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Thursday, June 20, 2019

रूठ लो... #Ghazal


कुछ रास्तों की अपनी जुबां होती है,
कोई मोड़ चीखता है,
किसी कदम पर आह होती है…

पूछे ज़माना कि इतने ज़माने क्या करते रहे?

ज़हरीले कुओं को राख से भरते रहे,
फर्ज़ी फकीरों के पैरों में पड़ते रहे,
गुजारिशों का ब्याज जमा करते रहे,
हारे वज़ीरों से लड़ते रहे…
और …खुद की ईजाद बीमारियों में खुद ही मरते रहे!

रास्तों से अब बैर हो चला,
तो आगे बढ़ने से रुक जाएं क्या भला?
धीरे ही सही ज़िंदगी का जाम लेते हैं,
पगडण्डियों का हाथ थाम लेते हैं…

अब कदमों में रफ़्तार नहीं तो न सही,
बरकत वाली नींद तो मिल रही,
बारूद की महक के पार देख तो सही…
नई सुबह की रौशनी तो खिल रही!

सिर्फ उड़ना भर कामयाबी कैसे हो गई?
चलते हुए राह में कश्ती तो नहीं खो गई?
ज़मीन पर रूककर देख ज़रा तसल्ली मिले,
गुड़िया भरपेट चैन से सो तो गई…

कुछ फैसलों की वफ़ा जान लो,
किस सोच से बने हैं…ये तुम मान लो,
कभी खुशफहमी में जो मिटा दिए…वो नाम लो!

किसका क्या मतलब है…यह बरसात से पूछ लो,
धुली परतों से अपनों का पता पूछ लो…
अब जो बदले हो इसकी ख़ातिर,
अपने बीते कल से थोड़ा रूठ लो…
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#ज़हन

*Published - Ghazal Dhara (June 2019)

Wednesday, December 28, 2016

नशेड़ी औरत (कविता)


कितने चेहरो में एक वो चेहरा था…
नशे में एक औरत ने कभी श्मशान का पता पूछा था…
आँखों की रौनक जाने कहाँ दे आई वो,
लड़खड़ाकर भी ठीक होने के जतन कर रही थी जो। 
किस गम को शराब में गला रही वो,
आँसू लिए मुस्कुरा रही थी जो।

अपनी शिकन देखने से डरता हूँ,
इस बेचारी को किस हक़ से समझाऊं?
झूठे रोष में उसे झिड़क दिया,
नज़रे चुराकर आगे बढ़ गया।

आज फिर मेरा रास्ता रोके अपना रास्ता पूछ रही है….
ठीक कपड़ो को फिर ठीक कर रही है….
हिचकियां नशे की,
पगली कहीं की!

“क्या मिलता है नशे में?”

“उसे रोज़ बुलाती,
थक जाने तक चिल्लाती, 
नशे में वो मर गया, 
मेरा जी खाली कर गया। 
पीकर आवाज़ लगाने पर आता है,
मन भरने तक बतियाता है,
अब आप जाओ साहब!
मेरा पराये मरद से बात करना उसे नहीं भाता है।”

 - मोहित शर्मा ज़हन

Friday, October 7, 2016

Watercolor Painting - Roots


Namastey! These days I am sharing some ideas with talented artist friend Jyoti Singh. She wants to create dozens of watercolor, oil and acrylic paintings for exhibitions,  art lovers before the first quarter of 2017. So, I am giving her inputs, visuals on a regular basis. I am loving this brainstorming exercise. This (Watercolor-A3) is one of the paintings based on my ideas. Title - Roots 

What inferences did you make from this....

Friday, July 22, 2016

अर्द्धअच्छा काम (कहानी)

दिनेश ऑफिस से थका हारा घर पहुंचा। उसकी पत्नी रूपाली जो 1 महीने बाद अपने मायके से लौटी थी, उसके पास आकर बैठी। दोनों बीते महीने की बातें करने लगे। फिर दिनेश ने महीने की बातों के अंत के लिए एक किस्सा बचा कर रखा था। "परसो एक आदमी फ़ोन पर बात कर रहा था। जल्दबाज़ी में ऑफिस के बाहर बैग छोड़ गया, मैंने फिर वापस किया...नहीं तो काफी नुक्सान हो जाता बेचारे का।"

रूपाली - "अरे वाह...प्राउड ऑफ़ यू! आखिर पति किसके हो! पर इसमें क्या ख़ास बात है जो बताने से पहले इतना हाइप बना रहे थे?"

दिनेश - "पहले मैंने बैग चेक किया। उसमे वीडियो कैमरा, डाक्यूमेंट्स, 75 हज़ार रुपये, घडी-कपडे टाइप सामान था। तो 17 हज़ार रुपये निकाले बाकी सामान एक बंदे से उसके पते पर छुड़वा दिया।"

रुपाली - "हौ! चोर! ऐसा क्यों किया? गलत बात!"

दिनेश - "देखो जैसा लोग काम करते हैं, वैसा उन्हें फल मिलता है, लापरवाही करोगे तो कुछ सज़ा मिलनी चाहिए ना? मुझे तो भगवान ने बस साधन बनाया। अब उस आदमी आदमी को सबक मिलेगा।"

रुपाली - "ये देखो गीता पढ़ कर भगवान कृष्ण के दूत बनेंगे सर। अरे लौटा दो बेचारे के पैसे।"

दिनेश - "नहीं हो सकता, ये देखो।"

रुपाली - "यह क्या है?"

दिनेश - "जो फ़ोन तुम्हे गिफ्ट किया उसकी रसीद। 16990 रुपये का है, अब 10 रुपये लौटाने क्या जाऊं। इसकी एक-एक ऑरेंज चुस्की खा लेते हैं।"

रुपाली - "यू आर सच ए..."

दिनेश - "आखिर पति किसका हूँ?"

समाप्त!

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- मोहित शर्मा ज़हन

Tuesday, June 28, 2016

ज़रूरत (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


तकनीकी गड़बड़ी से एक यात्री विमान ज़मीन से हज़ारों मीटर ऊपर भीषण डीकम्प्रेशन से बिखर कर बंगाल की खाड़ी में गिर गया था। अचानक दबाव के लोप हुआ धमाका इतना भीषण था कि किसी यात्री के बचने की संभावना नहीं थी। 279 यात्रियों और विमान दल में केवल 112 व्यक्तियों की क्षत-विक्षत लाशें मलबे से चिपकी या तैरती मिली, बाकी लोगो को सागर लील गया। बैंक लिपिक रूबी के पिता शॉन इस फ्लाइट में थे। पूरे दिन के सफर के बाद जांच-बचाव केंद्र पर पहुंच कर रूबी को पता चला की एक को छोड़कर बाकी सभी शवो की उनके परिजनों द्वारा पहचान हो चुकी है। हाल ही में कैंसर पीड़ित अपनी माँ को खो चुकी  रूबी ने बुझे मन से आखरी शव को देखा तो चेहरा और शरीर पहचान में न आ सकने वाली हालत में थे, पर शव के पैर पर चोट का लंबा निशान रूबी के लिए अपने मृत पिता को पहचानने के लिए काफी था। सिसकती हुई रूबी औपचारिकताओं के लिए आगे बढ़ी तो उसे एक आवाज़ ने रोका। 

"तुम्हे कोई गलतफहमी हो गई है बेटी! यह मेरे पति हैं।"

रूबी ने उस वृद्धा को दया से देखा और कुछ देर समझाने की कोशिश की, पर वह औरत अपनी बात पर अड़ी रही। थोड़े समय बाद रूबी के सब्र का बांध टूट गया और वह उस बूढ़ी महिला पर चिल्लाने लगी। आस-पास अन्य यात्रियों के कुछ परिजन और जांच अधिकारी आ गए। भीड़ मे कोई बोला - "अरे...ये औरत पागल हो गई है। पहले 2 लाशों को अपना पति बता रही थी फिर वहां से भगाया इसे।" 

अब रूबी ने उस औरत पर ध्यान दिया, उसका हुलिया व्यवस्थित था। वह शांत थी और उसके व्यवहार में पागलपन जैसा कुछ नहीं दिख रहा था। 

एक अधिकारी ने मामला सुलझाना चाहा - "देखिए अगर शव पहचान में विवाद है तो डीएनए जांच के लिए भेजे जा सकते हैं।" 

रूबी - "नहीं ऑफिसर! डीएनए टेस्ट मत करवाइये, मैं अपना क्लैम वापस लेती हूँ...यह मेरे पिता नहीं हैं।"

सबकी अविश्वास भरी नज़रों और मुँह पर लेकिन के जवाब में रूबी दबी ज़ुबान में बोली "...शायद इस समय मुझे मेरे पिता से ज़्यादा इन्हे इनके पति की ज़रूरत है।"

एक बार शव को प्यार से छूकर रूबी ने नम आँखों से ही पिता का अंतिम संस्कार कर विदा ली। 

समाप्त!

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Sunday, June 12, 2016

इज़्ज़त का अचार (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन

होपी नामक क़स्बा नक्काशी के काम और पुराने मंदिरों की वजह से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र था। यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या काफी थी। संपन्न परिवार का दिनेश वहां अकेले ट्रेवल एजेंसी, टूर गाइड्स, होटल आदि काम संभालता था। उसे लगता था उसके पुरखों को कमाना नहीं आता था और जितना वे कमा सकते थे उतना कमाया नहीं। वह अपने ड्राइवर्स, होटल मैनेजर, गाइड्स आदि के साथ मिलकर हर सेवा के विदेशी पर्यटकों से ज़्यादा पैसे वसूलता, घटिया सामान खरीदवाता और मौका मिलने पर अपने ही पॉकेटमार, चोर लड़के-लड़कियों से पर्यटकों के पैसे और कीमती सामान उठवाता। 

एक दिन यूँ ही काम का जायज़ा ले रहे दिनेश के पिता ने उसे टोका तो उसका जवाब था - "पिता जी आप बेफिक्र रहो! पुलिस अपनी जेब में है, बस टूरिस्ट को दिखाने का नाटक करते हैं। न इस जगह कोई दूसरा कॉम्पिटिशन है अपना।"

बिजनस सँभालने के डेढ़ साल के अंदर ही पहले से काफी अधिक मुनाफा हुआ तो दिनेश ने खाना खाते हुए अपने बुजुर्गो को ताना मारा - "बाउ जी ऐसे कमाया जाता है रुपया।"

इन डेढ़ वर्षों के दौरान इंटरनेट फ़ोरम्स, सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ रिपोर्ट्स में होपी क़स्बा पर्यटकों से चोरी, धोखाधड़ी के मामलो में कुख्यात हो गया था। कभी हज़ारो विदेशी पर्यटकों के आकर्षण पर अब गिने-चुने विदेशी आने लगे। दिनेश के काम एक-एक कर ठप होने लगे और ज़मीन बेचने की नौबत आ गयी। बाबा से रहा न गया - "बेटा, ज़मीन के अलावा घर भी बेचना पड़े कोई बात नहीं.... इन्हे बेच कर इस परिवार, जगह और देश की खोई इज़्ज़त वापस मिले तो लेते आना।"

समाप्त!
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#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents #freelancetalents #fiction #india #message #tourism

Sunday, March 27, 2016

लेखकों के लिए कुछ सुझाव

हर लेखक (या कवि) अपनी शैली और पसंद के अनुसार कुछ रचना-पद्धतियों (genres) में अच्छा होता है और कुछ में उसका हाथ तंग रह जाता है। यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि कुछ विधाओं में लेखक अधिक प्रयास नहीं करता। समय के साथ यह उसकी शैली का एक हिस्सा बन जाता है। अक्सर किसी अनछुई विधा को कोई लेखक पकड़ता भी है तो उसमे अनिश्चितता और असंतोष के भाव आ जाते है। सबसे बड़ा कारण लेखक ने इतने समय में स्वयं के लिए जो मापदंड बनाए होते हैं, उनपर इस नयी विधा की लेखनी खरी नहीं बैठती। ऐसा होने पर लेखक रही उम्मीद भी छोड़ कर वापस अपनी परचित विधाओं की तरफ वापस मुद जाता है। अपने अनुभव की बात करूँ तो मुझे हास्य, हॉरर, ट्रेजेडी, इतिहास, ड्रामा, सामाजिक संदेश जैसे विषयों पर लिखना अधिक सहज लगता है, जबकि रोमांटिक या साइंस फिक्शन जैसी थीम पर मैंने काफी कम लेखन किया है। नयी श्रेणियों में पैर ज़माने का प्रयास कर रहे लेखकों और कवियों के लिए कुछ सुझाव हैं। 

*) - अपनी वर्तमान लेखन क्षमता, शैली और उसकी उसकी लोकप्रियता की तुलना नयी विधा में अपने लेखन से मत कीजिये। ऐसा करके आप नयी रचना-पद्धति में अपने विकास को शुरुआती चरण में रोक देते हैं। खुद को गलती करने दें और नए काम पर थोड़ी नर्मी बरतें। याद रखें बाकी लेखन शैलियों को विकसित करने में आपको कितना समय लगा था तो किसी अंजान शैली को अपना बनाने में थोड़ा समय तो लगेगा ही। 

*) - शुरुआत में आसानी के लिए किसी परचित थीम के बाहुल्य के साथ अंजान थीम मिलाकर कुछ लिखें। इस से जिस थीम में महारत हासिल करने की आप इच्छा रखते हैं उसमे अलग-अलग, सही-गलत समीकरण पता चलेंगे। थोड़े अभ्यास के बाद परिचित थीम का सहारा भी ख़त्म किया जा सकता है।    

*) - आदत अनुसार कहानी, लेख या कविता का अंत करने के बजाए उस थीम में वर्णन पर ध्यान दें। चाहे एक छोर से दूसरा छोर ना मिले या कोई अधूरी-दिशाहीन रचना बने फिर भी जारी रहें। इस अभ्यास से लेखन में अपरिचित घटक धीरे-धीरे लेखक के दायरे में आने लगते हैं। 

*) - यह पहचाने की आपकी कहानी/रचना इनसाइड-आउट है या आउटसाइड-इन। इनसाइड-आउट यानी अंदर से बाहर जाती हुयी, मज़बूत किरदारों और उनकी आदतों, हरकतों के चारो तरफ बुनी रचना। आउटसाइड-इन मतलब दमदार आईडिया, कथा के अंदर उसके अनुसार रखे गए किरदार। वैसे हर कहानी एक हाइब्रिड होती है इन दोनों का पर कहानी में कौन सा तत्व ज़्यादा है यह जानकार आप नए क्षेत्र में अपनी लेखनी सुधार सकते हैं।

 - मोहित शर्मा ज़हन 

Read रचनात्मक प्रयोगों से डरना क्यों?


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Sunday, March 13, 2016

अक्ल-मंद समर्थक (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


Scene 1) - एक हिंसक गैंगवार के बाद एक छोटे कसबे के घायल नेता को उसके समर्थको की भीड़ द्वारा अस्पताल लाया गया। डॉक्टर्स ने जांच के बाद नेता जी को मृत घोषित कर दिया।  

"अरे ऐसे कैसे हमारे मसीहा को मरा हुआ बता दिया?" समर्थको का गैंगवार से मन नहीं भरा था। .....उन्होंने डॉक्टर्स को ही पीट-पीट कर मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद अस्पताल के मैनेजमेंट ने फैसला किया कि आगे से किसी नेता, दबंग या प्रभावशाली व्यक्ति की मौत होने पर भी उसे ज़िंदा बताकर दिल्ली या पास के किसी बड़े शहर के अस्पताल रेफर कर दिया जाएगा। 

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Scene 2) - ऐसे ही गैंगवार में दूसरे गुट का गंभीर रूप से घायल नेता जब अस्पताल लाया गया तब ड्यूटी पर डॉक्टर एक ऑपरेशन में व्यस्त थे। समर्थको से डॉक्टर्स का इंकार और इंतज़ार बर्दाश्त नहीं हुआ। डॉक्टर्स को भीड़ ने पीट-पीट का लहूलुहान, बेहोश कर दिया।  जब तक डॉक्टर्स होश में आये तब तक ऑपरेशन वाला पहला मरीज़ और इंतज़ार कर रहे नेता जी दोनों त्वरित इलाज के अभाव में दुनिया को टाटा कर चुके थे। समझदारी का परिचय देते हुए यहाँ के डॉक्टर्स ने दूसरे नेता जी को लखनऊ के हॉस्पिटल रेफर कर दिया। 

समाप्त!

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Saturday, February 27, 2016

इंटरनेटी अफवाह (लघुकथा) - मोहित ट्रेंडस्टर

प्राइम टाइम न्यूज़ का सेट, जिसपर लाइव देश का प्रख्यात पत्रकार-एंकर आनंद कुमार। 

"...और ब्रेक से पहले जैसा हम चर्चा कर रहे थे इंटरनेट की विश्वसनीयता और वहां फैले झूठ, अफवाहों की। पिछले बुलिटिन में ही हमने आपको खबर दी थी कि गुमनामी में रहने वाले प्रख्यात लेखक सोहन वर्मा की हृदयघात से मौत हो गयी है जबकि कुछ देर पहले हमारे पत्रकार ने उनसे मिलकर उनके ठीक होने की पुष्टि की है। सोशल मीडिया पर अच्छी फोर्मैटिंग और भाषा-शैली की अफवाहों से धोखे में ना पड़े।"

अपनी फैन फॉलोइंग द्वारा उसके हर अंदाज़ की तारीफ से जन्मी आत्म मुग्धता में आनंद ने प्रोटोकॉल से बाहर आकर चुटकी ली। 

"यह देखिये अभी तक हमारे स्टूडियो का टेली प्रॉम्पटर सोहन जी की मृत्यु का समाचार दिखा रहा है। हा हा हा... लगता है आज टीम ने चाय-कॉफी नहीं ली।"

सामने गुस्से में प्रोडूसर से भी प्रोटोकॉल टूट गयी और वो चिल्ला कर बोला।

"अबे! इस बार वो सच में मर गए हैं।"


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Tuesday, January 19, 2016

भूत स्वैग - लेखक मोहित शर्मा ज़हन #mohitness

Holi festival 2014 Pic
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टीनएजर भूतों के एक ग्रुप के लड़के एक दूसरे पर शेखी बघार रहे थे। 

भोलू भूत - "भाई एक बार मैं इंद्र देव की मूर्ति के बगल से निकल चुका हूँ।" 

भक भूत - "चल बे! इतने में ही बस ..मै तो शिवजी भोलेनाथ की प्रतिमा के सामने से गया हूँ।" 

पीछे से आवाज़ - "बस-बस! लिपरीडिंग की थी तब तेरी सबने! कांपते हुए शंकर जी के सामने नर्वसनेस में जय संतोषी माता निकल रहा था तेरे मुंह से। वो तो बाइचांस की बात है कि भोलेबाबा ने तुझे माफ़ कर दिया होगा।"

थोड़ा झेंपने और ध्यान बंटने के बाद फिर डिस्कशन चालू।

भोलू भूत - "यार तू भरी सुबह में क्यों निकलता है। कोई तांत्रिक पकड़ ले, कुछ उंच नीच हो जाए तो क्या इज़्ज़त रह जायेगी तेरी फैमिली की?"

भक भूत - "अबे भाई-यार भक बे! तुम डरपोक सुबह साढ़े तीन बजे निकल लेते हो, हम साढ़े 6 से पहले वापस नहीं जाते, अपनी शान में रहते है।" 

पीछे से आवाज़ -  "....और तभी रोशनी से झुलस कर फ्राइड मोमोज़ हुए फिरते हो।" 

भक भूत ने मण्डली के हंसने से पहले ही नया दावा किया - "मेरे सुबह घूमने की आदत की वजह से...बाय चांस मुझे देख कर एक बार एक अंकल जी को हार्ट अटैक आ गया और वो मर गए।"

पीछे से आवाज़ - "वो उन्हें पहले से ही अटैक पड़ा था, तू तो बस क्रेडिट लेने कूद पड़ा उनके सामने उनके मरने के बाद।" 

भक भूत - "अरे! ये कौन है पीछे से अफवाहें फैला रहा है? अब एक हीरो शान्ति से अपने किस्से भी नहीं सुना सकता !!"

पीछे की आवाज़ का मालिक आगे आया - "मै वही अंकल जी का भूत हूँ, जिसकी नेचुरल डेथ का क्रेडिट तू अपनी दहशत के नाम चढ़ा रहा था। आजा मेरी नन्ही परी...कुछ छड़ी खा ले....तेरे अंदर का स्वैग निकालू।"

समाप्त!

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Saturday, December 12, 2015

सपने वाले अंकल जी (Micro Fiction Experiment # 05) #mohitness



एक रात वृद्ध अंकल जी को अचानक सपने दिखने लगे।
रंग-बिरंगे, प्रकृति के, खेल-खिलोनो के, बच्चो के, समुद्र के, युद्ध के, मौसम के, अश्लील वाले, यात्रा के और विभिन्न विजुअल्स। 

सपने उन्हें आते थे कभी कबार पर इतने अधिक और इस तरह के रोलरकोस्टर दृष्टांत तो कतई नहीं। 
अंदाज़ लगाया कि शायद ईश्वर ने उन्हें मरने से पहले अपने आस-पास मौजूद दूसरो के सपने देखने की शक्ति दी है, चलो इस बहाने रोज़ नींद में ही सही कुछ मनोरंजन हो जाएगा। 

ध्यान केंद्रित कर उन्होंने किसी भी व्यक्ति के नये-पुराने सपने पढ़ने की शक्ति अर्जित कर ली, चलो इस बहाने संपत्ति का अधिक हिस्सा किसे दूँ यह निर्णय हो जाएगा। 
पहले बेटे के सपने नीरस थे, हुंह जैसे ये कुछ नहीं बोलता वैसे ही इसके सपने भी बोगस। छोटे बेटे के सपने देखता हूँ, वो मुझे बहुत प्यार और सम्मान देता है। 
अरी मईया! पहले ही सपने में मेरी चिता जला कर उसके अराउंड शादी के फेरे ले रहा है। अब ना देने का इसे रुड़की वाला प्लाट। 

छोटे बेटे के कई सपनो में बूढ़े अंकल ने अपनी मौत, पिटाई, बेइज़्ज़ती देखी। 
वैसे तो बड़ा भी कुछ ख़ास नहीं पर लुच्चो की इस टक्कर में कुछ दशमलव अंको से मैं उसे जिताता हूँ। ज़्यादा संपत्ति बड़े को, बाकी थोड़ा बहुत हिस्सा राम गोपाल वर्मा के उस विकृत रूप, मेरे छोटे बेटे को। 

अंकल ये भी हो सकता था कि आपके छोटे बेटे को मनोविज्ञान, अपराध, डार्क आदि विषयों में रूचि हो और आप उसके दिल के सबसे करीब होने के कारण उसके विकृत ख्वाबों में कहीं ना कहीं आ जाते हों। अंकल-अंकल....लो बिना ये विचार किये ही काल के ग्रास में समा गए अंकल !  

- मोहित शर्मा (ज़हन) 
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#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelancetalents #freelance_talents

Read Micro Fiction Experiment # 04

Monday, November 23, 2015

तेज़ाबी बरसात (लघुकथा) - मोहित ट्रेंडी बाबा


डॉक्टर्स द्वारा हफ्ते-दो हफ्ते का समय शेष पता चलने पर विधिचंद अपने जीवन की लंबी शो-रील के साथ गुपचुप बागीचे में बैठे रहते। देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपना संघर्ष, स्वतंत्रता मिलने के बाद देश के लिए सपने, उम्मीदें...फिर समझौते करते अब तक का सफर। 2 दिनों बाद भारी बरसात होने लगी तो उन्हें याद आया कि जीवन की शो-रील में बचपन वाला हिस्सा चलाना रह गया दिमाग में। जाने कितनी बारिशों में गाँव की मित्रमण्डली के साथ की गयी धमाचौकड़ी के दृश्य आज भी उनके ज़हन में ताज़ा थे। नथिंग टू लूज़ सोच लिए वो बचपन के चलचित्र को जीने एक बार फिर से बरसात में भीगने बाहर निकल आये। 

कुछ क्षण बाद ही आँखों और शरीर की जलन यादों पर हावी हुयी और पीछे से बेटे की आवाज़ आई - "पिता जी! सीजन की पहली बारिश है। सल्फर-वल्फर होगा पानी में, एसिड रेन है, अंदर आ जाइए। देखो जलन से आँखों में पानी आ रहा है आपकी।"

 ...पर विधिचंद की आँखों में पानी किसी और वजह से था। 

समाप्त!

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Sunday, October 25, 2015

किसका कठिन काम (लघुकथा) - मोहित शर्मा (ज़हन)


कल कंपनी की क्वार्टर क्लोजिंग होने के कारण संदीप, राघव और प्रखर को देर रात तक रुक कर काम और खाते निपटाने के आदेश मिले थे। त्यौहार की लगातार छुट्टियों के तुरंत बाद क्लोजिंग उनके शिथिल शरीरों और दिमागों को अल्सर की तरह दर्द दे रही थी। दफ्तर, बॉस, फाइल्स, लैपटॉप, बांग्लादेशी प्रवासी, केंद्र सरकार, ससुर-साले-पडोसी सबको जी भर कोसते हुए, मन मसोस कर तीनो सहकर्मी काम पर लगे। आधी रात के बाद तक काम पूरा कर तीनों घर जाने से पहले ऑफिस के पास चाय की दुकान पर रुके। 

राघव ने थकी आवाज़ में कहा - “तीन चाय और बंद-मक्खन।”

चाय वाले के बारह वर्षीय साहबज़ादे बाहर आये - “अभी बापू लेट गए, कल आना।”

“अच्छा अब ऐसे लोग भी अकड़ दिखाएंगे हमें।” प्रखर की गुस्से भरी हुंकार निकली। 

राघव की थकान को उसके अहं ने दबाया - “नहीं आना कल से यहाँ, ना किसी ऑफिस वाले को आने देंगे। सर पे चढ़ा लो तो औकात ही भूल जाते है लोग।”

संदीप ने भी अपना मतदान किया - “ भक  @#$%^!  उठा अपने बाप को। चरसी कहीं के, लोट जायेंगे जब मन करे। कभी इतनी मेहनत, ओवरटाइम करना पड़े तब पता चले।”

अँधेरे की आड़ में चाय वाले के पडोसी रिक्शाचालक ने कहा - “बाबूजी, गरीब पर दया करो!  आपके ऑफिस में ओवरटाइम महीने-दो महीने में होता है, उसके ऑफिस में तो रोज़ ओवरटाइम है।”

“छोटे” मुंह से निकली बड़ी बात को समझने में कुछ क्षण लगे संदीप, प्रखर और राघव को पर डेढ़ गरीबों पर तीन भोकाली युवको का जनमत हावी हुआ और खुद को सही घोषित करते हुए, गालियां देते हुए तीनो सहकर्मियों ने प्रस्थान किया।  

- मोहित शर्मा ज़हन 

#mohit_trendster #trendybaba #mohitness

P.S. Picture: I still play with toys, sketches....

Friday, September 4, 2015

सबकी अनैतिक बढ़त - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


अंतर्राष्ट्रीय साइकिल रेस के लिए चुना गया नेचुरल कोर्स शिव के लिए नया नहीं था। आखिर यही वह रास्ता था जहाँ वो वर्षो से प्रतिदिन अभ्यास करता था। उसके मित्रों और जानने वालो को पूरा विश्वास था कि यह रेस जीतकर शिव अंतर्राष्ट्रीय सितारा बन जाएगा। कॉलेज में कुछ हफ्ते पहले ही उसको यह दर्जा मिल गया था। शिव के कोच राजीव मेहरा मानकर बैठे थे कि अगर उस दिन कुछ ऊँच नीच हुयी, तब भी शिव शुरुआती कुछ रेसर्स में आकर बड़ी इनामी राशि अर्जित कर लेगा। स्थानीय कंपनियों में यह बात फैली तो उससे कुछ स्पोंसर्स जुड़ गये। 

रेस का दिन आया और रेस शुरू हुयी। पहले चरण में शिव काफी पीछे रहा, लोगो ने माना कि शायद वह अपनी ऊर्जा बचा रहा है या यह उसकी कोई रणनीति  है। पर रेस ख़त्म होने पर कुशल साइकिलिस्ट शिव औसत 17वें स्थान पर आया। स्थानीय लोगो और उसके करीबियों में अविश्वास और रोष था। जो रेस शुरू होने से पहले लाइमलाईट लेने में सबसे आगे थे, वही कोच और स्पोंसर्स रेस के बाद ताने देने वालो में सबसे आगे थे। जबकि एक शून्य में खोया शिव प्रतियोगिता की घोषणा के दिन से ही अलग उधेड़बुन में था। 

माहौल शांत होने के बाद एक शाम अपने मित्र सुदीप्तो के सामने उसने अपना दिल खोला। 

शिव - "मैंने खुद को बहुत समझाया पर मन को समझा नहीं पाया। मुझे लगा कि एक रास्ता जिसके हर मोड़, उंच-नीच यहाँ तक कि हवाओं की दिशा तक से मैं इतना करीब से परिचित हूँ पर मेरा जीतना अनैतिक होगा, एक चीटिंग होगी बाकी साइकिलिस्टस के साथ। धीरे-धीरे यह बातें मेरे दिमाग पर इतनी हावी हों गयी कि रेस के दिन वो बोझ मेरे पैरों, मेरे शरीर पर महसूस होने लगा और परिणाम तुम जानते ही हो।"

सुदीप्तो - "भाई, पहली बात तो ये कि दिमाग बड़ी कुत्ती चीज़ है, किसी मामले में बिलकुल परफेक्ट और कहीं-कहीं बिलकुल फ़िर जाता है। तो यह जो तुम्हारे साथ हुआ ये किसी के साथ भी हो सकता था। किसी बात में जब हमे सीधा लाभ मिलता है और हम किसी भी रूप में प्रतिस्पर्धा का हिस्सा होतें है तो कभी-कभी अपराधबोध लगता है कि हमे मिली यह बढ़त तो गलत है। पर इस बढ़त को एक मौके की तरह देखो जिसे पाकर तुम अपने और अपने आस-पास के लोगो के लिए एक बेहतर कल सुनिश्चित कर सकते हो। सोचो अगर यह रेस तुम जीतते तो अपने साथ-साथ कई लोगो का जीवन बदल देते और क्या पता आगे इस पूरे कस्बे की तस्वीर बदल देते। जहाँ तक अनैतिक बढ़त या चीटिंग की बात है वह तो तुम अब भी कर रहे हो, बल्कि हम सब करते है।"

शिव - "भला वो कैसे?"

सुदीप्तो - "तुम्हारे साधन-संपन्न माता-पिता है, क्या यह उन लोगो के साथ चीटिंग नहीं जो बचपन में ही अनाथ हो गए या जो किसी स्थिति के कारण गरीब है? तुम 6 फुट और एथलेटिक बॉडी वाले इंसान हों, क्या यह उन लोगो पर अनैतिक प्राकृतिक बढ़त नहीं जो अपाहिज है? तुम्हारे क्षेत्र में शान्ति है, क्या यह देश और दुनिया के उन लोगो पर बढ़त नहीं जिन्हे युद्ध के साये में जीवन काटना पड़ता है?"

शिव - "इस तरह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं।"

सुदीप्तो - "इस तरह सोचोगे तो कभी जीवन में कोई मौका भुना नहीं पाओगे। ऐसे एंगल से सब सोचने लगे तो दुनिया के सारे काम उलट-पुलट जायेंगे। हाँ, हमे कुछ बातों में दूसरो पर प्राकृतिक या अन्य बढ़त हासिल है पर कुछ बातों में दूसरो को लाभ है। पते की बात यह है कि हम स्वयं को बेहतर बनाने में और अपने काम को अच्छे ढंग से करने पर ध्यान दें, अब अगली रेस कि तैयारी करो। गुड लक!"

समाप्त!

- मोहित शर्मा (ज़हन)

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Friday, August 7, 2015

Desh Maange Mujhe (Kavya Comics Advert)

*New Kavya Comics* "Desh Maange Mujhe" Follow-Like Red Streak Publications for more updates!
"Hello people,
We are going to feature a short poetic comic on our page. This is an online comic and will be free and available for all.You can read it by going on our Fb page.
Kudos to immensly talented Mohit Sharma and his co-artists for developing this unique style of comic book art.
Here we go with the first glimpse and look of "DESH MAANGE MUJHE"
The whole comic will be shared tomorrow"
 — with Prince Ayush and Mohit Sharma.

एक क़र्ज़ मेरे ऊपर जो बोलता नहीं, सूखी है जिसकी आँखें मुंह खोलता नहीं। 
आईने के उस पार से जो झांकता परे, खुद से किसी गिरह को पर खोलता नहीं। 
ख्वाबो में जबरन झरोखे बना लिये, पहली दफा देखी बेशर्म पर्दानशीं। 
दुनिया-जहान की बातों को तरजीह मिल गयी, उन तमाम बातों में वतन का नामोनिशां नहीं। 
अपनी ही कश्मकश में ज़िन्दगी गुज़ार दी, मुल्क की शिकन को कोई तोलता नहीं। 
इंसाफी मुजस्मा शर्मसार झुक गयी, किस्मत को कोसती मुझसे कहने लगी 
पाबंदी है यह कैसी...मैं कुछ देखती नहीं और तू कुछ बोलता नहीं !

Saturday, July 18, 2015

कुछ पल और गुज़ार ले... | मोहित शर्मा (ज़हन)

Artwork - Kinannti
रजनी का एक राष्ट्रीय चिकित्सीय प्रतियोगी परीक्षा का यह अंतिम अवसर था। रजनी की मेहनत घर में सबने देखी थी और डॉक्टर बनने का सपना भी लगनशील रजनी और उसके परिवार ने साथ देखा था। यह लगन ऐसी संक्रामक थी कि जीवन में कोई ध्येय ना लेकर चलने वाली, स्वभाव में विपरीत रजनी की जुड़वाँ बहन नव्या, सिर्फ उसके सहारे मेडिकल फील्ड लिए बैठी थी। यह रजनी की संगत का ही असर था जो पढाई में कमज़ोर नव्या ने अच्छे अंको से दसवी, बारहवीं पास की थी, यह नव्या भी इस राष्ट्रीय परीक्षा में अंतिम अवसर था। इंटरनेट पर परिणाम घोषित हुआ और एक बार फिर से रजनी बहुत कम अंतर से असफल हुयी। रजनी का जैसे पूरा संसार ही अंधकारमय हो गया। जब तक कोई कुछ समझाता, समझता उस से पहले ही रजनी ने आत्महत्या कर ली। 

नव्या को पहले ही पता था कि वह सफल नहीं हो पाएगी और परिणाम ने उसके अंदेशे पर मोहर लगा दी पर खुद से ज़्यादा दुख नव्या को अपनी मेहनती बहन रजनी के लिए था। अब उसे लगा कि काश उसे थोड़ा समय मिल पाता अपनी बहन को समझाने का। माता-पिता अविश्वास से एकटक कहीं देखकर अपनी कल्पनाओ को सच्चाई पर हावी करने की हारी हुयी कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद अपने परिवार के लिए नव्या ने स्वयं को संभाला और क्लीनिकल रिसर्च में 8 महीनो का कोर्स कर उसे अच्छे वेतन पर एक विदेशी कंपनी में नौकरी मिली। नव्या को पता था कि अगर उसकी जगह उसकी बहन होती तो अपने ज्ञान और मेहनत के दम पर उस से अच्छे स्थान पर होती, उस स्थान पर जो  उसे उस प्रतियोगी परीक्षा में सफल होने के बाद भी ना मिलता। कुछ समस्याएँ जो कभी जीवन को चारो और से घेरे ग्रहण लगाये सी प्रतीत होती है, जिनके कारण सुखद भविष्य की कल्पना असंभव लगती है, चंद महीनो बाद ऐसी समस्या का अस्तित्व तक नहीं रहता। थोड़ा और समय बीत जाने के बाद  तो दिमाग पर ज़ोर डालना पड़ता है कि ऐसी कोई दिक्कत थी भी जीवन में। नव्या अक्सर सपने में रजनी को समझाते हुए नम आँखें लिए जाग जाती है - "बहन! बस ये थोड़े लम्हें काट ले, जो इतना सहा...वो दर्द सहकर बस कुछ पल और गुज़ार ले....सवेरा होने को है..."
 समाप्त! 
- मोहित शर्मा (ज़हन) 
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Thursday, July 16, 2015

भूरा हीरो बनाम ग्रीक गॉड - मोहित शर्मा (ज़हन)

उम्र बढ़ने के साथ हम जीवन के विभिन्न पहलुओं में सामाजिक ढाँचे के अनुसार ढलते है और कभी-कभी ढाले जाते है। जैसे किसी देश में अगर मनोरंजन के किसी साधन या स्रोत पर पाबंदी है या प्रोत्साहन है वहाँ जनता की पसंद-टेस्ट उस अनुसार ढल जायेगी, यहाँ तक कि सामाजिक परिदृश्य को देखने में भी वैसा ही चश्मा पहना जाने लगेगा। दुनिया भर के मनोरंजन स्रोत देखने पर आप पाएंगे कि हर जगह कितना दूषितवर्गीकरण व्याप्त है साथ ही पश्चिमी देशो के गोरे वर्ण के लोगो को इतना अधिक इस तरह प्रोजेक्ट किया जाता है कि दुनिया में मानवजाति के वह सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। धीरे-धीरे समय के साथ हम बाकी किस्म के लोगो में भी वो मनोरंजन के साधन देखते-देखते यह बात और भावना घर कर जाती है। एक निश्चित सीमा और प्रारूप (format) के आदि हो जाने के कारण अगर उस से अलग या नया कुछ होता है तो कई लोग उसे सिरे से नकार देते है।

बाहुबली मेरे कुछ जानने वालो को सिर्फ इसलिए पसंद नहीं आई क्योकि ऐसे एक्शन और स्टोरीलाइन में वो गोरे रंग के ग्रीक गॉड मॉडल जैसे हीरोज़ को देखते आये है और यह दक्षिण भारतीय नायक प्रभास उन्हें जमा नहीं। यह नायक उन्हें किसी बॉलीवुड या स्थानीय मसाला फॉर्मेट में ही जमता। ऐसा शायद इस फिल्म के समापन भाग में अभिनेत्री अनुष्का शेट्टी को भी सुनने को मिले जो तब युवा अवस्था के किरदार में दिखेंगी। क्या इतना कड़ा है यह फॉर्मेट की आदत पड़ जाने का बंधन जो हम सौइयों अन्य बातों को भूलकर सिर्फ वर्ण या स्थान का रोना रोने बैठ जाएँ? मेहनत और प्रयोगो को सराहना सीखें क्योकि दुनिया के आगे बढ़ने में इन दोनों बातों का महत्वपूर्ण योगदान है। किसी ने टोका कि यह तो लोमड़ी के अंगूर खट्टे वाली बात हो गयी, भारत में ऐसे लोग मिलेंगे ही नहीं जो फॉर्मेट में फिट बैठे तो उन्हें बता दूँ कि भारत आपकी सोच से कहीं अधिक विशाल है, रैंडम देश के 15 - 20 शहरों का दौरा करें आपको हर तरह के प्रारूप के अनेको लोग मिल जायेंगे।

एक सम्बंधित एक्सट्रीम उदाहरण और उसका परिणाम भी बताना चाहूंगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलग होने के पीछे भी यह भावना थी। वही भावना कि वह हमारे जैसे नहीं है तो हम में से एक कैसे होंगे? पाकिस्तानी नेतृत्व, भारत के दूसरी तरफ बसे अपने बंगाली भाग के नागरिको से दोयम दर्जे सा व्यवहार करता था (दोनों रीजन्स के विकास में बहुत अंतर था) और उनका मखौल सा उड़ाता था (regional, ethnic ego) जिस वजह से दोनों स्थानो में दरार बढ़ती चली गयी और बांग्लादेश अलग हुआ। अलग बातों, चीज़ों, लोगो के प्रति लचीला रवैया अपनाये, ज़रूरी नहीं कि अगर कोई प्रारूप अनदेखा है तो बेकार ही होगा।

- मोहित शर्मा (ज़हन)
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Friday, May 8, 2015

पोएटिक पोस्ट : मेरी आज़ादी का रुआब - मोहित शर्मा (ज़हन)


नमस्ते! दुनियाभर में अनेको लोग अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी संस्था, प्रभावशाली व्यक्ति, विचारधारा, सामाजिक प्रणालियों की परछाई में अपना जीवन काट देते है। उनसे अधिक दुर्भाग्यशाली लोग ऐसे होते है जो इतने जागरूक ही नहीं हो पाते कि अपनी सोच बना पायें। स्थापित प्रणाली पर बिना सवाल उठाये भेड़चाल का हिस्सा बन अपना जीवन काट देते है। उन्ही परिस्थितियों में काफी कम संख्या में लोग गलत परन्तु प्रचलित बातों के खिलाफ आंदोलन करते है। शांत, संतुष्ट जनता का बड़ा बहुमत होने के कारण सरकारों एवम शासको के लिए ऐसे विद्रोहों, आंदोलनों को कुचलना आसान बन जाता है।

अक्सर ऐसी कई आहुतियों की लपट हम तक पहुँच नहीं पाती। जैसे सूखी लकड़ियों और घी-कपूर में प्रज्वलित अग्नि में हवन सामग्री स्वाहा हो जाती है, वैसे ही शायद इस संघर्ष  का महत्त्व इन इकाई बलिदानो में साफ़ ना दिख पाये पर लगातार मंत्रो के बाद पड़ रही हवन सामग्री अग्नि की प्रचंडता समाप्त कर देती है, ठीक  वैसे ही लगातार छोटे-छोटे संघर्षों की बूँदें एक सैलाब बनकर भव्य शासको, शक्तिशाली विचारधारों को बहा ले जाती है। जनता को पूरे न्याय की ना जानकारी होती है और ना ही उम्मीद पर समस्या तब आती है जब बूँद-बूँद के लिए करोडो, अरबों को घिसटते हुए जीवन व्यतीत करना पड़ता है।  हर सक्षम नागरिक कि नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि असल और ढोंग के संघर्षों में फर्क करते हुए अपने कम भाग्यशाली देशवासियों की मदद में योगदान दे, प्रयासरत रहे। इस काव्य कॉमिक की प्रेरणा मुझे तिब्बत संघर्ष में बरसो से खुद को जलाकर, अपनी बलि दे रहे प्रदर्शनकारियों से मिली। 

यह यश ठाकुर ( हरीश अथर्व) जी कि पहली कॉमिक है जो काफी समय से अटकी हुयी थी, आखिरकार उनकी मेहनत सबके सामने है जिसके लिए उन्हें बहुत बधाई! हालाँकि, इस बीच उनकी कला में काफी सुधार आया है। पाठको और फेनिल शेरडीवाला जी के सुझावों, अवलोकन अनुसार आगे बेहतर काम आप सभी के सामने होगा। 
आपका 
मोहित शर्मा (ज़हन) 

Thursday, April 23, 2015

New Kavya Comic


Meri Aazadi ka Ruab exclusively at Fenil Comics website and social media pages. by yours truly, Yash (Harish Atharv) Thakur, Soumendra Majumder, Ajay Thapa and Manabendra Majumder.