सुदेश के साथ सिनेमा हॉल आया था। 3-4 बार योजना बनाने और फिर नहीं मिल पाने के बाद आखिरकार दोनों को साथ फिल्म देखने का मौका मिला था। स्कूल के दिन तो कबके जा चुके थे पर इस तरह मिलकर दोनों स्कूल जैसा समय वापस जीने का प्रयास करते थे।

फिल्म से पहले चल रहे दूसरी फिल्मों के ट्रेलर विज्ञापनों पर गगन बोला - "क्या यार! ट्रेलर में तो इस पिक्चर का म्यूज़िक, कहानी और यहां तक की लोकेशन, किरदारों का मेकअप भी पिछले साल आई हॉलीवुड फिल्म से मिलते-जुलते हैं। कब सुधरेंगे ये बॉलीवुड वाले? हर दूसरी फिल्म का यही हाल है। साउथ और बाकी रीजनल सिनेमा वाले भी बहुत कॉपी मारते हैं। इतने लेखक, कलाकार बैठे हैं अपने इंडिया में उनसे ही कुछ ले लो...मगर नहीं! जो आईडिया बाहर पैसे कमाएगा उसकी हूबहू नक़ल ये लोग बना देंगे..."

सुदेश ने गगन की बातों वाली ट्रेन की चेन खींचकर उसे रोका - "भाई, तू इंजीनियर है, ज़्यादा प्रेमचंद मत बन! मज़ा आना चाहिए बस...बाकी सब फालतू की बातें हैं।"

कुछ महीने बीतने के बाद कॉलेज के दोस्तों में गप्पे लड़ाते हुए सुदेश बोला - "इंडिया वालों पर कुछ नहीं होता! कल छोटे से देश कोस्टा रिका के दो कलाकारों को ऑस्कर मिला और कई सालों की तरह इंडिया को ठेंगा। ये..."

अब गगन की बारी थी, उसने वह कालजयी डायलॉग कंठस्त कर लिया था - "रहने दे भाई....मज़ा आना चाहिए बस...बाकी सब फालतू की बातें हैं।"

समाप्त!
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Wednesday, December 28, 2016

नशेड़ी औरत (कविता)


कितने चेहरो में एक वो चेहरा था…
नशे में एक औरत ने कभी श्मशान का पता पूछा था…
आँखों की रौनक जाने कहाँ दे आई वो,
लड़खड़ाकर भी ठीक होने के जतन कर रही थी जो। 
किस गम को शराब में गला रही वो,
आँसू लिए मुस्कुरा रही थी जो।

अपनी शिकन देखने से डरता हूँ,
इस बेचारी को किस हक़ से समझाऊं?
झूठे रोष में उसे झिड़क दिया,
नज़रे चुराकर आगे बढ़ गया।

आज फिर मेरा रास्ता रोके अपना रास्ता पूछ रही है….
ठीक कपड़ो को फिर ठीक कर रही है….
हिचकियां नशे की,
पगली कहीं की!

“क्या मिलता है नशे में?”

“उसे रोज़ बुलाती,
थक जाने तक चिल्लाती, 
नशे में वो मर गया, 
मेरा जी खाली कर गया। 
पीकर आवाज़ लगाने पर आता है,
मन भरने तक बतियाता है,
अब आप जाओ साहब!
मेरा पराये मरद से बात करना उसे नहीं भाता है।”

 - मोहित शर्मा ज़हन

Tuesday, July 19, 2016

स्वर्ण बड़ा या पीतल? (कहानी)

शीतकालीन ओलम्पिक खेलों की स्पीड स्केटिंग प्रतिस्पर्धा में उदयभान भारत के लिए पदक (कांस्य पदक) जीतने वाले पहले व्यक्ति बने। यह पदक इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योकि भारत में शीतकालीन खेलों के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। मौसम के साथ देने पर हिमांचल, कश्मीर जैसे राज्यों में कुछ लोग शौकिया इन खेलों को खेल लेते थे। भारत लौटने पर उदयभान का राजा की तरह स्वागत हुआ। राज्य और केंद्र सरकार की तरफ से उन्हें 35 लाख रुपये का इनाम मिला। साथ ही स्थानीय समितियों द्वारा छोटे-बड़े पुरस्कार मिले। जीत से उत्साहित मीडिया और सरकार का ध्यान इन खेलों की तरफ गया और चुने गए राज्यों में कैंप, इंडोर स्टेडियम आदि की व्यवस्था की गयी। खेल मंत्रालय में शीतकालीन खेलों के लिए अलग समिति बनी। इस मेहनत और प्रोत्साहन का परिणाम अगले शीतकालीन ओलम्पिक खेलों में देखने को मिला जब उदयभान समेत भारत के 11 खिलाडियों ने अपने नाम पदक किये। उदयभान ने अपना प्रदर्शन पहले से बेहतर करते हुए स्वर्ण पदक जीता। 

जब मीडियाकर्मी, उदयभान के घर पहुंचने पर उनका और परिवार का साक्षात्कार लेने आये तो उदयभान के माता-पिता कुछ खुश नहीं दिखे। कारण -

"रे लाला ने इतनी मेहनत की! पहले से जादा लगा रहा...गोल्ड जित्ता, फेर भी पहले से चौथाई पैसा न दिया सरकारों ने। यो के बात हुई? इस सोने से बढ़िया तो वो पीतल वाला मैडल था।"

उदयभान के साथ सभी मीडियाकर्मियों में मुस्कराहट फ़ैल गयी। पहले स्पॉटलाइट में उदयभान पहला और अकेला था...अब उसका पहला होना रिकॉर्ड बुक में रह गया और उसके साथ 10 खिलाडी और खड़े थे। जिस वजह से उसे पहले के कांस्य जीतने पर जितने अवार्ड और पैसे मिले थे, उतने इस बार स्वर्ण जीतने पर नहीं मिले। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

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Saturday, July 9, 2016

एकल-युगल-पागल (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन

"जी सर! मैंने चक्कू घोंप दिया ससुरे की टांगों में अब आपका जीतना पक्का।"

टेनिस एकल प्रतिस्पर्धा में स्टीव जो एक जाना-पहचाना नाम था, जिसके नाम कुछ टाइटल थे। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के दौरान वह सफलता से दूर ही रहा। फिटनेस के हिसाब से उसमे 2-3 सीजन का खेल बचा था और इस बीच वह अधिक से अधिक टाइटल अर्जित करना चाहता था। सबसे पहले वह तुलनात्मक रूप से आसान और नीची रैंक के खिलाड़ियों से भरे टूर्नामेंट चुनता था ताकि उसके जीतने की सम्भावना बढ़े, किस्मत से वह एक नामी टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में पहुंचा जहां उसका प्रतिद्वंदी दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी था। इस खिलाड़ी से पार पाना स्टीव के बस की बात नहीं थी। स्टीव ने उस खिलाड़ी को घायल करवाने के लिए अपने एक जुनूनी देशवासी को ब्रेनवाश किया कि देश के नाम और सम्मान के लिए उसे वर्ल्ड नंबर वन को खिलाड़ी घायल करना है। पूरी रात पार्टी कर अगले दिन वॉकओवर मिलना सुनिश्चित मान स्टीव कोर्ट पर उतरा जहाँ फिट्टम-फिट दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी उसका इंतज़ार कर रहा था। उसके पैरो तले ज़मीन और खोपड़े छज्जे आसमान खिसक गए। काश कल न्यूज़ में कन्फर्म कर लेता तो दारु तो ना पीता, अब तो 6-0, 6-0 पक्का! पता नहीं किस बेचारे के पैरों में चक्कू घोंप दिया गधे ने? 

बगल के कोर्ट में इस प्रतियोगिता का युगल (डबल्स) टेनिस खेल रही एक टीम को वॉकओवर मिला क्योंकि उनकी विरोधी टीम के एक खिलाड़ी पर पिछली रात टांगलेवा हमला हुआ था, यह खिलाड़ी विश्व डबल्स टेनिस में नंबर एक रैंक पर था। 

इस कहानी से शिक्षा मिलती है जुनूनी के साथ-साथ थोड़ी अक्ल वाले बंदे-बंदियों से ऐसे काम करवाने चाहिए।

समाप्त!

Wednesday, July 6, 2016

जीवन दण्ड (कहानी) - Mohit Trendster

ढेरी नामक तटीय क्षेत्र के जंगल में मानव सभ्यता से दूर टोमस जंगली प्रजाति रहती थी। अब तक दुनिया में ऐसी गिनी-चुनी प्रजातियां रह गयीं थी जिनका मानव सभ्यता से कोई संपर्क नहीं हुआ हो। किसी भी संपर्क की कोशिश पर टोमस जंगली बेहद आक्रामक हो जाते और इनकी सुरक्षा के लिए सरकार या सेना को पीछे हटना पड़ता। समय के साथ प्रगति करते देश में विदेशी निवेशकों और उद्योगपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा। कुछ वर्षों बाद एक प्रभावशाली उद्योगपति की नज़र उस जंगल और तटीय क्षेत्र पर पड़ी। वहाँ मिलने वाले कुछ खनिजों का उत्खनन उसकी संपत्ति कई गुना बढ़ा सकता था पर उसके रास्ते में थी टोमस प्रजाति। समय के साथ सरकार का रुख बदला और उद्योगपति ने छद्म रूप से टोमस जंगलियों को खत्म करवाना शुरू किया। साम-दाम-दण्ड-भेद के बल पर 1-2 वर्षों में टोमस प्रजाति के सौइयों लोगो को मारा गया और बाकी बचे जंगलियों ने अपनी सुरक्षा के लिए आस-पास के क्षेत्रों में प्रवास कर लिया। 

अपनी सफलता पर इतराता वह कॉर्पोरेट माफिया उस क्षेत्र में बहुत सा निवेश ले आया और जंगल के बड़े हिस्से की कटाई के साथ खनन कार्य शुरू किया। गाहे-बगाहे उसे, उसकी टीम या मज़दूरों को वो जंगली दिख जाते तो जंगली घूरते हुए कुछ मंत्र पढ़ देते। ये लोग ऐसे जंगलियों को हँसी में टाल जाते। कुछ महीनों बाद 8 रिक्टर स्केल का भूकंप और सुनामी आई जिस से खनन के लिए हुआ सारा इंतेज़ाम तहस-नहस हो गया और उत्खनन कार्य मे लगे कई लोग मारे गए। बड़े भौगोलिक परिवर्तन में उस तटीय क्षेत्र और जंगल का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया और साथ ही उस उद्योगपति का सारा निवेश डूब कर उसे कंगाल बना गया। कर्जदारों से बचने के लिए उसने आत्महत्या करने की ठान ली पर अपने हाथों से अपनी जान लेने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। अपराधबोध-ग्लानि से भरे उस व्यक्ति ने प्रजाति के प्रमुख के सामने समर्पण कर दिया कि वो तो उसे मार ही देगा। प्रमुख ने उसे ज़िंदा छोड़ दिया और अब वह कॉर्पोरेट किंग अपने अपराधों के बोझ ढोता जंगलों में भटकता है...शायद मरने के बाद भी भटकेगा।

समाप्त!

Tuesday, June 28, 2016

ज़रूरत (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


तकनीकी गड़बड़ी से एक यात्री विमान ज़मीन से हज़ारों मीटर ऊपर भीषण डीकम्प्रेशन से बिखर कर बंगाल की खाड़ी में गिर गया था। अचानक दबाव के लोप हुआ धमाका इतना भीषण था कि किसी यात्री के बचने की संभावना नहीं थी। 279 यात्रियों और विमान दल में केवल 112 व्यक्तियों की क्षत-विक्षत लाशें मलबे से चिपकी या तैरती मिली, बाकी लोगो को सागर लील गया। बैंक लिपिक रूबी के पिता शॉन इस फ्लाइट में थे। पूरे दिन के सफर के बाद जांच-बचाव केंद्र पर पहुंच कर रूबी को पता चला की एक को छोड़कर बाकी सभी शवो की उनके परिजनों द्वारा पहचान हो चुकी है। हाल ही में कैंसर पीड़ित अपनी माँ को खो चुकी  रूबी ने बुझे मन से आखरी शव को देखा तो चेहरा और शरीर पहचान में न आ सकने वाली हालत में थे, पर शव के पैर पर चोट का लंबा निशान रूबी के लिए अपने मृत पिता को पहचानने के लिए काफी था। सिसकती हुई रूबी औपचारिकताओं के लिए आगे बढ़ी तो उसे एक आवाज़ ने रोका। 

"तुम्हे कोई गलतफहमी हो गई है बेटी! यह मेरे पति हैं।"

रूबी ने उस वृद्धा को दया से देखा और कुछ देर समझाने की कोशिश की, पर वह औरत अपनी बात पर अड़ी रही। थोड़े समय बाद रूबी के सब्र का बांध टूट गया और वह उस बूढ़ी महिला पर चिल्लाने लगी। आस-पास अन्य यात्रियों के कुछ परिजन और जांच अधिकारी आ गए। भीड़ मे कोई बोला - "अरे...ये औरत पागल हो गई है। पहले 2 लाशों को अपना पति बता रही थी फिर वहां से भगाया इसे।" 

अब रूबी ने उस औरत पर ध्यान दिया, उसका हुलिया व्यवस्थित था। वह शांत थी और उसके व्यवहार में पागलपन जैसा कुछ नहीं दिख रहा था। 

एक अधिकारी ने मामला सुलझाना चाहा - "देखिए अगर शव पहचान में विवाद है तो डीएनए जांच के लिए भेजे जा सकते हैं।" 

रूबी - "नहीं ऑफिसर! डीएनए टेस्ट मत करवाइये, मैं अपना क्लैम वापस लेती हूँ...यह मेरे पिता नहीं हैं।"

सबकी अविश्वास भरी नज़रों और मुँह पर लेकिन के जवाब में रूबी दबी ज़ुबान में बोली "...शायद इस समय मुझे मेरे पिता से ज़्यादा इन्हे इनके पति की ज़रूरत है।"

एक बार शव को प्यार से छूकर रूबी ने नम आँखों से ही पिता का अंतिम संस्कार कर विदा ली। 

समाप्त!

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Sunday, June 12, 2016

इज़्ज़त का अचार (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन

होपी नामक क़स्बा नक्काशी के काम और पुराने मंदिरों की वजह से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र था। यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या काफी थी। संपन्न परिवार का दिनेश वहां अकेले ट्रेवल एजेंसी, टूर गाइड्स, होटल आदि काम संभालता था। उसे लगता था उसके पुरखों को कमाना नहीं आता था और जितना वे कमा सकते थे उतना कमाया नहीं। वह अपने ड्राइवर्स, होटल मैनेजर, गाइड्स आदि के साथ मिलकर हर सेवा के विदेशी पर्यटकों से ज़्यादा पैसे वसूलता, घटिया सामान खरीदवाता और मौका मिलने पर अपने ही पॉकेटमार, चोर लड़के-लड़कियों से पर्यटकों के पैसे और कीमती सामान उठवाता। 

एक दिन यूँ ही काम का जायज़ा ले रहे दिनेश के पिता ने उसे टोका तो उसका जवाब था - "पिता जी आप बेफिक्र रहो! पुलिस अपनी जेब में है, बस टूरिस्ट को दिखाने का नाटक करते हैं। न इस जगह कोई दूसरा कॉम्पिटिशन है अपना।"

बिजनस सँभालने के डेढ़ साल के अंदर ही पहले से काफी अधिक मुनाफा हुआ तो दिनेश ने खाना खाते हुए अपने बुजुर्गो को ताना मारा - "बाउ जी ऐसे कमाया जाता है रुपया।"

इन डेढ़ वर्षों के दौरान इंटरनेट फ़ोरम्स, सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ रिपोर्ट्स में होपी क़स्बा पर्यटकों से चोरी, धोखाधड़ी के मामलो में कुख्यात हो गया था। कभी हज़ारो विदेशी पर्यटकों के आकर्षण पर अब गिने-चुने विदेशी आने लगे। दिनेश के काम एक-एक कर ठप होने लगे और ज़मीन बेचने की नौबत आ गयी। बाबा से रहा न गया - "बेटा, ज़मीन के अलावा घर भी बेचना पड़े कोई बात नहीं.... इन्हे बेच कर इस परिवार, जगह और देश की खोई इज़्ज़त वापस मिले तो लेते आना।"

समाप्त!
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Wednesday, May 25, 2016

बाज़ीगरनी (लघुकथा) - लेखक मोहित शर्मा ज़हन


अक्सर सही होकर भी बहस में हार जाना दीपा की आदत तो नहीं थी, पर उसका बोलने का ढंग, शारीरिक भाषा ऐसी डरी-दबी-कुचली सी थी कि सही होकर भी उसपर ही दोष आ जाता था। जब वह गलत होती तब तो बिना लड़े ही हथियार डाल देती। आज उसकी एफ.डी. तुड़वा कर शेयर में पैसा लगाने जा रहे पति से हो रही उसकी बहस में उसके पास दमदार तर्क थे। 

"आप...आपने पहले ही कितना पैसा गंवाया है शेयर्स में! ये एफ.डी. इमरजेंसी के लिए रख लेते हैं ना? वो...आप दोबारा जोड़ कर लगा लेना पैसे शेयर में।"

"अरे चुप! पति एकसाथ तरक्की चाह रहा है और तू वही चिंदी चोरी जोड़ने में लगी रहियों। तेरी वजह से मेरी अक्ल पर भी पत्थर पड़ जाते हैं!"

"मेरी वजह से? मैंने...क्या किया? मैंने कुछ नहीं किया!"

...और इस तरह दीपा ने एक बार फिर से जीत के मुंह से हार छीन ली। अपनी आदत उसे पता थी और इस बार उसे हार नहीं माननी थी। 

कुछ देर बाद पति पैसे लेकर बाहर निकला तो 2 नकाबपोश बाइक सवार उसका झोला झपट के चले गए। पति ओवरलोडेड इंजन की तरह आवाज़ निकालता थाने गया और वो 2 बाइक सवार दीपा को झोला पकड़ा कर चले गए। दीपा ने अपने भाई को सारी बात बताई और भाई ने अपने दोस्त भेज कर दीपा को हार कर भी जीतने वाली बाज़ीगर बनवाई। 

समाप्त!

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Sunday, March 27, 2016

लेखकों के लिए कुछ सुझाव

हर लेखक (या कवि) अपनी शैली और पसंद के अनुसार कुछ रचना-पद्धतियों (genres) में अच्छा होता है और कुछ में उसका हाथ तंग रह जाता है। यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि कुछ विधाओं में लेखक अधिक प्रयास नहीं करता। समय के साथ यह उसकी शैली का एक हिस्सा बन जाता है। अक्सर किसी अनछुई विधा को कोई लेखक पकड़ता भी है तो उसमे अनिश्चितता और असंतोष के भाव आ जाते है। सबसे बड़ा कारण लेखक ने इतने समय में स्वयं के लिए जो मापदंड बनाए होते हैं, उनपर इस नयी विधा की लेखनी खरी नहीं बैठती। ऐसा होने पर लेखक रही उम्मीद भी छोड़ कर वापस अपनी परचित विधाओं की तरफ वापस मुद जाता है। अपने अनुभव की बात करूँ तो मुझे हास्य, हॉरर, ट्रेजेडी, इतिहास, ड्रामा, सामाजिक संदेश जैसे विषयों पर लिखना अधिक सहज लगता है, जबकि रोमांटिक या साइंस फिक्शन जैसी थीम पर मैंने काफी कम लेखन किया है। नयी श्रेणियों में पैर ज़माने का प्रयास कर रहे लेखकों और कवियों के लिए कुछ सुझाव हैं। 

*) - अपनी वर्तमान लेखन क्षमता, शैली और उसकी उसकी लोकप्रियता की तुलना नयी विधा में अपने लेखन से मत कीजिये। ऐसा करके आप नयी रचना-पद्धति में अपने विकास को शुरुआती चरण में रोक देते हैं। खुद को गलती करने दें और नए काम पर थोड़ी नर्मी बरतें। याद रखें बाकी लेखन शैलियों को विकसित करने में आपको कितना समय लगा था तो किसी अंजान शैली को अपना बनाने में थोड़ा समय तो लगेगा ही। 

*) - शुरुआत में आसानी के लिए किसी परचित थीम के बाहुल्य के साथ अंजान थीम मिलाकर कुछ लिखें। इस से जिस थीम में महारत हासिल करने की आप इच्छा रखते हैं उसमे अलग-अलग, सही-गलत समीकरण पता चलेंगे। थोड़े अभ्यास के बाद परिचित थीम का सहारा भी ख़त्म किया जा सकता है।    

*) - आदत अनुसार कहानी, लेख या कविता का अंत करने के बजाए उस थीम में वर्णन पर ध्यान दें। चाहे एक छोर से दूसरा छोर ना मिले या कोई अधूरी-दिशाहीन रचना बने फिर भी जारी रहें। इस अभ्यास से लेखन में अपरिचित घटक धीरे-धीरे लेखक के दायरे में आने लगते हैं। 

*) - यह पहचाने की आपकी कहानी/रचना इनसाइड-आउट है या आउटसाइड-इन। इनसाइड-आउट यानी अंदर से बाहर जाती हुयी, मज़बूत किरदारों और उनकी आदतों, हरकतों के चारो तरफ बुनी रचना। आउटसाइड-इन मतलब दमदार आईडिया, कथा के अंदर उसके अनुसार रखे गए किरदार। वैसे हर कहानी एक हाइब्रिड होती है इन दोनों का पर कहानी में कौन सा तत्व ज़्यादा है यह जानकार आप नए क्षेत्र में अपनी लेखनी सुधार सकते हैं।

 - मोहित शर्मा ज़हन 

Read रचनात्मक प्रयोगों से डरना क्यों?


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Monday, January 4, 2016

साइकोलॉजी के मम्मी-पापा (#mohit_trendster)


दुनिया ऐसे लोगो से (साइकोलॉजी के मम्मी-पापाओं) भरी पड़ी है जो अपने छींट भर अनुभव के आधार पर स्वयं को मनोविज्ञान के और दूसरो का मन पढ़ने वाले  महाज्ञाता समझने का भ्रम रखते है। इसका कारण है कि जिन कुछ लोगो से उनका नियमित मिलना-रहना होता है उनकी आदतों, उनके इतिहास अनुसार ये जो सोचते है वो अक्सर सही निकलता है। पर जब कोई अनजान व्यक्ति इनके सामने आता है तो उसकी कुछ बातों को जानकर ही ये छद्म मनोविज्ञानी अपने निष्कर्ष का पर्चा काट देते है। कई बेचारे इन जजमेंट्स की भेंट रोज़ाना चढ़ते होंगे। अपनी सुविधानुसार, जटिल बात को सरल मान लेते है और आसान बात को कठिन।

अब एक कलाकार ने अपनी चुनिंदा कलाकृतियों के साथ बिल्डिंग से कूदकर जान दे दी। स्थानीय, देसी-विदेशी मीडिया इस कहानी से आकर्षित होकर उसकी उन कलाकृतियों, घर एवम अन्य रचनाओ में कोड ढूंढने लगी उसकी आत्महत्या का, एक्सपर्ट्स व्यूज़, कांस्पीरेसी थ्योरीज़ और ना जाने कितने विश्लेषण। मरने से पहले उसके मन में कोड तो बस यही था बरसो से एक "स्थानीय" कलाकार को दुनियाभर में अपनी कला पहुंचानी थी। 

वहीँ शहर के हिंसक माहौल का हवाला देकर पुलिस, मीडिया और जनता कभी एक सीरियल किलर को पहचान ही नहीं पाये। गधे! वो किलर भी फ्रस्टेट हो गया होगा कि क्या मनहूस जगह चुनी!

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Monday, December 7, 2015

नासमझ इतिहास - Micro Fiction Experiment # 03 #mohitness

*) - अठारवीं सदी की बात है, दुनिया के सबसे दुर्गम नोलाम द्वीप पर तब तक कोई मानव नहीं पहुंचा था। 

*) - बेहतर जहाज़ों और तकनीकों के बल पर दुनिया के तीन शक्तिशाली देशों में वहाँ सबसे पहले पहुँचने की होड़ लगी थी। 

*) - एक देश द्वारा दल भेजे जाने की खबर के तुरंत बाद बाकी दोनों देशों ने भी आनन-फानन में अपने जहाज़ी दस्ते रवाना किये। 

*) - देश A और देश C लगभग एकसाथ वहां पहुंचे। संचार का कोई माध्यम ना होने के कारण अब एक ही रास्ता बचा था। 

*) - A और C के जहाज़ी दलों में एक दूसरे को समाप्त करने के विध्वंसक युद्ध छिड़ गया। 

*) - कुछ घंटो बाद आखिरकार देश C के दल ने देश A के क्रू को ख़त्म करने के साथ-साथ उनका जहाज़ डुबो दिया।

*) - दल C के कप्तान और 4 सदस्य ज़िंदा बच पाए, तभी उन्हें देश B का जहाज़ आता दिखा। 

*) - अब दुनियाभर  में इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है कि दुर्गम नोलाम टापू पर सबसे पहले देश B के लोग पहुँचे। 
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#mohit_trendster #trendybaba #mohitness #freelancetalents

Read Micro Fiction Experiment # 02 

Saturday, November 28, 2015

Micro Fiction Experiment (Kidnap) - Mohit Trendster


Theme: अपहरण (Kidnapping) - Mohit Trendster

*) - बाहरी लोग सही कहते थे जंगली लोग जादू-टोना करते है। दो महीनों तक घने जंगल की गुमनामी में बंधक बना पर्यटकों का दल आज उन्हें बचाने आये कमांडोज़ और उनके अपरहरणकर्ता कबीले वालों के बीच में ढाल बनकर खड़ा था। 

*) - बब्बन पाशा चिंतित था। बड़े गुटों के कुछ आत्मघाती, अपहरण मिशन फेल हुए तो बिल उसके गिरोह के नाम फाड़ दिया गया। अब भारी सुरक्षा से उसने एक विदेशी राजनयिक को अगवा किया तो कोई मान के नहीं दे रहा उल्टा उसके आतंकी संगठन से मिलते जुलते नाम वाले संगठन को श्रेय दिया जा है खबरों में। 

*) - क्रोध में बिलबिलाता पर कुछ करने में असमर्थ मोज़ेस ठगा सा महसूस कर रहा था क्योंकि एक तो वह नास्तिक था और तो राजनीती वगैहरह में नहीं पड़ता था। बेचारा बस एक टेनिस मैच देखने आया था, वो भी जीवन में पहली बार। अब किन्ही धर्मों की लड़ाई में उसको क्यों किडनैप कर लिया गया। 

*) - विभोर ने बंदूकें फिल्मों में ही देखी थी। उसका मन थर-थर काँप रहा था जबकि बाहर से उसका स्थिर-शांत तन तरह-तरह की भाव भंगिमाओं से अपनी 4 साल की बच्ची का समस्या से ध्यान बँटाने और सब ठीक हो जाने का दिलासा देने में लगा था। 

*) - किटकिटाते दांतों से खुद को गरियाने की कोशिश करती गरिमा सोच रही थी कि जहाँ भाग कर आयी उस वीराने में इस दन्त-कुड़कुड़िया सर्दी से बेहतर तो वो गुंडे ही रख रहे थे। 

*) - बंगले के बाहर जमा किडनैपर गुट का मकसद हत्या नहीं था, पर दंगों से उबर रहे शहर में अफवाहें ज़ोरो पर थी। दुछत्ती में छिपे परिवार के अन्य सदस्यों की जान बचाने के लिए माँ ने रो रहे नवजात का गला घोंट दिया। 

*) - अब उसे पता चला कि गिरोह के सरगना ने बंधक से आँखें मिलाने को क्यों मना किया था। जाने क्यों अपने किडनैपर को भी उम्मीदों से देख रहीं थी वो आँखें...कसम से अगर 2 क्षण उन आँखों में और देख लेता तो साइड बदल कर उन्ही का हो जाता। 

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Monday, November 23, 2015

तेज़ाबी बरसात (लघुकथा) - मोहित ट्रेंडी बाबा


डॉक्टर्स द्वारा हफ्ते-दो हफ्ते का समय शेष पता चलने पर विधिचंद अपने जीवन की लंबी शो-रील के साथ गुपचुप बागीचे में बैठे रहते। देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपना संघर्ष, स्वतंत्रता मिलने के बाद देश के लिए सपने, उम्मीदें...फिर समझौते करते अब तक का सफर। 2 दिनों बाद भारी बरसात होने लगी तो उन्हें याद आया कि जीवन की शो-रील में बचपन वाला हिस्सा चलाना रह गया दिमाग में। जाने कितनी बारिशों में गाँव की मित्रमण्डली के साथ की गयी धमाचौकड़ी के दृश्य आज भी उनके ज़हन में ताज़ा थे। नथिंग टू लूज़ सोच लिए वो बचपन के चलचित्र को जीने एक बार फिर से बरसात में भीगने बाहर निकल आये। 

कुछ क्षण बाद ही आँखों और शरीर की जलन यादों पर हावी हुयी और पीछे से बेटे की आवाज़ आई - "पिता जी! सीजन की पहली बारिश है। सल्फर-वल्फर होगा पानी में, एसिड रेन है, अंदर आ जाइए। देखो जलन से आँखों में पानी आ रहा है आपकी।"

 ...पर विधिचंद की आँखों में पानी किसी और वजह से था। 

समाप्त!

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Sunday, November 22, 2015

भ्रम की परत - मोहित ट्रेंडस्टर

किस्मत का साथ ना देना तो अक्सर सुना है पर किस्मत का सूद समेत हिसाब वसूलना कम ही देखने को मिलता है। अवनीश मोहन की आध्यात्म, धर्म, योग व् आयुर्वेद में रूचि थी पर नौकरीपेशा होने के कारण इनमे कम समय दे पाता था। किसी विषय में रूचि होने से आप स्वतः अपने जाननेवालो में उस विषय के अंधों में काणे राजा बन जाते है। विषय के अंधो से वर्षो तक लगातार मिलती तारीफ़ से ऐसे काणे स्वयं को महाज्ञानी-स्कॉलर समझने का भ्रम पाल लेते है। धीरे-धीरे अवनीश में ये अहंकार विकराल रूप धर चुका था। अब अपनी रूचि से बाहर की बातों में भी वो घुसपैठ कर देता और अपनी बातें, निष्कर्ष सामने वाले पर बड़े आक्रामक अंदाज़ में थोपता था। अपनी बात काटे जाने पर तो वो आग उगलता ड्रैगन बन जाता। कभी कबार सब निष्फल होने पर अपना पक्ष ऊपर रखने के लिए उसका आखरी दांव होता कि "अभी बच्चे/नादान हो! मुझे 23 वर्ष का अनुभव है फलाना फील्ड का..."

उनकी यह स्वघोषित ख्याति स्थानीय चैनल में पहुँची और एक विदेशी अनुसंधानकर्ता से योग व आयुर्वेद पर चर्चा हेतु उन्हें आमंत्रित किया गया। निमंत्रण के बाद फूल के डायनासोर हुए अवनीश द्वारा कब चर्चा को बहस में बदल दिया गया पता ही नहीं चला। विदेशी स्कॉलर ने उनकी अनेक धारणाएं, भ्रम गलत साबित किये और उनके ज्ञान को सुपरफिशियल (सतही) करार दिया। इतनी कॉम्प्रीहेंसिव हार के बाद आदतानुसार अवनीश के मुँह से जादुई शब्द निकले - "मुझे 23 साल का अनुभव है ...", सामने बैठे स्कॉलर ने हँसते हुए कहा - "वर्षो में अनुभव को नापा नहीं जा सकता, फिर भी मुझे 23 दुनी 46 वर्षो का अनुभव है इन विषयों के अध्यन्न, अनुसंधान का।"

जीवन की सबसे बड़ी हार और धूलधूसरित अहंकार के साथ दुखी मन से अवनीश घर को चले और रास्ते में खुद को ढाँढस बंधाया कि इंग्लिश प्रोग्राम ज़्यादा लोग नहीं देखेंगे और वह अपने सर्किल के अंधों में काणे राजा बने रहेंगे।

समाप्त!

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Friday, September 4, 2015

सबकी अनैतिक बढ़त - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


अंतर्राष्ट्रीय साइकिल रेस के लिए चुना गया नेचुरल कोर्स शिव के लिए नया नहीं था। आखिर यही वह रास्ता था जहाँ वो वर्षो से प्रतिदिन अभ्यास करता था। उसके मित्रों और जानने वालो को पूरा विश्वास था कि यह रेस जीतकर शिव अंतर्राष्ट्रीय सितारा बन जाएगा। कॉलेज में कुछ हफ्ते पहले ही उसको यह दर्जा मिल गया था। शिव के कोच राजीव मेहरा मानकर बैठे थे कि अगर उस दिन कुछ ऊँच नीच हुयी, तब भी शिव शुरुआती कुछ रेसर्स में आकर बड़ी इनामी राशि अर्जित कर लेगा। स्थानीय कंपनियों में यह बात फैली तो उससे कुछ स्पोंसर्स जुड़ गये। 

रेस का दिन आया और रेस शुरू हुयी। पहले चरण में शिव काफी पीछे रहा, लोगो ने माना कि शायद वह अपनी ऊर्जा बचा रहा है या यह उसकी कोई रणनीति  है। पर रेस ख़त्म होने पर कुशल साइकिलिस्ट शिव औसत 17वें स्थान पर आया। स्थानीय लोगो और उसके करीबियों में अविश्वास और रोष था। जो रेस शुरू होने से पहले लाइमलाईट लेने में सबसे आगे थे, वही कोच और स्पोंसर्स रेस के बाद ताने देने वालो में सबसे आगे थे। जबकि एक शून्य में खोया शिव प्रतियोगिता की घोषणा के दिन से ही अलग उधेड़बुन में था। 

माहौल शांत होने के बाद एक शाम अपने मित्र सुदीप्तो के सामने उसने अपना दिल खोला। 

शिव - "मैंने खुद को बहुत समझाया पर मन को समझा नहीं पाया। मुझे लगा कि एक रास्ता जिसके हर मोड़, उंच-नीच यहाँ तक कि हवाओं की दिशा तक से मैं इतना करीब से परिचित हूँ पर मेरा जीतना अनैतिक होगा, एक चीटिंग होगी बाकी साइकिलिस्टस के साथ। धीरे-धीरे यह बातें मेरे दिमाग पर इतनी हावी हों गयी कि रेस के दिन वो बोझ मेरे पैरों, मेरे शरीर पर महसूस होने लगा और परिणाम तुम जानते ही हो।"

सुदीप्तो - "भाई, पहली बात तो ये कि दिमाग बड़ी कुत्ती चीज़ है, किसी मामले में बिलकुल परफेक्ट और कहीं-कहीं बिलकुल फ़िर जाता है। तो यह जो तुम्हारे साथ हुआ ये किसी के साथ भी हो सकता था। किसी बात में जब हमे सीधा लाभ मिलता है और हम किसी भी रूप में प्रतिस्पर्धा का हिस्सा होतें है तो कभी-कभी अपराधबोध लगता है कि हमे मिली यह बढ़त तो गलत है। पर इस बढ़त को एक मौके की तरह देखो जिसे पाकर तुम अपने और अपने आस-पास के लोगो के लिए एक बेहतर कल सुनिश्चित कर सकते हो। सोचो अगर यह रेस तुम जीतते तो अपने साथ-साथ कई लोगो का जीवन बदल देते और क्या पता आगे इस पूरे कस्बे की तस्वीर बदल देते। जहाँ तक अनैतिक बढ़त या चीटिंग की बात है वह तो तुम अब भी कर रहे हो, बल्कि हम सब करते है।"

शिव - "भला वो कैसे?"

सुदीप्तो - "तुम्हारे साधन-संपन्न माता-पिता है, क्या यह उन लोगो के साथ चीटिंग नहीं जो बचपन में ही अनाथ हो गए या जो किसी स्थिति के कारण गरीब है? तुम 6 फुट और एथलेटिक बॉडी वाले इंसान हों, क्या यह उन लोगो पर अनैतिक प्राकृतिक बढ़त नहीं जो अपाहिज है? तुम्हारे क्षेत्र में शान्ति है, क्या यह देश और दुनिया के उन लोगो पर बढ़त नहीं जिन्हे युद्ध के साये में जीवन काटना पड़ता है?"

शिव - "इस तरह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं।"

सुदीप्तो - "इस तरह सोचोगे तो कभी जीवन में कोई मौका भुना नहीं पाओगे। ऐसे एंगल से सब सोचने लगे तो दुनिया के सारे काम उलट-पुलट जायेंगे। हाँ, हमे कुछ बातों में दूसरो पर प्राकृतिक या अन्य बढ़त हासिल है पर कुछ बातों में दूसरो को लाभ है। पते की बात यह है कि हम स्वयं को बेहतर बनाने में और अपने काम को अच्छे ढंग से करने पर ध्यान दें, अब अगली रेस कि तैयारी करो। गुड लक!"

समाप्त!

- मोहित शर्मा (ज़हन)

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Tuesday, August 25, 2015

श्रीमान सुविधानुसार - मोहित शर्मा (ट्रेंडस्टर) #laghukatha


श्रीमान सुविधानुसार...वैसे तो आमजन की तरह ही हर बात में अपनी सुविधा देखते थे पर दूसरो को शॉर्टकट मारते या कुछ गलत करते हुए देख, दुख और घृणा से बड़े कायदे में सर हिलाते या आपत्ति जताते थे। हाँ, स्वयं वैसा करने पर एक बार भी खुद को नहीं रोकते और पकडे जाने पर अनेक बहाने तैयार रखते। घर पर शनिवार के दिन प्याज जैसे तामसिक पदार्थ के भूलवश खाने में आ जाने पर श्रीमती जी को कानफाडू डेसीबल्स में डांट पिलाई। रोज़मर्रा में ऐसी माइक्रोस्कोपिक गलतियां कुत्ते की चपलता से ढूंढकर बिना वजह क्लेश करने में पेशेवर थे श्री सुविधानुसार जी। चाहे वो कुछ ना बोलें, अपने किसी काम  व्यस्त हों या सो रहे हो पर उनके घर में होने से श्रीमती जी का मंन परेशान ही रहता था कि ना जाने अब कौन सी बात पकड़ लें उनके पति। 

ऑफिस के मित्रों संग श्रीमान गोलगप्पे खाने आये और जैसे बड़े-बुज़ुर्ग कहते है यहाँ किये गलत काम की सज़ा यहीं मिलती है। जो पहला आलू-प्याज-मसालों से भरा पानी बताशा स्वाद की लपलपाहट में श्रीमान जी ने हपक के चाबा, लाखो में एक गोलगप्पे की अतिसख्त सूजी की पापड़ी इनके तालु में ऐसे कोण पर घुसी की खून के स्वाद से भर गया इनका मुहँ। रात में इस घाव को भरने के लिए हल्दी का दूध पीने के लिए एक गिलास उठाते वक़्त वो रैक में काफी पीछे रखे गिलास पर लगी ज़रा सी बर्तन मांझने की साबुन पर श्रीमती जी को ऊँचे स्वर में कोसने लगे। फिर सुविधानुसार झूठा गिलास ज़रा सा उचक कर सिंक में रखने के बजाये रैक में ही रख दिया। 

- मोहित शर्मा (ज़हन) 
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