...is "Celebrating (un)Common Creativity!" Fan fiction, artworks, extreme genres & smashing the formal "Fourth wall"...Join the revolution!!! - Mohit Trendster
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Monday, July 9, 2018

कुबोध (कहानी) #ज़हन


इंटरनेट क्रांति के बाद समान विचार, व्यवसाय और रुचियों वाले लोग काफी करीब आ गये थे। जहाँ किसी और दौर में अनमोल जैसे नये लेखक के लिए स्थापित साहित्यकारों से बात करना सपना होता वहीं अब सोशल मीडिया पर रोज़ बड़े नामों से बातचीत हो जाया करती थी। कुछ बातें लंबी खींच जाती तो कुछ थोड़े शब्दों में निपट जाती। कुछ बड़े नामों को सोशल मीडिया की लत लग गयी थी...पर समस्या यह थी कि वे बड़े नाम थे। अब पूरा दिन ऑनलाइन भी रहना था और आम जनता के लिए खुद को व्यस्त भी दिखाना था। उनकी प्रोफाइल व अक्सर साझा की गयी जानकारी बड़ी अच्छी लगती। ऐसा लगता जैसे हर बात, हर पोस्ट-अपडेट में बड़ा समय दिया गया है। ऐसे ही एक 'कुछ बड़े' सज्जन सुबोध दिखाते कि उन्हें अपनी ऑनलाइन छवि का कोई फर्क नहीं पड़ता पर नामचीन लोगों-कलाकारों के साथ उनकी तस्वीरें, उनको टैग करती लंबी पोस्ट्स देखकर लगता कि उनके सबसे बड़े राज़दार तो सुबोध साहब हैं। मानो अपने सोशल मीडिया के लिए उन्होंने अलग से पी.आर. (जनसंपर्क) अधिकारी रखा हुआ हो। सुबोध की ऑनलाइन जगमगाहट से आकर्षित अनमोल अक्सर उनकी तस्वीरों, बातों और पोस्ट्स पर अपने विचार रखता पर उसे कोई जवाब नहीं मिलता। जबकि सुबोध की बातों पर इतना मज़मा नहीं होता था कि वे कभी अनमोल से बात तक ना कर पायें। उनसे कहीं बड़े और व्यस्त लोग अनमोल की बातों से प्रभावित होकर उससे चर्चा करते रहते थे।

"व्यस्त लेखकों के पास कहाँ समय होता होगा कि सबको जवाब दें।"

ऐसा सोचकर अनमोल बात भूल गया। कई वर्षों तक गाहे बगाहे सुबोध की ऑनलाइन गतिविधि देखने के बाद अनमोल ने गौर किया कि सुबोध अपने साथ काम करने वालों और अपने स्तर से ऊपर के कलाकारों पर ही ध्यान देते हैं....या अगर कोई किसी कारणवश देश या विदेश की ख़बरों में आया हो। अनमोल जैसे बहुत से लोग सुबोध को दिखते नहीं थे। 

अनमोल अपनी रिटेल नौकरी करते हुए लिखता रहा और उसके एकसाथ 3 उपन्यास प्रकाशित हुए। अनमोल जल्द ही बाजार में 'बड़ा नाम' बन गया और उसकी किताबों के अधिकार एक नामी फिल्म निर्माता ने खरीद लिए। खबर आते ही सुबोध का रडार गड़गड़ाया और उन्होंने अनमोल को टैग करते हुए उसकी मेहनत, लगन, फलाना-ढिमका पर ढाई किलोमीटर की पोस्ट कर दी। वह जनता को दिखा रहे थे कि "देखो, मैं एक और बड़े नाम -अनमोल को जानता हूँ।" अनमोल ने सुबोध की पोस्ट की बातें पढ़ी और "भक!" बोलकर...उन्हें ब्लॉक कर मन की शान्ति पायी। 

समाप्त!
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Monday, June 25, 2018

रिक्शेवाली चाची (कहानी)


"डॉक्टर ने तेरी चाची के लिए क्या बताया है?"

मनोरमा ने अपनी देवरानी सुभद्रा के बारे में अपनी 17 वर्षीय बेटी दिव्या से पूछा। 

"मेजर डिप्रेशन बताया है।"

मनोरमा ने तंज कसा, "हाँ, उस झल्ली सी को ही हो सकता है ऐसा कुछ!"

दिव्या अपनी चाची के लिए ऐसे तानों, बातों से उलझन में पड़ जाती थी। 

हर शाम छत पर टहलना दिव्या को पसंद था। पास में पार्क था पर शायद उसकी उम्र अब जा चुकी थी। छत पर उसकी फेवरेट निम्मी दीदी मिल जाती थी। वो दिव्या के संयुक्त परिवार से सटे पी.जी. में  रहकर स्थानीय कॉलेज में इतिहास की प्राध्यापक थी। अक्सर दिनचर्या से बोर होती निम्मी भी दिव्या के परिवार की बातों में रूचि लेती थी। घर के लगभग 2 दर्जन सदस्यों से ढंग से मिले बिना भी निम्मी को उनकीं कई आदतें, किस्से याद हो गये थे। सुभद्रा चाची के गंभीर अवसाद में आने की ख़बर से आज वो चर्चा का केंद्र बन गयीं। 

दिव्या - "बड़ा बुरा लगता है चाची जी के लिए। बच्चा-बड़ा हर कोई उनसे ऐसे बर्ताव करता है..."

निम्मी ने गहरी सांस ली, "औरत की यही कहानी है।"

दिव्या - "अरे नहीं दीदी, यहाँ वो वाली बात नहीं है। सुभद्रा चाची से छोटी 2 चाचियाँ और हैं। मजाल है जो कोई उनको ऐसे बुला दे या उनके पति, दादा-दादी ज़रा ऊँची आवाज़ में हड़क दें। तुरंत कड़क आवाज़ में ऐसा जवाब आता है कि सुनाने वाले की बोलती बंद हो जाती है। किसी ताने या बहस में उनके सख्त हाव भाव....यूँ कूद के पड़ती हैं जैसे शहर की रामलीला में वीर हनुमान असुर वध वाली मुद्रा बनाते हैं। इस कारण उनकी बड़ी ग़लती पर ही उन्हें सुनाया जाता है बाकी बातों में पास मिल जाता है। वहीं सुभद्रा चाची को छोटी बातों तक में कोई भी सुनाकर चला जाता है। चाचा और दादी-दादा हाथ भी उठा लेते हैं। अब ऐसे में बड़ा डिप्रेशन कैसे ना हो?"

निम्मी ने हामी में सिर हिलाते कहा - "हम्म...यानी तुम्हारी सुभद्रा चाची घर की रिक्शावाली हैं।"

दिव्या चौंकी - "हैं? रिक्शेवाली चाची? नहीं समझ आया, दीदी।"

निम्मी - "अरे, समझाती हूँ बाबा! देखो, छोटी बात पर कार या बाइक से उतर कर रिक्शेवालों को थप्पड़ मारते, उन्हें पीटते लोग आम दृश्य है। ऐसे ही मज़दूर, अन्य छोटे कामगारों को पीटना आसान है और लोग अक्सर पीटते भी हैं। वहीं अगर कोई बड़ी बात ना हो तो बाकी लोगो को पीटना जैसे कोई कार में बैठा व्यापारी या बाइक चला रहा मध्यमवर्गीय इंजीनियर मुश्किल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि 'बड़े लोगों' की एक सीमा बन जाती है उनके हाव भाव, पहनावे, बातों से...यह सुरक्षा कवच 'छोटे लोगों' के पास नहीं होता। वो तो बेचारे सबके पंचिंग बैग होते हैं। अन्य लोगो के अहंकार को शांत करने वाला एक स्थाई पॉइंट। ऐसा ही कुछ सीधे लोगों के साथ उनके घर और बाहर होता है। कई बार तो सही होने के बाद भी ऐसे लोग बहस हार जाते हैं।"

दिव्या - "ओह! यानी अपनी बॉडी लैंग्वेज, भोली बातों से चाची ने बाकी सदस्यों को अपनी बेइज़्ज़ती करने और हाथ उठाने की छूट दे दी जो बाकी महिलाओं या किसी छोटे-बड़े सदस्य ने नहीं दी। अगर चाची भी औरों की तरह कुछ गुस्सा दिखातीं, अपने से छोटों को लताड़ दिया करती और खुद पर आने पे पूरी शिद्दत से बहस करती तो उन्हें इज़्ज़त मिलती। फ़िर वो डिप्रेस भी ना होती। दीदी, क्या चाची जैसी नेचर होना अभिशाप है?"

निम्मी ने थोड़ा रूककर सिर ना में हिलाया पर उसका मन हाँ कह रहा था। 

समाप्त!
- मोहित शर्मा ज़हन
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Thursday, April 5, 2018

झूठी भावना पर सच्चा आशीर्वाद (कहानी) #ज़हन

Artwork #WIP by Esmeralda Platania‎

सोशल मीडिया स्टार रूपल के पास कोई ख़ास हुनर नहीं था। अपनी तस्वीरें, निजी ज़िंदगी इंटरनेट के माध्यम से दुनिया को परोसने के बदले में कुछ नाम और पैसा मिल जाया करता था। वैसे उसके कई हज़ार फॉलोवर्स थे पर यहाँ "कुछ" का मतलब उसके जैसी बिना हुनर वाली बड़ी हस्तियों के मुक़ाबले काफी कम। फिर भी स्थानीय स्तर पर उसका अच्छा काम चल जाता था। भावनात्मक मुद्दों पर इंटरनेट से काट-छांट कर बनी उसकी बातें, कई सामाजिक कैंपेन की आड़ लेकर अपने पब्लिसिटी कैंपेन चलाना आदि रूपल की खूबी थी। रूपल की माँ श्रीमती सुनैना लिवर कैंसर से पीड़ित थी। पिछले कई हफ़्तों से वह इस लिवर कैंसर की पोस्ट्स से लोगो की सहानुभूति का लिवरेज ले रही थी। ऐसी भावनात्मक बातों पर आम बातों, फोटोज़ से कहीं ज़्यादा प्रतिक्रिया आती थी। इस वजह से आभासी दुनिया में रूपल के "प्रशंसकों" की संख्या तेज़ी से बढ़ रही थी। रूपल को जब पता चला कि उसकी माँ की बीमारी गंभीर हो चली है और वें अब कुछ ही दिनों की मेहमान हैं तो वह चिंता में पड़ गयी। इधर सुनैना अपनी बच्ची को दिलासा दे रहीं थी कि उनके बिना भी इतना कुछ है दुनिया में वह किसी बात की चिंता ना करे। यहाँ रूपल की चिंता सुनैना की सोच से कुछ अलग थी। 

दो दिन बाद ही सुनैना ने नींद में दुनिया छोड़ दी पर शायद उनकी आत्मा में दुनियादारी का मोह बचा था। इस कारण अपने परिजनों को देखने और उनके मन में झाँकने को रुक गयीं। सब जगह से अच्छी-बुरी यादें, अपनों के मन की बातें टटोल कर आखिर में सुनैना की आत्मा रूपल के पास पहुँची। 

"रो नहीं रही है? ज़रूर सदमा लग गया है बेचारी को! हे भगवान! मेरी लाली ने गुम चोट की तरह अपने ग़म को मन में दबा लिया। ज़रा मन में तो झाँकू इसके..."

रूपल के मन में दंगे चल रहे थे....

"क्या यार! थोड़े दिन बाद नहीं जा सकती थी मम्मी? इतना मटेरियल जमा कर रखा था मैंने....थोड़ा-थोड़ा करके ऑनलाइन डालती। अब खुद उनकी डेथ की अपडेट नहीं कर सकती...सब कहेंगे मातम की जगह नौटंकी कर रही हूँ। काश रश्मि, प्रियंका लोग आ जायें तो वो तो अपनी फोटोज़, अपडेट्स में टैग-मैंशन कर ही देंगी...उनकी फॉलोइंग भी अच्छी है।"

बेटी की नादानी पर सुनैना मुस्कुरा उठी। किसी माँ को अपने बच्चों पर गुस्सा आता ही कहाँ है? जाते-जाते माँ ने रूपल की इच्छा पूरी कर दी...समूह में रूपल की माँ की मौत वाली खबर फैलने से 2-4 नहीं बल्कि दर्जनों रूपल जैसी सोशल मीडिया हस्तियां 'सांत्वना' की कैंडी लेकर उसके घर पहुँची। उस दिन सौइयों फोटो में दिख रही रूपल और उसके दुख की सुनामी में इंटरनेट बह गया। एक घटना से रूपल के इंटरनेट वाले आभासी जानकारों की गिनती लाखों-करोड़ों में पहुँच गयी...माँ का आशीर्वाद जो साथ था।

समाप्त!
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Thursday, December 7, 2017

ख़बरों की ऊपरी सतह


एक नामी कलाकार हैं जिनका नाम नहीं लूँगा, जिनका नाम उनके काम से ना होकर उनकी मार्केटिंग और ब्रांडिंग से हुआ है। थोड़े वर्ष पूर्व अपने क्षेत्र में उन्होंने कुछ व्यंगात्मक काम किये जो देश की व्यवस्था, सरकार पर कटाक्ष थे। ये काम काफी जेनेरिक नेचर के थे यानी आज़ादी के बाद से हर रोज़ देश भर में ऐसे कई व्यंग बनते हैं, चलते हैं, प्रकाशित होते हैं...पर पता नहीं कैसे उनकी 'कला' पर किसी की नज़र पड़ी और उन्हें गिरफ्तार कर कुछ दिनों के लिए जेल भेज दिया गया। छोटी बात पर ना किसी का ध्यान जाता है और ना आसानी से गिरफ्तारी होती है। हाँ, अगर किसी को स्टंट करके करोड़ों की भीड़ (जिनमें हज़ारों ऐसे भी हैं जो वैसी कला बल्कि बेहतर कला दशकों से कर रहें है) से बिना 20-25 वर्ष की मेहनत एक झटके में ऊपर आना है...तो अलग बात है। गिरफ्तारी हुई और उसके फोटो फैले बाकायदा ऐसे जैसे फोटोशूट चल रहा हो। छोटी बात की कुछ दिनों की सजा काट साहब बाहर आये और तब तक ये ख़बर अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया पकड़ चुका था। वहाँ के लोगों ने बिना दिमाग पर ज़ोर डाले इस बात को 'तीसरी दुनिया' के देशों की बर्बरता की श्रेणी में रख दिया और ये कलाकार स्टार बन गया। टीवी, रेडियो पर आने लगा। अच्छी बात है, अगर प्रतिभा नहीं है तो स्टंट के दम पर कुछ समय के लिए ही सुर्ख़ियों में रहा जा सकता है। जो अच्छी बात नहीं हैं वो इसके बाद की है। बात ठंडी होने के बाद इन्होने समाज सुधारक का तमगा ले लिया और उसके आधार पर इनसे जुडी संस्थाओं को फंड मिलने लगे, ऐसी जगहों, आयोजनों पर ये "वक्ता" बन जाने लगे जहाँ विशेषज्ञ भी सोच में पड़ जाये। 

पहली आपत्ति - आम विचारों को स्टंट की आड़ में छुपाकर दार्शनिक बनना। 
दूसरी आपत्ति - दशमलव हुनर लेकर 95-100 प्रतिशत स्तर पर मौजूद कलाकारों की जगह वाली इज़्जत पाना। 
तीसरी आपत्ति - एक स्टंट के बल पर जीवन भर मुफ्त की खाना। 
चौथी आपत्ति - बाद में पैसे के दम पर 'ऑन रिकॉर्ड' काम के मामले में जाने कितने पहाड़ उखाड़ने वाले की तरह पहचाने जाना। 
पांचवी आपत्ति - इस सफलता के बाद बहुत से लोग इस तरह के शॉर्टकट लेने को प्रेरित होंगे।

किसी विषय पर मन बनाने से पहले ख़बरों की ऊपरी सतह को हटाकर ज़रूर देखें।
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Monday, July 10, 2017

विकिपीडिया और बिकाऊ मीडिया के पार की दुनिया (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


नाखून चबाती मशहूर अभिनेत्री मेघना कमल कमरे में इधर-उधर टहल रही थी। फ़ोन पर अपने मैनेजर पर चिल्लाती हुई वो टीवी न्यूज़ चैनल्स बदल-बदल कर खुद पर आ रही खबरों को देखने लगी। पिछली रात पास के अपार्टमेंट में से किसी ने उसकी एक वीडियो बनाई थी जिसमें वो एक पिल्ले को किक मारती हुई अपने बंगले से बाहर कर रही थी। शुरुआत में हरकत कर रहा पिल्ले का शरीर मेघना की 5-7 लातें खाने के बाद निर्जीव हो गया। विडिओ पर ना सिर्फ जानवर के अधिकारों वाली संस्थाओं की तीखी प्रतिक्रिया आ रही थी बल्कि देश-विदेश की जनता मेघना की इस हरकत से गुस्से में थी। बड़े निर्माताओं, निर्देशकों पर मेघना को अपनी फिल्मों से बाहर करने, कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का दबाव बढ़ रहा था। कुछ ही देर में मेघना के घर के बाहर मीडिया का तांता लग गया। 

मेघना ने अपने पिता और बीते ज़माने के सुपरस्टार अभिनेता हरीश कमल को फ़ोन किया। 
"पापा...आई ऍम सॉरी, मेरी वजह से आपका नाम भी उछल रहा है। नशे में करियर बर्बाद कर लिया! सब ख़त्म हो गया!"

हरीश शांत स्वर में मेघना को समझाने लगे - "चिंता मत कर मेघू बेटे! ऐसे करियर बर्बाद होने लगते तो मैं कबका एक्टिंग छोड़ चुका होता। तेरा वीडियो मैंने देखा है। एक पार्सल भेजा है तुझे, बाकी फ़ोन पर नहीं समझाऊंगा। अपने मैनेजर और टीम को बुला ले उन्हें समझा दिया है, उनकी बात ध्यान से सुनकर वैसा ही करना... "

उस शाम मेघना ने अपने घर पर ही प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी। कुछ सवालों के जवाब देने के बाद वह अपनी रिहर्स की हुई लाइनों पर आ गई। 

"मैं जानती थी कि भारत के ज़्यादातर लोगो की जो मानसिकता हैं उनसे मुझे ऐसी ही प्रतिक्रिया मिलेगी। कल रात मैंने जानबूझ कर एक रोबोटिक खिलौने पप्पी को मारा, जो दूर से एकदम असली लगता है। यह देखिये इस पार्सल में उस से मिलता-जुलता खिलौना है। मेरा उद्देश्य लोगो में निरीह जानवरों के अधिकार, उनपर होने वाली हिंसा, मानव आबादी से कम होते जंगलों के लिए जागरूकता बढ़ाना था और देश क्या पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए इस स्टंट से बेहतर मुझे कोई उपाय नहीं लगा। इस बीच मुझे चुभने वाली एक सच्चाई का सामना करना पड़ा, एक लड़की के लिए चाहे वो एक सफल अभिनेत्री ही सही इस देश के लोग अपनी छोटी सोच दिखा ही देते हैं। भारत के लोगो और कई सेलेब्रिटीज़ की बातों ने मुझे आहत किया है।"

इतना कहते ही मेघना प्रेस वार्ता में रोने लगी। कैमरों की चमक से आँगन जगमगा उठा। हर ओर मेघना की तारीफ़ और चर्चे थे। इस घटना के बाद मेघना को कुछ अवार्ड मिले, तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने मेघना को अपना गुडविल एम्बेस्डर बनाया और वो बड़े बजट निर्माताओं की पहली पसंद बन गयी। एक दिन हरीश कमल ने मेघना को हँसते हुए बताया कि मेघना का किया कांड तो कुछ भी नहीं उन्होंने अपने समय में कितने कानून तोड़े, लोगो को गायब तक करवाया पर आज भी देश उन्हें पूजता है। 

समाप्त!
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Image - Watercolor Painting by artist Shilpi Mathur
#mohitness #mohit_trendster

Wednesday, December 28, 2016

नशेड़ी औरत (कविता)


कितने चेहरो में एक वो चेहरा था…
नशे में एक औरत ने कभी श्मशान का पता पूछा था…
आँखों की रौनक जाने कहाँ दे आई वो,
लड़खड़ाकर भी ठीक होने के जतन कर रही थी जो। 
किस गम को शराब में गला रही वो,
आँसू लिए मुस्कुरा रही थी जो।

अपनी शिकन देखने से डरता हूँ,
इस बेचारी को किस हक़ से समझाऊं?
झूठे रोष में उसे झिड़क दिया,
नज़रे चुराकर आगे बढ़ गया।

आज फिर मेरा रास्ता रोके अपना रास्ता पूछ रही है….
ठीक कपड़ो को फिर ठीक कर रही है….
हिचकियां नशे की,
पगली कहीं की!

“क्या मिलता है नशे में?”

“उसे रोज़ बुलाती,
थक जाने तक चिल्लाती, 
नशे में वो मर गया, 
मेरा जी खाली कर गया। 
पीकर आवाज़ लगाने पर आता है,
मन भरने तक बतियाता है,
अब आप जाओ साहब!
मेरा पराये मरद से बात करना उसे नहीं भाता है।”

 - मोहित शर्मा ज़हन

Tuesday, July 19, 2016

स्वर्ण बड़ा या पीतल? (कहानी)

शीतकालीन ओलम्पिक खेलों की स्पीड स्केटिंग प्रतिस्पर्धा में उदयभान भारत के लिए पदक (कांस्य पदक) जीतने वाले पहले व्यक्ति बने। यह पदक इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योकि भारत में शीतकालीन खेलों के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। मौसम के साथ देने पर हिमांचल, कश्मीर जैसे राज्यों में कुछ लोग शौकिया इन खेलों को खेल लेते थे। भारत लौटने पर उदयभान का राजा की तरह स्वागत हुआ। राज्य और केंद्र सरकार की तरफ से उन्हें 35 लाख रुपये का इनाम मिला। साथ ही स्थानीय समितियों द्वारा छोटे-बड़े पुरस्कार मिले। जीत से उत्साहित मीडिया और सरकार का ध्यान इन खेलों की तरफ गया और चुने गए राज्यों में कैंप, इंडोर स्टेडियम आदि की व्यवस्था की गयी। खेल मंत्रालय में शीतकालीन खेलों के लिए अलग समिति बनी। इस मेहनत और प्रोत्साहन का परिणाम अगले शीतकालीन ओलम्पिक खेलों में देखने को मिला जब उदयभान समेत भारत के 11 खिलाडियों ने अपने नाम पदक किये। उदयभान ने अपना प्रदर्शन पहले से बेहतर करते हुए स्वर्ण पदक जीता। 

जब मीडियाकर्मी, उदयभान के घर पहुंचने पर उनका और परिवार का साक्षात्कार लेने आये तो उदयभान के माता-पिता कुछ खुश नहीं दिखे। कारण -

"रे लाला ने इतनी मेहनत की! पहले से जादा लगा रहा...गोल्ड जित्ता, फेर भी पहले से चौथाई पैसा न दिया सरकारों ने। यो के बात हुई? इस सोने से बढ़िया तो वो पीतल वाला मैडल था।"

उदयभान के साथ सभी मीडियाकर्मियों में मुस्कराहट फ़ैल गयी। पहले स्पॉटलाइट में उदयभान पहला और अकेला था...अब उसका पहला होना रिकॉर्ड बुक में रह गया और उसके साथ 10 खिलाडी और खड़े थे। जिस वजह से उसे पहले के कांस्य जीतने पर जितने अवार्ड और पैसे मिले थे, उतने इस बार स्वर्ण जीतने पर नहीं मिले। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

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Read टप...टप...टप...(हॉरर) Story - Mohit Trendster Archives

Sunday, July 3, 2016

कला की डोर (लघुकथा) - मोहित शर्मा ज़हन

रोज़ की तरह मंदिर के पास से घंटो भजन गा कर उठ रहे बुज़ुर्ग को पंडित जी ने रोका। 

पंडित जी - "बाबा मैंने सुना आपकी पेंशन आपका नकारा लड़का और बहु खा रहे हैं। आप घर से सटे टीन शेड में सोते हो?"

बाबा - "हाँ, शायद अपने ही कर्म होंगे पहले के जो सामने आ रहे हैं।"

पंडित जी - "तो पड़ोसी-पुलिस-रिश्तेदार किसी से बात करो। ठीक से खाना भी नहीं देते वो लोग आपको...यहाँ छोटी सी जगह गाने आते रहोगे तो मर जाओगे किसी दिन।"

बाबा - "पंडित जी, ऐसी हालत में मर तो बहुत पहले जाना चाहिए था पर कलाकार जो ठहरा, कला की डोर पकड़े जीवन चला रहा हूँ...खाने का तो पता नहीं पर यहाँ न आया तब मर जाऊंगा।"

समाप्त!

Art - Jorgina Sweeney

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Author Note - कुछ रचनात्मक लोगो को सामान्य दृष्टि से अलग कामो से संतुष्टि मिलती है। ऐसे काम जो सामान्य लोगो द्वारा धन-सम्पत्ति-यश जुटाने की तरफ बढ़े कदमों से परे एक अलग दुनिया में काल्पनिक महल करने से प्रतीत होते हैं। दूर से उनको देखकर हँसी आती है पर अगर गलती से आप उनकी दुनिया में भटक जाएं तो आपको एक ऐसा शिल्पकार दिखेगा जो हर दिन-हर घंटे-हर मिनट अपनी कला में तल्लीन रहता है। सामान्य दुनिया में आने पर उसमे एक शून्यता, अनुपस्थिति सी दिखाई देती है यह उसकी कल्पना के बंधन होते हैं जो उसे बेचैन रखते हैं। तभी अक्सर ऐसे लोग आम दुनिया में पिछड़ जाते हैं और फिर भी कई आगे बढ़े लोगो से सुखी दिखाई पड़ते हैं।

Sunday, June 26, 2016

Featured | DK Boss/Se7enth Sense (the artworks) | Artist Dheeraj Kumar

Creative Artist Dheeraj Dkboss Kumar is an Indian Graphic Designer, Colorist and Illustrator. 

Qualifications: Bachelor of Fine Arts (BFA) - 2004-2008 , Allrounder of Applied Art - 2008, AD3D+ (complete animation course) - 2008-2010. 

Awards and Accolades: 24FPS Animation Awards for Best Story and Best Movie (Winner), Indian Comics Fandom Awards 2013 - Colorist (Silver), Indian Comics Fandom Awards 2014 - Cartoonist (Gold), Indian Comics Fandom Hall of Fame 2014. 

Location - Lucknow, India. FB page - DK Boss/Se7enth Sense (the artworks)
Here are some of his works....




Webcomic - Jhoomritallaiyaa

Sunday, June 19, 2016

अकूत संपत्ति (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


2 पुराने दोस्त राजीव मेहरा और मयंक शर्मा 18-20 सालों बाद मिले थे। भाग्य के फेर से अपनी ज़िंदगियों में काफी व्यस्त और एक-दूसरे से हज़ारों किलोमीटर दूर की शुरू के कुछ सालों बाद दोनों जैसे भूल ही गए अपने जिगरी यार के हाल-चाल लेना। इतने समय में कई चीज़ें बदल गयीं थी। अब प्रौढ़ अवस्था में वो किशोरों वाली फुर्ती नहीं थी और न ही हर बात पर ठहाके-ठिठोली। हाँ, पर दोनों की आँखों में वही पहले वाली चमक थी। बातें करते-करते दोनों छत पर आ गए, किनारे चेस बोर्ड और प्यादे पड़े थे। 

मयंक - "यार पहले की तरह उछला-कूदा नहीं जा सकता पर चेस तो खेल ही सकते हैं। आ बैठ चारपाई पे!"

दोनों चेस की बाज़ी के साथ जीवन की बातें करने लगे। 

राजीव - "भाई बड़ा मलाल हो रहा है। एक प्रॉपर्टी मुझे 4 साल पहले 37 लाख की मिल रही थी, मैंने तब ली नहीं किसी और चक्कर मे पड़ा था। उसके आस-पास कुछ सोसाइटी अप्रूव हो गईं, हाई-वे बन गया अब कीमत 8 करोड़ है उसकी। उस समय इधर ध्यान दिया होता, नादानी न की होती तो आज तेरा भाई आराम से रिटायर होता।"

मयंक - "बुरा हुआ!...तेरी बात से याद आया मैंने भी करोड़ो-अरबों की संपत्ति गंवा दी अपने हट और नादानी की वजह से।"

राजीव - "मज़ाक मत कर यार! मैं तुझे जानता हूँ... तू ठहरा एक साधु आदमी, ये प्रॉपर्टी वगैहरह में तू कभी नहीं पड़ने वाला।"

मयंक - "सोनिया देशपाल का नाम सुना है?"

राजीव - "हाँ, वो बैडमिंटन मे वर्ल्ड नंबर वन ना? अभी ओलिम्पिक मे कोई मेडल भी जीता है बच्ची ने..."

मयंक - "हाँ, वही! अंदर 14 नेशनल मीट में मेरी 12 साल की बच्ची रूपल ने अपनी सीनियर सोनिया को फाइनल मे हराया था। पढ़ाई मे औसत थी वो और क्लास 7 बड़ी मुश्किल से पास करवाई थी हमने उसे। टूर्नामेंट के बाद उसके क्लास 8 के पेपर थे, उसका ध्यान न डिगे इसलिए नेशनल मीट के बाद मैंने और तेरी भाभी ने इसे इतना मारा और सुनाया की उसने बैडमिंटन छोड़ दिया और यही हम चाहते थे।"

राजीव - "ओह! भाई ये तो बड़ी गलती हो गई! आज शायद रूपल भी सोनिया जैसे मेडल ला रही होती, बाहर के टूर्नामेंट जीत रही होती...पर तूने तो सिर्फ छोटी निवेदिता से मिलवाया। रूपल कहाँ है?"

मयंक - "उसके कुछ दिन बाद तनाव में रूपल ने आत्महत्या कर ली...अरबों-खरबों की संपत्ति, अपनी परी को मैंने अपने पागलपन में गंवा दिया।"

समाप्त!

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#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelancetalents #freelance_talents

Wednesday, May 25, 2016

बाज़ीगरनी (लघुकथा) - लेखक मोहित शर्मा ज़हन


अक्सर सही होकर भी बहस में हार जाना दीपा की आदत तो नहीं थी, पर उसका बोलने का ढंग, शारीरिक भाषा ऐसी डरी-दबी-कुचली सी थी कि सही होकर भी उसपर ही दोष आ जाता था। जब वह गलत होती तब तो बिना लड़े ही हथियार डाल देती। आज उसकी एफ.डी. तुड़वा कर शेयर में पैसा लगाने जा रहे पति से हो रही उसकी बहस में उसके पास दमदार तर्क थे। 

"आप...आपने पहले ही कितना पैसा गंवाया है शेयर्स में! ये एफ.डी. इमरजेंसी के लिए रख लेते हैं ना? वो...आप दोबारा जोड़ कर लगा लेना पैसे शेयर में।"

"अरे चुप! पति एकसाथ तरक्की चाह रहा है और तू वही चिंदी चोरी जोड़ने में लगी रहियों। तेरी वजह से मेरी अक्ल पर भी पत्थर पड़ जाते हैं!"

"मेरी वजह से? मैंने...क्या किया? मैंने कुछ नहीं किया!"

...और इस तरह दीपा ने एक बार फिर से जीत के मुंह से हार छीन ली। अपनी आदत उसे पता थी और इस बार उसे हार नहीं माननी थी। 

कुछ देर बाद पति पैसे लेकर बाहर निकला तो 2 नकाबपोश बाइक सवार उसका झोला झपट के चले गए। पति ओवरलोडेड इंजन की तरह आवाज़ निकालता थाने गया और वो 2 बाइक सवार दीपा को झोला पकड़ा कर चले गए। दीपा ने अपने भाई को सारी बात बताई और भाई ने अपने दोस्त भेज कर दीपा को हार कर भी जीतने वाली बाज़ीगर बनवाई। 

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents #freelancetalents

Sunday, March 6, 2016

बाइनरी मम्मी (लघुकथा) - लेखक मोहित शर्मा ज़हन

नेत्र रोग डॉक्टर के पास, अपने 5 वर्ष के बच्चे के साथ चिंतित माँ-बाप बैठे थे। 

माँ - "सीनू के पापा को मोटे वाला डबल-लेंस चश्मा लगा था तो इसे भी चश्मा ना लगे इसलिए नियमित गाजर का जूस, विटामिन और सारे घरेलु नुस्खे करती थी। फिर भी पता नहीं कैसे इसे इतनी कम उम्र में ही धुंधला दिखने लगा?"

डॉक्टर - "बच्चे को ज़रुरत से अधिक विटामिन A देने की वजह से उसे हाइपरविटामिनोसिस-ए विकार हो गया है। जिस से उसका लिवर, हड्डियां कमज़ोर हो गयी हैं और उसकी दृष्टि पर असर पड़ा है।"

महिला का पति सोचने लगा कि घर के अन्य सदस्यों में भी उसकी पत्नी ने किसी न किसी विटामिन का हाइपरविटामिनोसिस करवा रखा होगा। एक बार खुद पत्नी को किसी ने अनीमिया के लक्षण बता दिए, तबसे अब तक पता नहीं देश का कितना लोखंड खा चुकी होगी। तभी महिला की आवाज़ से उसका ध्यान टूटा। 

"आज से गाजर का जूस बंद!"  

समाप्त!

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Art - Shivani Ramaiah
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Saturday, February 27, 2016

इंटरनेटी अफवाह (लघुकथा) - मोहित ट्रेंडस्टर

प्राइम टाइम न्यूज़ का सेट, जिसपर लाइव देश का प्रख्यात पत्रकार-एंकर आनंद कुमार। 

"...और ब्रेक से पहले जैसा हम चर्चा कर रहे थे इंटरनेट की विश्वसनीयता और वहां फैले झूठ, अफवाहों की। पिछले बुलिटिन में ही हमने आपको खबर दी थी कि गुमनामी में रहने वाले प्रख्यात लेखक सोहन वर्मा की हृदयघात से मौत हो गयी है जबकि कुछ देर पहले हमारे पत्रकार ने उनसे मिलकर उनके ठीक होने की पुष्टि की है। सोशल मीडिया पर अच्छी फोर्मैटिंग और भाषा-शैली की अफवाहों से धोखे में ना पड़े।"

अपनी फैन फॉलोइंग द्वारा उसके हर अंदाज़ की तारीफ से जन्मी आत्म मुग्धता में आनंद ने प्रोटोकॉल से बाहर आकर चुटकी ली। 

"यह देखिये अभी तक हमारे स्टूडियो का टेली प्रॉम्पटर सोहन जी की मृत्यु का समाचार दिखा रहा है। हा हा हा... लगता है आज टीम ने चाय-कॉफी नहीं ली।"

सामने गुस्से में प्रोडूसर से भी प्रोटोकॉल टूट गयी और वो चिल्ला कर बोला।

"अबे! इस बार वो सच में मर गए हैं।"


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Monday, December 7, 2015

नासमझ इतिहास - Micro Fiction Experiment # 03 #mohitness

*) - अठारवीं सदी की बात है, दुनिया के सबसे दुर्गम नोलाम द्वीप पर तब तक कोई मानव नहीं पहुंचा था। 

*) - बेहतर जहाज़ों और तकनीकों के बल पर दुनिया के तीन शक्तिशाली देशों में वहाँ सबसे पहले पहुँचने की होड़ लगी थी। 

*) - एक देश द्वारा दल भेजे जाने की खबर के तुरंत बाद बाकी दोनों देशों ने भी आनन-फानन में अपने जहाज़ी दस्ते रवाना किये। 

*) - देश A और देश C लगभग एकसाथ वहां पहुंचे। संचार का कोई माध्यम ना होने के कारण अब एक ही रास्ता बचा था। 

*) - A और C के जहाज़ी दलों में एक दूसरे को समाप्त करने के विध्वंसक युद्ध छिड़ गया। 

*) - कुछ घंटो बाद आखिरकार देश C के दल ने देश A के क्रू को ख़त्म करने के साथ-साथ उनका जहाज़ डुबो दिया।

*) - दल C के कप्तान और 4 सदस्य ज़िंदा बच पाए, तभी उन्हें देश B का जहाज़ आता दिखा। 

*) - अब दुनियाभर  में इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है कि दुर्गम नोलाम टापू पर सबसे पहले देश B के लोग पहुँचे। 
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#mohit_trendster #trendybaba #mohitness #freelancetalents

Read Micro Fiction Experiment # 02 

Saturday, November 28, 2015

Micro Fiction Experiment (Kidnap) - Mohit Trendster


Theme: अपहरण (Kidnapping) - Mohit Trendster

*) - बाहरी लोग सही कहते थे जंगली लोग जादू-टोना करते है। दो महीनों तक घने जंगल की गुमनामी में बंधक बना पर्यटकों का दल आज उन्हें बचाने आये कमांडोज़ और उनके अपरहरणकर्ता कबीले वालों के बीच में ढाल बनकर खड़ा था। 

*) - बब्बन पाशा चिंतित था। बड़े गुटों के कुछ आत्मघाती, अपहरण मिशन फेल हुए तो बिल उसके गिरोह के नाम फाड़ दिया गया। अब भारी सुरक्षा से उसने एक विदेशी राजनयिक को अगवा किया तो कोई मान के नहीं दे रहा उल्टा उसके आतंकी संगठन से मिलते जुलते नाम वाले संगठन को श्रेय दिया जा है खबरों में। 

*) - क्रोध में बिलबिलाता पर कुछ करने में असमर्थ मोज़ेस ठगा सा महसूस कर रहा था क्योंकि एक तो वह नास्तिक था और तो राजनीती वगैहरह में नहीं पड़ता था। बेचारा बस एक टेनिस मैच देखने आया था, वो भी जीवन में पहली बार। अब किन्ही धर्मों की लड़ाई में उसको क्यों किडनैप कर लिया गया। 

*) - विभोर ने बंदूकें फिल्मों में ही देखी थी। उसका मन थर-थर काँप रहा था जबकि बाहर से उसका स्थिर-शांत तन तरह-तरह की भाव भंगिमाओं से अपनी 4 साल की बच्ची का समस्या से ध्यान बँटाने और सब ठीक हो जाने का दिलासा देने में लगा था। 

*) - किटकिटाते दांतों से खुद को गरियाने की कोशिश करती गरिमा सोच रही थी कि जहाँ भाग कर आयी उस वीराने में इस दन्त-कुड़कुड़िया सर्दी से बेहतर तो वो गुंडे ही रख रहे थे। 

*) - बंगले के बाहर जमा किडनैपर गुट का मकसद हत्या नहीं था, पर दंगों से उबर रहे शहर में अफवाहें ज़ोरो पर थी। दुछत्ती में छिपे परिवार के अन्य सदस्यों की जान बचाने के लिए माँ ने रो रहे नवजात का गला घोंट दिया। 

*) - अब उसे पता चला कि गिरोह के सरगना ने बंधक से आँखें मिलाने को क्यों मना किया था। जाने क्यों अपने किडनैपर को भी उम्मीदों से देख रहीं थी वो आँखें...कसम से अगर 2 क्षण उन आँखों में और देख लेता तो साइड बदल कर उन्ही का हो जाता। 

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Monday, November 23, 2015

तेज़ाबी बरसात (लघुकथा) - मोहित ट्रेंडी बाबा


डॉक्टर्स द्वारा हफ्ते-दो हफ्ते का समय शेष पता चलने पर विधिचंद अपने जीवन की लंबी शो-रील के साथ गुपचुप बागीचे में बैठे रहते। देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपना संघर्ष, स्वतंत्रता मिलने के बाद देश के लिए सपने, उम्मीदें...फिर समझौते करते अब तक का सफर। 2 दिनों बाद भारी बरसात होने लगी तो उन्हें याद आया कि जीवन की शो-रील में बचपन वाला हिस्सा चलाना रह गया दिमाग में। जाने कितनी बारिशों में गाँव की मित्रमण्डली के साथ की गयी धमाचौकड़ी के दृश्य आज भी उनके ज़हन में ताज़ा थे। नथिंग टू लूज़ सोच लिए वो बचपन के चलचित्र को जीने एक बार फिर से बरसात में भीगने बाहर निकल आये। 

कुछ क्षण बाद ही आँखों और शरीर की जलन यादों पर हावी हुयी और पीछे से बेटे की आवाज़ आई - "पिता जी! सीजन की पहली बारिश है। सल्फर-वल्फर होगा पानी में, एसिड रेन है, अंदर आ जाइए। देखो जलन से आँखों में पानी आ रहा है आपकी।"

 ...पर विधिचंद की आँखों में पानी किसी और वजह से था। 

समाप्त!

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Sunday, November 22, 2015

भ्रम की परत - मोहित ट्रेंडस्टर

किस्मत का साथ ना देना तो अक्सर सुना है पर किस्मत का सूद समेत हिसाब वसूलना कम ही देखने को मिलता है। अवनीश मोहन की आध्यात्म, धर्म, योग व् आयुर्वेद में रूचि थी पर नौकरीपेशा होने के कारण इनमे कम समय दे पाता था। किसी विषय में रूचि होने से आप स्वतः अपने जाननेवालो में उस विषय के अंधों में काणे राजा बन जाते है। विषय के अंधो से वर्षो तक लगातार मिलती तारीफ़ से ऐसे काणे स्वयं को महाज्ञानी-स्कॉलर समझने का भ्रम पाल लेते है। धीरे-धीरे अवनीश में ये अहंकार विकराल रूप धर चुका था। अब अपनी रूचि से बाहर की बातों में भी वो घुसपैठ कर देता और अपनी बातें, निष्कर्ष सामने वाले पर बड़े आक्रामक अंदाज़ में थोपता था। अपनी बात काटे जाने पर तो वो आग उगलता ड्रैगन बन जाता। कभी कबार सब निष्फल होने पर अपना पक्ष ऊपर रखने के लिए उसका आखरी दांव होता कि "अभी बच्चे/नादान हो! मुझे 23 वर्ष का अनुभव है फलाना फील्ड का..."

उनकी यह स्वघोषित ख्याति स्थानीय चैनल में पहुँची और एक विदेशी अनुसंधानकर्ता से योग व आयुर्वेद पर चर्चा हेतु उन्हें आमंत्रित किया गया। निमंत्रण के बाद फूल के डायनासोर हुए अवनीश द्वारा कब चर्चा को बहस में बदल दिया गया पता ही नहीं चला। विदेशी स्कॉलर ने उनकी अनेक धारणाएं, भ्रम गलत साबित किये और उनके ज्ञान को सुपरफिशियल (सतही) करार दिया। इतनी कॉम्प्रीहेंसिव हार के बाद आदतानुसार अवनीश के मुँह से जादुई शब्द निकले - "मुझे 23 साल का अनुभव है ...", सामने बैठे स्कॉलर ने हँसते हुए कहा - "वर्षो में अनुभव को नापा नहीं जा सकता, फिर भी मुझे 23 दुनी 46 वर्षो का अनुभव है इन विषयों के अध्यन्न, अनुसंधान का।"

जीवन की सबसे बड़ी हार और धूलधूसरित अहंकार के साथ दुखी मन से अवनीश घर को चले और रास्ते में खुद को ढाँढस बंधाया कि इंग्लिश प्रोग्राम ज़्यादा लोग नहीं देखेंगे और वह अपने सर्किल के अंधों में काणे राजा बने रहेंगे।

समाप्त!

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Sunday, October 25, 2015

किसका कठिन काम (लघुकथा) - मोहित शर्मा (ज़हन)


कल कंपनी की क्वार्टर क्लोजिंग होने के कारण संदीप, राघव और प्रखर को देर रात तक रुक कर काम और खाते निपटाने के आदेश मिले थे। त्यौहार की लगातार छुट्टियों के तुरंत बाद क्लोजिंग उनके शिथिल शरीरों और दिमागों को अल्सर की तरह दर्द दे रही थी। दफ्तर, बॉस, फाइल्स, लैपटॉप, बांग्लादेशी प्रवासी, केंद्र सरकार, ससुर-साले-पडोसी सबको जी भर कोसते हुए, मन मसोस कर तीनो सहकर्मी काम पर लगे। आधी रात के बाद तक काम पूरा कर तीनों घर जाने से पहले ऑफिस के पास चाय की दुकान पर रुके। 

राघव ने थकी आवाज़ में कहा - “तीन चाय और बंद-मक्खन।”

चाय वाले के बारह वर्षीय साहबज़ादे बाहर आये - “अभी बापू लेट गए, कल आना।”

“अच्छा अब ऐसे लोग भी अकड़ दिखाएंगे हमें।” प्रखर की गुस्से भरी हुंकार निकली। 

राघव की थकान को उसके अहं ने दबाया - “नहीं आना कल से यहाँ, ना किसी ऑफिस वाले को आने देंगे। सर पे चढ़ा लो तो औकात ही भूल जाते है लोग।”

संदीप ने भी अपना मतदान किया - “ भक  @#$%^!  उठा अपने बाप को। चरसी कहीं के, लोट जायेंगे जब मन करे। कभी इतनी मेहनत, ओवरटाइम करना पड़े तब पता चले।”

अँधेरे की आड़ में चाय वाले के पडोसी रिक्शाचालक ने कहा - “बाबूजी, गरीब पर दया करो!  आपके ऑफिस में ओवरटाइम महीने-दो महीने में होता है, उसके ऑफिस में तो रोज़ ओवरटाइम है।”

“छोटे” मुंह से निकली बड़ी बात को समझने में कुछ क्षण लगे संदीप, प्रखर और राघव को पर डेढ़ गरीबों पर तीन भोकाली युवको का जनमत हावी हुआ और खुद को सही घोषित करते हुए, गालियां देते हुए तीनो सहकर्मियों ने प्रस्थान किया।  

- मोहित शर्मा ज़हन 

#mohit_trendster #trendybaba #mohitness

P.S. Picture: I still play with toys, sketches....