...is "Celebrating (un)Common Creativity!" Fan fiction, artworks, extreme genres & smashing the formal "Fourth wall"...Join the revolution!!! - Mohit Trendster
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Sunday, February 14, 2021

जैसे वे कभी थे ही नहीं...(लघुकथा)

जॉली जीत और बॉबी जीत, सफल फिल्मकार भाइयों की जोड़ी थी। दोनों कुल 57 फ़िल्में बना चुके थे। जॉली की मृत्यु हुई तो बॉबी का रचनात्मक सफर भी खत्म हो गया। अब सिर्फ़ किसी अवार्ड समारोह, टीवी शो में मेहमान के तौर पर बॉबी साल में 2-4 बार लोगों के सामने आता था।

उनके पुराने नौकर ने ड्राइवर से कहा - "जॉली सर के जाने के बाद बॉबी सर के इंटरव्यू बदल गए हैं।"

ड्राइवर - "मैंने इतना ध्यान नहीं दिया...शायद गम में रहते होंगे, बेचारे।"

नौकर - "नहीं, जॉली सर के ज़िंदा रहते हुए, इन दोनों की फ़िल्मों पर बात करते समय बॉबी सर बारीकी से बताते थे कि जॉली सर ने किसी फ़िल्म में क्या-क्या और कितना अच्छा काम किया था। अब उनके इंटरव्यू में वह बारीकी सिर्फ़ अपने लिए रह गई है। जैसे..."

ड्राइवर - "जैसे?"

नौकर किसी के पास न होने पर भी दबी आवाज़ में बोला - "...जैसे जॉली सर कभी थे ही नहीं।"

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#ज़हन

Image by Daniel Frank

Tuesday, December 3, 2019

बहस-नेटर: हर बहस का अंत (कहानी)


प्रकाश अपनी सोशल मीडिया इमेज को लेकर बड़ा सजग रहता था। उसका मानना था कि जीवन में कोई भूल-चूक हो जाए तो चलता है पर इंटरनेट की आभासी दुनिया के प्रवासियों के सामने ज़रा सी भी कोताही नहीं। उसे कौनसे महान लोग या घटनाएं प्रेरणा देते हैं, कौनसी बातों और रुचियों को वह फॉलो करता है...सोशल मीडिया साइट्स पर सब नपा तुला दर्शाना। आभासी दुनिया के किसी मुद्दे पर अगर किसी दूसरे इंसान का मत उससे अलग हुआ प्रकाश झल्ला जाता था लेकिन अब सोशल मीडिया पर 'बड़प्पन' का नाटक भी करना है। इस कारण वह ऐसे दिखाता जैसे उसे फर्क नहीं पड़ा और वह इन बातों से ऊपर है। सामान्य बहस होने पर पहले वह कुछ ख़बरों, लेख वगैरह के लीक से हटकर और ढाई किलोमीटर लंबे लिंक लेकर आता। उसका मकसद सामने वाले इंसान को समझाने के बजाय तुरंत उसके हथियार डलवाना होता था ताकि उसका फैनबेस उसपर शंका न करे।  
इस बीच प्रकाश के खास गुर्गे उसका गुणगान कर देते, टिप्पणियों पर पसंद और दिल चिपका देते, वहीं प्रकाश से अलग विचार वाले इंसान की टिप्पणियों पर मज़ाक उड़ाती बातें और इमोजी डाल देते। ऐसे में वह मुद्दा पढ़ने वाले लगभग सभी अपने-आप प्रकाश को सही और दूसरे व्यक्ति को बचकाना मान लेते। ऐसी सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लेकर वह न जाने कितने लोगों को ब्रेनवाश करता।

फिर भी बात न बनती तो अंत में वह बह्रमास्त्र छोड़ता - "तुम इस फील्ड की बात कर रहे हो...क्या इस क्षेत्र से जुड़ी तुमने फलाना-फलाना कुछ किताबें पढ़ी भी हैं जो तुम 'मुझसे' (जिसको इतना ज्ञान है) से बहस करने की हिम्मत कर रहे हो?"

मुख्य विषयों और बातों की सबसे चर्चित कुछ दर्जन किताबें वह वाकई घोट कर पी चुका था। इनके अलावा दूसरी कई किताबों का सार पढ़ने में प्रकाश की गहरी रुचि थी। ज़ाहिर है सीखने के लिए कम और धौंस जमाने या आगे किसी बहस-'शो ऑफ' में स्टाइल झाड़ने के लिए ज़्यादा। सतही मेहनत के महल को पक्का बनाए रखने के लिए वह एक काम और करता। प्रकाश किसी से बहस या उसका मज़ाक उड़ाने से पहले जांच लेता था कि कहीं सामने वाला इस क्षेत्र का बड़ा ज्ञानी तो नहीं। अगर हाँ तो घुमा-फिरा कर और ध्यान बंटाकर विषय बदल देता या उस व्यक्ति को दूसरे क्षेत्र की बहस में लाने की कोशिश करता।

एक दिन प्रकाश की बहस इंजीनियरिंग कर रहे लड़के प्रवीण से हुई। बहस एक राज्य की राजनीती पर थी। प्रकाश को अपने जीतों की सूची में एक आसान जीत और दिख रही थी। लड़के ने प्रकाश की बात से अलग पक्ष रख उसकी शान में गुस्ताख़ी कर दी थी...सज़ा तो बनती थी। बात बढ़ती गई और प्रकाश ने अपने सारे पैंतरे आज़माए। कई लोग प्रकाश की तरफदारी करने आए और प्रवीण के कुछ साथी छात्रों ने उसका समर्थन किया। अंत में प्रकाश ने उस राज्य की राजनीती पर 5-7 मशहूर किताबों और कुछ शोध कार्यों का ज़िक्र किया। जवाब में प्रवीण ने अपनी पढ़ी, सुनी-देखी हुई सामग्री की बात कही....लेकिन असंगठित लेख आदि चाहे जितनी संख्या में हों...कहाँ मशहूर पुस्तकों के आगे टिक पाते। (ऐसा प्रकाश और आभासी दुनिया के कई लोगों का मानना था) अति आत्मविश्वास में प्रकाश ने यह भी स्वीकार लिया कि उस राज्य पर उसने इतना ही पढ़ा है और यह उन 'बच्चों' के सामने आई सामग्री से कहीं ज़्यादा महत्व रखता है। 

"अच्छी बात है, सर। हाल ही में मद्रास यूनिवर्सिटी और कोंकण यूनिवर्सिटी के साझा प्रयास से सबके इस्तेमाल के लिए मुफ़्त 'बहसनेटर' नामक सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है। इसमें दो या ज़्यादा पक्षों के तर्क के पीछे जानकारी के सभी स्रोतों की निष्पक्षता और जानकारी के स्तर की तुलना की जाती है।"

प्रकाश ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी। उसने जवाब दिया - "ऐसा नहीं हो सकता...किसी भी क्षेत्र में ज्ञान और जानकारी की कोई सीमा नहीं होती। तो फिर कौन ज़्यादा और कौन कम?"

प्रवीण को ऐसे सवाल की ही उम्मीद थी - "सहमत हूँ, वैसे तो किसी भी क्षेत्र में जानकारी की कोई सीमा नहीं पर किसी विषय पर दो पक्षों को तुलनात्मक रूप से कितनी जानकारी पता है और उसमें से कितनी सही, गलत या विवाद करने लायक है का एक अंदाज़ा लगता है, नतीजे में 5-10 प्रतिशत का अंतर हो सकता है पर ज़्यादा नहीं।"

प्रकाश का धैर्य टूट रहा था - "हाँ, तो यह सब मुझे क्यों बता रहे हो?"

प्रवीण - "आपकी बताई किताबों, शोध आदि को एक पक्ष में रखा और हमारे बताए गए लेख, वीडियो आदि सामग्री दूसरे पक्ष में...सॉफ्टवेयर से मिला रिजल्ट यह है कि इस विषय पर आपके पक्ष की तुलना में हमारे पक्ष के पास 79.2% ज़्यादा जानकारी है। हाँ, संभव है कि इस सॉफ्टवेयर में कमियां हों पर यहाँ 20-30 नहीं बल्कि लगभग 80% का अंतर दिख रहा है। आपको बाकी विषयों की जानकारी होगी पर यहाँ तो कम से कम चुप ही रहें। 

एक आखिरी बात और क्योंकि मैंने आपका ऑनलाइन ढोंग काफी समय से देखा है। मुझे पता है इसके बाद आप मेरा और मेरे दोस्तों का मज़ाक उड़ाएंगे, इस सॉफ्टवेयर को हवाई बताएंगे और अपने खलिहर फॉलोअर्स से हमें बुली करवाएंगे। आप यहाँ ही नहीं रुकेंगे कुछ दिन बाद आप इस विषय पर अपनी बात को सही साबित करते हुए लंबी पोस्ट लिखेंगे और उसके फॉलो-अप में बातें लिखते रहेंगे क्योंकि आप तो कभी गलत नहीं हो सकते। आप तो फ़रिश्ते पैदा हुए हो जो आज तक किसी भी विषय में कमतर या गलत साबित नहीं हुआ। किताबें पढ़ना अच्छी बात है पर उसके बाद आप जो ओछी हरकतें करते हैं वह सब गुड़ गोबर कर देती हैं। मेरी बस एक सलाह है, खुद को सही मानें पर फालतू की आत्ममुग्धता से बचें। सामने वाला इंसान कुछ कह रहा है तो पहले उसकी बात को समझें। कोई विपरीत पक्ष आने पर आप उस इंसान की बात को ऐसे नकारते हैं जैसे वह परसों पैदा हुआ हो। जिन वेबसाइट जैसे रेडिट, क्वोरा आदि का हमनें हवाला दिया है वहां अनगिनत मुद्दों पर तो करोड़ो शब्दों की सामग्री पड़ी है जिसमें से सब नहीं तो लाखों शब्द काम के हैं और दर्जनों किताबों के बराबर हैं। किसी ने अगर असंगठित जगहों से थोड़ी-थोड़ी जानकारी ली है तो इसका यह मतलब नहीं कि उसे 'कुछ' पता ही नहीं। हो सकता है उसके थोड़े-थोड़े दशमलव जुड़कर आपके एक जगह के चौके-छक्के से कहीं ज़्यादा हो जाएं। मैं देखना चाहूंगा कि बहसनेटर पर आप और सोशल मीडिया पर ज्ञान की दुकान खोले बैठे कई लोग बाकी विषयों में कितने पानी में हैं। आपकी प्रोफाइल मैंने हैक कर ली है...घबराएं नहीं कोई गलत इस्तेमाल नहीं करूंगा पर पिछले कुछ महीनों के आपके स्टंट बहसनेटर पर तोलकर आपकी सभी सोशल मीडिया प्रोफाइलों पर आपके नाम से ही डाल रहा हूँ। आगे दोबारा नौटंकी की कोशिश की तो फिर से प्रोफाइल हैक करके ऐसा करूंगा। पुलिस को ज़रूर बताएं...मुझे आपके इनबॉक्स में मिली सामग्री की कसम आपसे कम ही सज़ा होगी। इस बहस से जुड़े और बाकी 'काम के' सारे स्क्रीनशॉट ले लिए हैं। धन्यवाद!"

प्रकाश का उसी के खेल में शिकार हो चुका था। उसका आभासी स्टारडम और दिमाग अपनी जगह पर आ गए।

समाप्त!

#ज़हन

Thursday, March 8, 2018

भूमिका या परिणाम? #ज़हन


परिचय में एक व्यापारी हैं जो फिल्मों, साहित्य में रूचि लेते हैं। वो एक स्थानीय फिल्म बना रहे हैं जिसमें खुद ही हीरो बन गये हैं। उन्होंने ये भी एलान किया है कि अभी इस क्रम में अपनी सोची कहानियों पर कुछ फिल्में और करेंगे, जिनमें भी वो खुद ही नायक होंगे। साथ वाले बहुत से चाटुकार खुश हैं कि लंबे समय का आसान रोज़गार मिल गया है। इन्ही व्यापारी सज्जन के शहर में मौकों की तलाश में हज़ारों थिएटर अभिनेता, लेखक, कलाकार घिसटते हुए जीवन व्यतीत कर रहे हैं....लेकिन हर विधा का हीरो तो साहब को खुद बनना है। यहाँ एक और ध्यान देने वाली बात है कि "हर विधा" मतलब ग्लिटर वाली-चमकदार शेखी बघारने लायक विधा, बाकी लाइटिंग, साउंड आदि नहीं। 

अपने जीवन की फिल्म में हर कोई मुख्य किरदार में होता है। समय के साथ उसे अपनी क्षमताएं, सीमाएं पता चलती हैं और उनके अनुसार वह जीवन जीता है। किन्ही बातों और अवसर पर उसका नायक का किरदार जँचता है पर बाकी अधिकतर जगहों पर उसका नायक के रोल में आना अटपटा लगता है। अनगिनत समीकरणों से बनी दुनिया में बहुत भीड़ है और प्रकृति सभी को भिन्न-भिन्न बातों में नायक बनने के अवसर देती है। ऐसा हो सकता है कि कोई सामान्य से अधिक जगहों पर नायक बना अच्छा लगे पर अपने मन में ये ग़लतफ़हमी पालकर हर जगह ज़बरदस्ती मुख्य रोल में घुसना गलत है। तो हीरो बनने चले इन व्यापारी सज्जन के साथ होगा ये कि इनकी फिल्म इनके परिचय तक सिमट कर रह जायेगी। हाँ, अगर ये अपने अनुभव और हुनर वाले रचनात्मक काम करते हुए अन्य कामों का ज़िम्मा अपने-अपने क्षेत्र के महारथीयों को देते तो इनका इतना पैसा लगाना सार्थक होता और फिल्म के व्यावसायिक रूप से हिट होने की सम्भावना भी बढ़ जाती। 

कुछ दशमलव प्रतिशत में ऐसे प्रयोग चल सकते हैं पर उन अपवादों में वाकई अनेक हुनर होते हैं जो दूसरों को बिना बताये दिख जाते हैं। हर जगह हीरो/हीरोइन बनने के पीछे ये दंभ होता है कि "हमें तो ऊपरवाले ने औरों से अलग ख़ास मिट्टी से बनाया है।" ये सोचने वाले भूल जाते हैं कि ऊपरवाले ने तो सभी को अलग बनाया है। इसी अहंकार के कारण ना जाने कितने महान काम होने से रह जाते हैं। खुद सोचें जब नयी सोच के साथ अपनी-अपनी विधा में दक्ष लोग साथ काम करेंगे तो क्या कमाल कर डालेंगे! बस श्रेय लेने के चक्कर में बात बिगड़ जाती है। अगर आप वाकई किसी नयी जगह श्रेय पाना चाहते हैं तो पहले उसमे उचित समय, मेहनत दें नहीं तो मन ही मन खुद को 56 बातों का हीरो माने लोग तो हर गली में बैठे हैं। काम में अपनी भूमिका को बढ़ाने या मुख्य बनाने के बजाय अगर काम के परिणाम को बेहतर बनाने पर ज़ोर हो तो भविष्य के कामों में अपनेआप व्यक्ति की भूमिका बड़ी होने लगती है। 

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Tuesday, April 18, 2017

मरणोपरांत आशीर्वाद (कहानी) #ज़हन


पत्नी के देहांत के बाद रविन्दु सामंत गहरे अवसाद में चले गए थे। उनकी दिनचर्या अपने कमरे तक सीमित हो गयी थी। वहीं उनके तीन बच्चो की अब और इंतज़ार करने की इच्छा नहीं थी। एक शांत दिन उनके 3 बच्चो ने उन्हें बेहोशी की दवा सुंघा कर बेहोश किया और फिर पंखे से टांग कर उन्हें मार दिया गया, कुछ इस तरह कि पत्नी की मौत के शोक में उनकी मौत एक आत्महत्या लगे। उनकी लिखाई से मिलता-जुलता नोट रखने जा रहा उनका छोटा बेटा राजदीप कुछ देखकर ठिठक गया। पुलिस के सामने दी जाने वाली अपनी कहानी का रिहर्सल कर रहे उसके बड़े भाई-बहन ने कारण पूछा तो जवाब आया - "यहाँ तो पहले से एक नोट पड़ा है!"

"नोट है या ऐसे ही कोई रसीद-वसीद?"

राजदीप - "नोट ही है, लिखा है वो हम पर बोझ नहीं बनना चाहते थे और संपत्ति हम तीनो में बाँटकर आज रात पापा हमेशा के लिए ऋषिकेश के एक आश्रम जाने वाले थे।"

3-4 क्षण अवाक रहने के बाद तीनो बिना नज़रे मिलाये फिर अपने काम में लग गए। कुछ समय बाद पुलिस औपचारिकता निभा कर चली गई। एक हफ्ता बीतने के बाद रविन्दु सामंत के इंश्योरेंस एजेंट की शिकायत पर पुलिस का जांच दल दोबारा उनके घर आया। बीमा एजेंट के अनुसार रविन्दु सामंत के सुसाइड नोट की लिखावट उनकी राइटिंग से पूरी तरह नहीं मिलती थी। पुलिस टीम द्वारा जांच के लिए कुछ सामग्री जप्त की गयी और थोड़े दिन के बाद नतीजे की पुष्टि की बात हुई। तीनों भाई-बहन के चेहरे सफ़ेद पड़ गए और उन्हें जेल दिखने लगा। उन्हें यकीन था कि पुलिस के विशेषज्ञ लिखावट में अंतर पकड़ लेंगे। 5 दिनों बाद उन्हें सभी पत्र और जांच के लिए जप्त की गयी सामग्री वापस कर दी गयी। राजदीप अचंभित था कि आखिर कैसे दोनों लिखावट मिल गयीं और वो लोग बच गए? वह सारे पत्र देखने लगा और एक कागज़ देखकर उसे सांप सूँघ गया।  भाई ने कहा "चलो जान बची, पर तू सिर पकडे क्यों कांप रहा है? ठण्ड रख! अब कोई नहीं आ रहा हमें पकड़ने।"

राजदीप - "सुसाइड नोट की राइटिंग तो मैच हो गयी पापा की लिखावट से पर यह सुसाइड नोट वो नहीं जो मैंने लिखा था... "

समाप्त!
#mohitness #mohit_trendster #मोहित_शर्मा_ज़हन

Sunday, September 4, 2016

Kaddu le lo (Audio Story) #mohitness

Kaddu le lo (Secular Audio Story), कद्दू ले लो (धर्मनिरपेक्ष कहानी) Social Message


*) - Youtube: http://goo.gl/AeI1Bv
*) - SoundCloud: http://goo.gl/klCe7H 
*) - Vimeo: http://goo.gl/uaQ4Ih

Duration - 5 Minutes 28 Seconds

#message #social #mohitness #mohit_trendster #freelancetalents #freelance_talents #religion #fiction #debate #dark #humor #satire #ज़हन #ज़हनजोरी

Thursday, August 4, 2016

Podcast: Views on Antiziganism/Antigypsyism (Hindi) - Mohit Trendster


दुनिया भर में फैले रोमा, सिंटी समुदाय (जिन्हें जिप्सी भी कहा जाता है), के साथ सदियों से हो रहे भेदभाव और अत्याचार पर मेरे कुछ विचार। इस समस्या से जुड़े कुछ और मुद्दे आगे रखने की कोशिश करूँगा। इस से पहले रोमा लोगो पर "सभ्य रोमानी" बंजारा और "उदार प्रयोग" नामक 2 कहानियां लिखा चुका हूँ। - मोहित शर्मा ज़हन 

Friday, July 22, 2016

अर्द्धअच्छा काम (कहानी)

दिनेश ऑफिस से थका हारा घर पहुंचा। उसकी पत्नी रूपाली जो 1 महीने बाद अपने मायके से लौटी थी, उसके पास आकर बैठी। दोनों बीते महीने की बातें करने लगे। फिर दिनेश ने महीने की बातों के अंत के लिए एक किस्सा बचा कर रखा था। "परसो एक आदमी फ़ोन पर बात कर रहा था। जल्दबाज़ी में ऑफिस के बाहर बैग छोड़ गया, मैंने फिर वापस किया...नहीं तो काफी नुक्सान हो जाता बेचारे का।"

रूपाली - "अरे वाह...प्राउड ऑफ़ यू! आखिर पति किसके हो! पर इसमें क्या ख़ास बात है जो बताने से पहले इतना हाइप बना रहे थे?"

दिनेश - "पहले मैंने बैग चेक किया। उसमे वीडियो कैमरा, डाक्यूमेंट्स, 75 हज़ार रुपये, घडी-कपडे टाइप सामान था। तो 17 हज़ार रुपये निकाले बाकी सामान एक बंदे से उसके पते पर छुड़वा दिया।"

रुपाली - "हौ! चोर! ऐसा क्यों किया? गलत बात!"

दिनेश - "देखो जैसा लोग काम करते हैं, वैसा उन्हें फल मिलता है, लापरवाही करोगे तो कुछ सज़ा मिलनी चाहिए ना? मुझे तो भगवान ने बस साधन बनाया। अब उस आदमी आदमी को सबक मिलेगा।"

रुपाली - "ये देखो गीता पढ़ कर भगवान कृष्ण के दूत बनेंगे सर। अरे लौटा दो बेचारे के पैसे।"

दिनेश - "नहीं हो सकता, ये देखो।"

रुपाली - "यह क्या है?"

दिनेश - "जो फ़ोन तुम्हे गिफ्ट किया उसकी रसीद। 16990 रुपये का है, अब 10 रुपये लौटाने क्या जाऊं। इसकी एक-एक ऑरेंज चुस्की खा लेते हैं।"

रुपाली - "यू आर सच ए..."

दिनेश - "आखिर पति किसका हूँ?"

समाप्त!

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- मोहित शर्मा ज़हन

Wednesday, July 6, 2016

जीवन दण्ड (कहानी) - Mohit Trendster

ढेरी नामक तटीय क्षेत्र के जंगल में मानव सभ्यता से दूर टोमस जंगली प्रजाति रहती थी। अब तक दुनिया में ऐसी गिनी-चुनी प्रजातियां रह गयीं थी जिनका मानव सभ्यता से कोई संपर्क नहीं हुआ हो। किसी भी संपर्क की कोशिश पर टोमस जंगली बेहद आक्रामक हो जाते और इनकी सुरक्षा के लिए सरकार या सेना को पीछे हटना पड़ता। समय के साथ प्रगति करते देश में विदेशी निवेशकों और उद्योगपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा। कुछ वर्षों बाद एक प्रभावशाली उद्योगपति की नज़र उस जंगल और तटीय क्षेत्र पर पड़ी। वहाँ मिलने वाले कुछ खनिजों का उत्खनन उसकी संपत्ति कई गुना बढ़ा सकता था पर उसके रास्ते में थी टोमस प्रजाति। समय के साथ सरकार का रुख बदला और उद्योगपति ने छद्म रूप से टोमस जंगलियों को खत्म करवाना शुरू किया। साम-दाम-दण्ड-भेद के बल पर 1-2 वर्षों में टोमस प्रजाति के सौइयों लोगो को मारा गया और बाकी बचे जंगलियों ने अपनी सुरक्षा के लिए आस-पास के क्षेत्रों में प्रवास कर लिया। 

अपनी सफलता पर इतराता वह कॉर्पोरेट माफिया उस क्षेत्र में बहुत सा निवेश ले आया और जंगल के बड़े हिस्से की कटाई के साथ खनन कार्य शुरू किया। गाहे-बगाहे उसे, उसकी टीम या मज़दूरों को वो जंगली दिख जाते तो जंगली घूरते हुए कुछ मंत्र पढ़ देते। ये लोग ऐसे जंगलियों को हँसी में टाल जाते। कुछ महीनों बाद 8 रिक्टर स्केल का भूकंप और सुनामी आई जिस से खनन के लिए हुआ सारा इंतेज़ाम तहस-नहस हो गया और उत्खनन कार्य मे लगे कई लोग मारे गए। बड़े भौगोलिक परिवर्तन में उस तटीय क्षेत्र और जंगल का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया और साथ ही उस उद्योगपति का सारा निवेश डूब कर उसे कंगाल बना गया। कर्जदारों से बचने के लिए उसने आत्महत्या करने की ठान ली पर अपने हाथों से अपनी जान लेने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। अपराधबोध-ग्लानि से भरे उस व्यक्ति ने प्रजाति के प्रमुख के सामने समर्पण कर दिया कि वो तो उसे मार ही देगा। प्रमुख ने उसे ज़िंदा छोड़ दिया और अब वह कॉर्पोरेट किंग अपने अपराधों के बोझ ढोता जंगलों में भटकता है...शायद मरने के बाद भी भटकेगा।

समाप्त!

Sunday, July 3, 2016

स्वर बंधन (लघुकथा) - मोहित शर्मा ज़हन


आलीशान बंगले में एक अंधी महिला ने प्रवेश किया। स्टाफ मे नई सेविका ने उत्सुकतावश हेड से पूछा। 

"ये कौन है?"

स्टाफ हेड - "मैडम के बच्चे चीकू की देखभाल के लिए..."

सेविका - "पर ये तो देख नहीं सकती? क्या मैडम या साहब को दया आ गई इस बेचारी पर और कहने भर को काम दे दिया?"

स्टाफ हेड - "तुझे साहब लोग धर्मशाला वाले लगते हैं? उनकी मजबूरी है इसलिए चला रहे हैं। ये औरत पहले से ही बच्चे की देखभाल करती थी, एक दुर्घटना में इसकी आँखें चली गईं, पर अब भी नन्हा चीकू इसकी लोरी, कहानियां सुने बिना नहीं सोता है। जब चीकू थोड़ा बड़ा होगा इस बेचारी का यहाँ आना बंद हो जाएगा।"

समाप्त!

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Sunday, June 19, 2016

अकूत संपत्ति (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


2 पुराने दोस्त राजीव मेहरा और मयंक शर्मा 18-20 सालों बाद मिले थे। भाग्य के फेर से अपनी ज़िंदगियों में काफी व्यस्त और एक-दूसरे से हज़ारों किलोमीटर दूर की शुरू के कुछ सालों बाद दोनों जैसे भूल ही गए अपने जिगरी यार के हाल-चाल लेना। इतने समय में कई चीज़ें बदल गयीं थी। अब प्रौढ़ अवस्था में वो किशोरों वाली फुर्ती नहीं थी और न ही हर बात पर ठहाके-ठिठोली। हाँ, पर दोनों की आँखों में वही पहले वाली चमक थी। बातें करते-करते दोनों छत पर आ गए, किनारे चेस बोर्ड और प्यादे पड़े थे। 

मयंक - "यार पहले की तरह उछला-कूदा नहीं जा सकता पर चेस तो खेल ही सकते हैं। आ बैठ चारपाई पे!"

दोनों चेस की बाज़ी के साथ जीवन की बातें करने लगे। 

राजीव - "भाई बड़ा मलाल हो रहा है। एक प्रॉपर्टी मुझे 4 साल पहले 37 लाख की मिल रही थी, मैंने तब ली नहीं किसी और चक्कर मे पड़ा था। उसके आस-पास कुछ सोसाइटी अप्रूव हो गईं, हाई-वे बन गया अब कीमत 8 करोड़ है उसकी। उस समय इधर ध्यान दिया होता, नादानी न की होती तो आज तेरा भाई आराम से रिटायर होता।"

मयंक - "बुरा हुआ!...तेरी बात से याद आया मैंने भी करोड़ो-अरबों की संपत्ति गंवा दी अपने हट और नादानी की वजह से।"

राजीव - "मज़ाक मत कर यार! मैं तुझे जानता हूँ... तू ठहरा एक साधु आदमी, ये प्रॉपर्टी वगैहरह में तू कभी नहीं पड़ने वाला।"

मयंक - "सोनिया देशपाल का नाम सुना है?"

राजीव - "हाँ, वो बैडमिंटन मे वर्ल्ड नंबर वन ना? अभी ओलिम्पिक मे कोई मेडल भी जीता है बच्ची ने..."

मयंक - "हाँ, वही! अंदर 14 नेशनल मीट में मेरी 12 साल की बच्ची रूपल ने अपनी सीनियर सोनिया को फाइनल मे हराया था। पढ़ाई मे औसत थी वो और क्लास 7 बड़ी मुश्किल से पास करवाई थी हमने उसे। टूर्नामेंट के बाद उसके क्लास 8 के पेपर थे, उसका ध्यान न डिगे इसलिए नेशनल मीट के बाद मैंने और तेरी भाभी ने इसे इतना मारा और सुनाया की उसने बैडमिंटन छोड़ दिया और यही हम चाहते थे।"

राजीव - "ओह! भाई ये तो बड़ी गलती हो गई! आज शायद रूपल भी सोनिया जैसे मेडल ला रही होती, बाहर के टूर्नामेंट जीत रही होती...पर तूने तो सिर्फ छोटी निवेदिता से मिलवाया। रूपल कहाँ है?"

मयंक - "उसके कुछ दिन बाद तनाव में रूपल ने आत्महत्या कर ली...अरबों-खरबों की संपत्ति, अपनी परी को मैंने अपने पागलपन में गंवा दिया।"

समाप्त!

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#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelancetalents #freelance_talents

Sunday, June 12, 2016

इज़्ज़त का अचार (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन

होपी नामक क़स्बा नक्काशी के काम और पुराने मंदिरों की वजह से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र था। यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या काफी थी। संपन्न परिवार का दिनेश वहां अकेले ट्रेवल एजेंसी, टूर गाइड्स, होटल आदि काम संभालता था। उसे लगता था उसके पुरखों को कमाना नहीं आता था और जितना वे कमा सकते थे उतना कमाया नहीं। वह अपने ड्राइवर्स, होटल मैनेजर, गाइड्स आदि के साथ मिलकर हर सेवा के विदेशी पर्यटकों से ज़्यादा पैसे वसूलता, घटिया सामान खरीदवाता और मौका मिलने पर अपने ही पॉकेटमार, चोर लड़के-लड़कियों से पर्यटकों के पैसे और कीमती सामान उठवाता। 

एक दिन यूँ ही काम का जायज़ा ले रहे दिनेश के पिता ने उसे टोका तो उसका जवाब था - "पिता जी आप बेफिक्र रहो! पुलिस अपनी जेब में है, बस टूरिस्ट को दिखाने का नाटक करते हैं। न इस जगह कोई दूसरा कॉम्पिटिशन है अपना।"

बिजनस सँभालने के डेढ़ साल के अंदर ही पहले से काफी अधिक मुनाफा हुआ तो दिनेश ने खाना खाते हुए अपने बुजुर्गो को ताना मारा - "बाउ जी ऐसे कमाया जाता है रुपया।"

इन डेढ़ वर्षों के दौरान इंटरनेट फ़ोरम्स, सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ रिपोर्ट्स में होपी क़स्बा पर्यटकों से चोरी, धोखाधड़ी के मामलो में कुख्यात हो गया था। कभी हज़ारो विदेशी पर्यटकों के आकर्षण पर अब गिने-चुने विदेशी आने लगे। दिनेश के काम एक-एक कर ठप होने लगे और ज़मीन बेचने की नौबत आ गयी। बाबा से रहा न गया - "बेटा, ज़मीन के अलावा घर भी बेचना पड़े कोई बात नहीं.... इन्हे बेच कर इस परिवार, जगह और देश की खोई इज़्ज़त वापस मिले तो लेते आना।"

समाप्त!
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#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents #freelancetalents #fiction #india #message #tourism

Sunday, March 13, 2016

अक्ल-मंद समर्थक (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


Scene 1) - एक हिंसक गैंगवार के बाद एक छोटे कसबे के घायल नेता को उसके समर्थको की भीड़ द्वारा अस्पताल लाया गया। डॉक्टर्स ने जांच के बाद नेता जी को मृत घोषित कर दिया।  

"अरे ऐसे कैसे हमारे मसीहा को मरा हुआ बता दिया?" समर्थको का गैंगवार से मन नहीं भरा था। .....उन्होंने डॉक्टर्स को ही पीट-पीट कर मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद अस्पताल के मैनेजमेंट ने फैसला किया कि आगे से किसी नेता, दबंग या प्रभावशाली व्यक्ति की मौत होने पर भी उसे ज़िंदा बताकर दिल्ली या पास के किसी बड़े शहर के अस्पताल रेफर कर दिया जाएगा। 

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Scene 2) - ऐसे ही गैंगवार में दूसरे गुट का गंभीर रूप से घायल नेता जब अस्पताल लाया गया तब ड्यूटी पर डॉक्टर एक ऑपरेशन में व्यस्त थे। समर्थको से डॉक्टर्स का इंकार और इंतज़ार बर्दाश्त नहीं हुआ। डॉक्टर्स को भीड़ ने पीट-पीट का लहूलुहान, बेहोश कर दिया।  जब तक डॉक्टर्स होश में आये तब तक ऑपरेशन वाला पहला मरीज़ और इंतज़ार कर रहे नेता जी दोनों त्वरित इलाज के अभाव में दुनिया को टाटा कर चुके थे। समझदारी का परिचय देते हुए यहाँ के डॉक्टर्स ने दूसरे नेता जी को लखनऊ के हॉस्पिटल रेफर कर दिया। 

समाप्त!

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Sunday, March 6, 2016

बाइनरी मम्मी (लघुकथा) - लेखक मोहित शर्मा ज़हन

नेत्र रोग डॉक्टर के पास, अपने 5 वर्ष के बच्चे के साथ चिंतित माँ-बाप बैठे थे। 

माँ - "सीनू के पापा को मोटे वाला डबल-लेंस चश्मा लगा था तो इसे भी चश्मा ना लगे इसलिए नियमित गाजर का जूस, विटामिन और सारे घरेलु नुस्खे करती थी। फिर भी पता नहीं कैसे इसे इतनी कम उम्र में ही धुंधला दिखने लगा?"

डॉक्टर - "बच्चे को ज़रुरत से अधिक विटामिन A देने की वजह से उसे हाइपरविटामिनोसिस-ए विकार हो गया है। जिस से उसका लिवर, हड्डियां कमज़ोर हो गयी हैं और उसकी दृष्टि पर असर पड़ा है।"

महिला का पति सोचने लगा कि घर के अन्य सदस्यों में भी उसकी पत्नी ने किसी न किसी विटामिन का हाइपरविटामिनोसिस करवा रखा होगा। एक बार खुद पत्नी को किसी ने अनीमिया के लक्षण बता दिए, तबसे अब तक पता नहीं देश का कितना लोखंड खा चुकी होगी। तभी महिला की आवाज़ से उसका ध्यान टूटा। 

"आज से गाजर का जूस बंद!"  

समाप्त!

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Art - Shivani Ramaiah
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Monday, November 23, 2015

तेज़ाबी बरसात (लघुकथा) - मोहित ट्रेंडी बाबा


डॉक्टर्स द्वारा हफ्ते-दो हफ्ते का समय शेष पता चलने पर विधिचंद अपने जीवन की लंबी शो-रील के साथ गुपचुप बागीचे में बैठे रहते। देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपना संघर्ष, स्वतंत्रता मिलने के बाद देश के लिए सपने, उम्मीदें...फिर समझौते करते अब तक का सफर। 2 दिनों बाद भारी बरसात होने लगी तो उन्हें याद आया कि जीवन की शो-रील में बचपन वाला हिस्सा चलाना रह गया दिमाग में। जाने कितनी बारिशों में गाँव की मित्रमण्डली के साथ की गयी धमाचौकड़ी के दृश्य आज भी उनके ज़हन में ताज़ा थे। नथिंग टू लूज़ सोच लिए वो बचपन के चलचित्र को जीने एक बार फिर से बरसात में भीगने बाहर निकल आये। 

कुछ क्षण बाद ही आँखों और शरीर की जलन यादों पर हावी हुयी और पीछे से बेटे की आवाज़ आई - "पिता जी! सीजन की पहली बारिश है। सल्फर-वल्फर होगा पानी में, एसिड रेन है, अंदर आ जाइए। देखो जलन से आँखों में पानी आ रहा है आपकी।"

 ...पर विधिचंद की आँखों में पानी किसी और वजह से था। 

समाप्त!

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Sunday, November 22, 2015

भ्रम की परत - मोहित ट्रेंडस्टर

किस्मत का साथ ना देना तो अक्सर सुना है पर किस्मत का सूद समेत हिसाब वसूलना कम ही देखने को मिलता है। अवनीश मोहन की आध्यात्म, धर्म, योग व् आयुर्वेद में रूचि थी पर नौकरीपेशा होने के कारण इनमे कम समय दे पाता था। किसी विषय में रूचि होने से आप स्वतः अपने जाननेवालो में उस विषय के अंधों में काणे राजा बन जाते है। विषय के अंधो से वर्षो तक लगातार मिलती तारीफ़ से ऐसे काणे स्वयं को महाज्ञानी-स्कॉलर समझने का भ्रम पाल लेते है। धीरे-धीरे अवनीश में ये अहंकार विकराल रूप धर चुका था। अब अपनी रूचि से बाहर की बातों में भी वो घुसपैठ कर देता और अपनी बातें, निष्कर्ष सामने वाले पर बड़े आक्रामक अंदाज़ में थोपता था। अपनी बात काटे जाने पर तो वो आग उगलता ड्रैगन बन जाता। कभी कबार सब निष्फल होने पर अपना पक्ष ऊपर रखने के लिए उसका आखरी दांव होता कि "अभी बच्चे/नादान हो! मुझे 23 वर्ष का अनुभव है फलाना फील्ड का..."

उनकी यह स्वघोषित ख्याति स्थानीय चैनल में पहुँची और एक विदेशी अनुसंधानकर्ता से योग व आयुर्वेद पर चर्चा हेतु उन्हें आमंत्रित किया गया। निमंत्रण के बाद फूल के डायनासोर हुए अवनीश द्वारा कब चर्चा को बहस में बदल दिया गया पता ही नहीं चला। विदेशी स्कॉलर ने उनकी अनेक धारणाएं, भ्रम गलत साबित किये और उनके ज्ञान को सुपरफिशियल (सतही) करार दिया। इतनी कॉम्प्रीहेंसिव हार के बाद आदतानुसार अवनीश के मुँह से जादुई शब्द निकले - "मुझे 23 साल का अनुभव है ...", सामने बैठे स्कॉलर ने हँसते हुए कहा - "वर्षो में अनुभव को नापा नहीं जा सकता, फिर भी मुझे 23 दुनी 46 वर्षो का अनुभव है इन विषयों के अध्यन्न, अनुसंधान का।"

जीवन की सबसे बड़ी हार और धूलधूसरित अहंकार के साथ दुखी मन से अवनीश घर को चले और रास्ते में खुद को ढाँढस बंधाया कि इंग्लिश प्रोग्राम ज़्यादा लोग नहीं देखेंगे और वह अपने सर्किल के अंधों में काणे राजा बने रहेंगे।

समाप्त!

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Friday, September 4, 2015

सबकी अनैतिक बढ़त - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


अंतर्राष्ट्रीय साइकिल रेस के लिए चुना गया नेचुरल कोर्स शिव के लिए नया नहीं था। आखिर यही वह रास्ता था जहाँ वो वर्षो से प्रतिदिन अभ्यास करता था। उसके मित्रों और जानने वालो को पूरा विश्वास था कि यह रेस जीतकर शिव अंतर्राष्ट्रीय सितारा बन जाएगा। कॉलेज में कुछ हफ्ते पहले ही उसको यह दर्जा मिल गया था। शिव के कोच राजीव मेहरा मानकर बैठे थे कि अगर उस दिन कुछ ऊँच नीच हुयी, तब भी शिव शुरुआती कुछ रेसर्स में आकर बड़ी इनामी राशि अर्जित कर लेगा। स्थानीय कंपनियों में यह बात फैली तो उससे कुछ स्पोंसर्स जुड़ गये। 

रेस का दिन आया और रेस शुरू हुयी। पहले चरण में शिव काफी पीछे रहा, लोगो ने माना कि शायद वह अपनी ऊर्जा बचा रहा है या यह उसकी कोई रणनीति  है। पर रेस ख़त्म होने पर कुशल साइकिलिस्ट शिव औसत 17वें स्थान पर आया। स्थानीय लोगो और उसके करीबियों में अविश्वास और रोष था। जो रेस शुरू होने से पहले लाइमलाईट लेने में सबसे आगे थे, वही कोच और स्पोंसर्स रेस के बाद ताने देने वालो में सबसे आगे थे। जबकि एक शून्य में खोया शिव प्रतियोगिता की घोषणा के दिन से ही अलग उधेड़बुन में था। 

माहौल शांत होने के बाद एक शाम अपने मित्र सुदीप्तो के सामने उसने अपना दिल खोला। 

शिव - "मैंने खुद को बहुत समझाया पर मन को समझा नहीं पाया। मुझे लगा कि एक रास्ता जिसके हर मोड़, उंच-नीच यहाँ तक कि हवाओं की दिशा तक से मैं इतना करीब से परिचित हूँ पर मेरा जीतना अनैतिक होगा, एक चीटिंग होगी बाकी साइकिलिस्टस के साथ। धीरे-धीरे यह बातें मेरे दिमाग पर इतनी हावी हों गयी कि रेस के दिन वो बोझ मेरे पैरों, मेरे शरीर पर महसूस होने लगा और परिणाम तुम जानते ही हो।"

सुदीप्तो - "भाई, पहली बात तो ये कि दिमाग बड़ी कुत्ती चीज़ है, किसी मामले में बिलकुल परफेक्ट और कहीं-कहीं बिलकुल फ़िर जाता है। तो यह जो तुम्हारे साथ हुआ ये किसी के साथ भी हो सकता था। किसी बात में जब हमे सीधा लाभ मिलता है और हम किसी भी रूप में प्रतिस्पर्धा का हिस्सा होतें है तो कभी-कभी अपराधबोध लगता है कि हमे मिली यह बढ़त तो गलत है। पर इस बढ़त को एक मौके की तरह देखो जिसे पाकर तुम अपने और अपने आस-पास के लोगो के लिए एक बेहतर कल सुनिश्चित कर सकते हो। सोचो अगर यह रेस तुम जीतते तो अपने साथ-साथ कई लोगो का जीवन बदल देते और क्या पता आगे इस पूरे कस्बे की तस्वीर बदल देते। जहाँ तक अनैतिक बढ़त या चीटिंग की बात है वह तो तुम अब भी कर रहे हो, बल्कि हम सब करते है।"

शिव - "भला वो कैसे?"

सुदीप्तो - "तुम्हारे साधन-संपन्न माता-पिता है, क्या यह उन लोगो के साथ चीटिंग नहीं जो बचपन में ही अनाथ हो गए या जो किसी स्थिति के कारण गरीब है? तुम 6 फुट और एथलेटिक बॉडी वाले इंसान हों, क्या यह उन लोगो पर अनैतिक प्राकृतिक बढ़त नहीं जो अपाहिज है? तुम्हारे क्षेत्र में शान्ति है, क्या यह देश और दुनिया के उन लोगो पर बढ़त नहीं जिन्हे युद्ध के साये में जीवन काटना पड़ता है?"

शिव - "इस तरह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं।"

सुदीप्तो - "इस तरह सोचोगे तो कभी जीवन में कोई मौका भुना नहीं पाओगे। ऐसे एंगल से सब सोचने लगे तो दुनिया के सारे काम उलट-पुलट जायेंगे। हाँ, हमे कुछ बातों में दूसरो पर प्राकृतिक या अन्य बढ़त हासिल है पर कुछ बातों में दूसरो को लाभ है। पते की बात यह है कि हम स्वयं को बेहतर बनाने में और अपने काम को अच्छे ढंग से करने पर ध्यान दें, अब अगली रेस कि तैयारी करो। गुड लक!"

समाप्त!

- मोहित शर्मा (ज़हन)

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Saturday, July 18, 2015

कुछ पल और गुज़ार ले... | मोहित शर्मा (ज़हन)

Artwork - Kinannti
रजनी का एक राष्ट्रीय चिकित्सीय प्रतियोगी परीक्षा का यह अंतिम अवसर था। रजनी की मेहनत घर में सबने देखी थी और डॉक्टर बनने का सपना भी लगनशील रजनी और उसके परिवार ने साथ देखा था। यह लगन ऐसी संक्रामक थी कि जीवन में कोई ध्येय ना लेकर चलने वाली, स्वभाव में विपरीत रजनी की जुड़वाँ बहन नव्या, सिर्फ उसके सहारे मेडिकल फील्ड लिए बैठी थी। यह रजनी की संगत का ही असर था जो पढाई में कमज़ोर नव्या ने अच्छे अंको से दसवी, बारहवीं पास की थी, यह नव्या भी इस राष्ट्रीय परीक्षा में अंतिम अवसर था। इंटरनेट पर परिणाम घोषित हुआ और एक बार फिर से रजनी बहुत कम अंतर से असफल हुयी। रजनी का जैसे पूरा संसार ही अंधकारमय हो गया। जब तक कोई कुछ समझाता, समझता उस से पहले ही रजनी ने आत्महत्या कर ली। 

नव्या को पहले ही पता था कि वह सफल नहीं हो पाएगी और परिणाम ने उसके अंदेशे पर मोहर लगा दी पर खुद से ज़्यादा दुख नव्या को अपनी मेहनती बहन रजनी के लिए था। अब उसे लगा कि काश उसे थोड़ा समय मिल पाता अपनी बहन को समझाने का। माता-पिता अविश्वास से एकटक कहीं देखकर अपनी कल्पनाओ को सच्चाई पर हावी करने की हारी हुयी कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद अपने परिवार के लिए नव्या ने स्वयं को संभाला और क्लीनिकल रिसर्च में 8 महीनो का कोर्स कर उसे अच्छे वेतन पर एक विदेशी कंपनी में नौकरी मिली। नव्या को पता था कि अगर उसकी जगह उसकी बहन होती तो अपने ज्ञान और मेहनत के दम पर उस से अच्छे स्थान पर होती, उस स्थान पर जो  उसे उस प्रतियोगी परीक्षा में सफल होने के बाद भी ना मिलता। कुछ समस्याएँ जो कभी जीवन को चारो और से घेरे ग्रहण लगाये सी प्रतीत होती है, जिनके कारण सुखद भविष्य की कल्पना असंभव लगती है, चंद महीनो बाद ऐसी समस्या का अस्तित्व तक नहीं रहता। थोड़ा और समय बीत जाने के बाद  तो दिमाग पर ज़ोर डालना पड़ता है कि ऐसी कोई दिक्कत थी भी जीवन में। नव्या अक्सर सपने में रजनी को समझाते हुए नम आँखें लिए जाग जाती है - "बहन! बस ये थोड़े लम्हें काट ले, जो इतना सहा...वो दर्द सहकर बस कुछ पल और गुज़ार ले....सवेरा होने को है..."
 समाप्त! 
- मोहित शर्मा (ज़हन) 
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Tuesday, September 9, 2014

Mohit Trendster Pravachan # 794

नमस्ते! आप सभी को। यह वर्क इन प्रोग्रेस काम बहुत जल्दी पढ़ने को मिलेगा आपको हिंदी और बांग्ला में।


बीते दिनों जो प्रकरण हुए तब मैं सफर में था और उस समय काफी कुछ कहने का मन था पर मोबाइल से पोस्ट करना मुझे जमता नहीं, अगर कोई बात मिसइंटरप्रेट होती तो मैं फॉलो अप नहीं कर पाता, अब उतना रोष नहीं है मुझमे। अब थोड़ी शान्ति हुई है तो दोबारा आग नहीं भड्काउँगा पर कुछ बातें कभी आगे लिखने के लिए टाल दी तो हमेशा के लिए रह जायेंगी। भाषा और लहज़ा सही होना चाहिए था जो नहीं हुआ पर माफ़ी माँग ली गयी, बहुत अच्छा किया। आशा है आगे ध्यान रखेंगे।

दोस्तों, बात प्रकरण से कैसे जुडी है ये आप लेख पूरा पढ़ने के बात जानेंगे। बड़ा इंसान कैसे बनते है मुझे बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं पर अच्छा इंसान बनने में शायद थोड़ी मदद कर सकता वो भी सिर्फ एक सलाह से।

अगर कोई गैर-कानूनी, पागलपन गतिविधियों में नहीं लिप्त है तो तुलनात्मक बातों से ऊपर उठकर व्यक्तिगत गुणों को और व्यक्तियों को सराहना सीखें। ज़िन्दगी एक रेस ज़रूर है पर कई वजहों से ना तो सभी एक पॉइंट से रेस शुरू करते है और ना ही सबकी रफ़्तार और रास्ता एक जैसा होता है। किसी की रेस ही पॉइंट के काफी पीछे से शुरू होती है, किसी की राह में बीमारी-घर आदि का घर्षण बढ़ जाता है, कोई खुले विचारो वाले या संपन्न घर में होने की वजह से रेस में प्राकर्तिक बढ़त पा लेता है। तो आगे कभी भी यह कहने से पहले सोचियेगा की फलाना तो पहाड़ की चोटी चढ़ गया तुम अभी तक छोटे से पठार पर हो, शायद वो फलाना इस पठार वाले की जगह होता तो इतना भी ना कर पाता और इतना भी एक उपलब्धि होती, या ये उधर होता तो एवेरेस्ट चढ़ जाता। मेहनत और प्रतिभा को हमेशा सलाम पर तुलना क्यों, जब रास्ता एक सा नहीं? क्या किसी सी.ए. जो लेखक बनना चाहता था पर घर की किसी आपात स्थिति में अलग कैरियर चुना के 10 ऑडिट करना 2 कॉमिक्स लिखने के बराबर कहा जा सकता है? बिलकुल नहीं, क्योकि दोनों अलग-अलग बात है। नयी पीढ़ी है, तो पहले से कहीं तो सुधार दिखे, चलिये ये तुलना के पैमाने हटाने से शुरुआत करें जहाँ एक के कम्पेरिजन में दूसरे की औकात नापी जाती है। क्या हम दोनों को उनके व्यक्तिगत गुणों पर सराह नहीं सकते? फिर आप कहते है की "बॉस या मंत्री चापलूसों की ही क्यों सुनता है? ये सिस्टम में बड़ा खोट है आदि!" कहीं जाने-अनजाने आप खुद तो दोषी नहीं? जैसे ये तर्क की जब फलाना ने खुद कुछ नहीं किया तो उसको आलोचना का हक़ नहीं, या पहले इतना करो तब आलोचना करो। इस लॉजिक से तो फिर सराहना करने का भी हक़ नहीं, कुछ कहने का हक़ नहीं? क्योकि जब तक उस स्पेसिफिक क्षेत्र में उस मुकाम पर ना आ जाये कोई, तो उसको किस स्थिति में आपने तारीफ करने लायक जज कर दिया? सराहना करने का भी हक़ नहीं! अगर आप यह कहते है की हमे कॉमिक्स पढ़कर आनंद आया इसलिए तारीफ़ तो उस फलाना को शायद मज़ा नहीं आया और उसने आलोचना कर दी। यहाँ गौर करने वाली बात है फलाना ने 256 जगह अलग-अलग कॉमिक्स की तारीफ़ की इसी स्टाइल में तब अलग से शाबाशी नहीं मिली, अब मुझे जितना पता है शायद 256, एक से बड़ी संख्या होती है। मेरी बात यह अभिप्राय नहीं की सही-गलत को एक तराज़ू में तोले पर जिस intensity से दोनों पार्टीज़ ने एक दूसरे को कोसा वो सही नहीं। वो भी तब जब दोनों एक ही तरफ है कुछ मतभेदों को अगर नज़रअंदाज़ कर दें तो। 


यहाँ मुझे टो.. मेरे मतलब है एडमिन मुकेश जी भूमिका गलत लगी जिन्होंने निरंतर आग में घी डालने का काम किया आशा है आगे वो अपने कलेक्शन, लेखों और मोशन ट्रेलर्स की तरह सकारात्मक और अच्छी-अच्छी बातें करेंगे।
P.S. Kisi wajah se apni purani id se post nahi kar paa raha hun par wo abhi bhi chaalu hai. 


- Mohit Trendster

Saturday, February 8, 2014

सावन से रूठने की हैसियत ना रही - मोहित शर्मा (ज़हन)

 समाज में एक वो तबका भी है जिनके दो चेहरे होते है, एक घर-बंद दरवाज़ो के बाहर का चेहरा और दूसरा घिनौना चेहरा जिसकी शिकार कोई असहाय या उस व्यक्ति पर  बहुत विश्वास करने वाली या उसकी अपनी पत्नी जो इसको दिनचर्या का हिस्सा मान लेती है। मामले सामने आने पर कभी-कभी पीड़ित को ही दोषी । जिसे सही-गलत कि समझ नहीं उस समाज कि  क्यों चिंता करना? ये कविता मेरी ऐसी ही बहनो पर है जो चुप-चाप घुटबना दिया जाता है जिस डर से कई स्त्रियां ये बात अपने तक रख कर खुद में घुटती रहती है। हाँ, कहना आसान और करना मुश्किल पर अपने लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए चुप न रहे। अभी छोटी मानसिकता वाले समाज में कई साफ़ दिल रखने वाले है, वो आपको कोसेंगे नहीं, बल्कि आपका साथ देंगे कर यौन हिंसा का दर्द पालती रहती है।  

सावन से रूठने की हैसियत ना रही....
(November 2013)
सख्त शख्सियत  अब नहीं लेती अब मौसमो के दख्ल
अक्सर  आईने बदले  अपने अक्स की उम्मीद में ...  
हर आईना दिखायें अजनबी सी शक्ल। 
अपनी शिनाख्त के निशां मिटा दिये कबसे ...
बेगुनाही की दुहाई दिये बीते अरसे ....
दिल से वो याद जुदा तो नहीं !
मुद्दतों उस इंतज़ार की एवज़ में वीरानो से दोस्ती खरीदी,
ज़माने से रुसवाई के इल्ज़ाम की परवाह तो नहीं !
सावन से रूठने की हैसियत ना रही। 
रोज़ दुल्हन सी सवाँर जाती है मुझको यादें ....
हर शाम काजल की कालिख़ से चेहरा रंग लेती हूँ ....
ज़िन्दगी को रूबरू कर लेती हूँ ...
कभी उन यादों को दोष दिया तो नहीं ...
सावन से रूठने की हैसियत ना रही। 
इज़हार रे याद,
हाल ए दिल बयाँ करना रोजाना अमल लाये,
कैसे मनाएँ दिल को के आज हकीकत सामने है...
रोज़ सा खाली दिन वो नहीं ...
उस पगडंडी का सहारा था,
वरना रूह ख़ाक करने में कसर न रही ....
ज़हर लेकर भी जिंदगी अता तो नहीं ....
सावन से रूठने की हैसियत ना रही। 
इल्जामो में ढली रुत बीती न कभी,
जाने कब वो मोड़ ले आया इश्क ...
बर्दाश्त की हद न रही। 
अरसो उनकी बदगुमानी की तपिश जो सही ....
सरहदें खींचने में माहिर है ज़माना, 
दोगली महफिलों से गुमनामी ही भली ..
खुद की कीमत तेरी वरफ़्तगी से चुनी ...
जिस्म की क़ैद का सुकून पहरेदारों का सही ...
ख्वाबो पर मेरे बंदिशें तो नहीं ...
सावन से रूठने की हैसियत ना रही।
कैसी महफ़िल है जहाँ बयानो पर भड़कती भीड़,
मेरे अंजामो पर तड़पती तो नहीं...
 उस हैवानियत पर भड़कती क्यों नहीं?
मेरे खूबसूरत चेहरे सी सबकी सीरत तो नहीं...
सावन से रूठने की हैसियत ना रही।
क्यों यह फ़िज़ा भारी सी है?
कहीं इस पर भी सुर्ख धुंद हावी तो नहीं? 
कल रूह हार कर पूछ ही बैठी,
यहाँ इंसाफ से पहले बुतों के सामने कितनी दरख्वास्त लगाती हूँ,
सीधे खुदा तक जाती क्यों नहीं? 
सावन से रूठने की हैसियत ना रही।


 - मोहित शर्मा (ज़हन)
*Poem got the special mention (Roobaru Duniya January 2014 Issue)  in the inaugural Kavya Pallavan Competition organized by Hind Yugm.