...is "Celebrating (un)Common Creativity!" Fan fiction, artworks, extreme genres & smashing the formal "Fourth wall"...Join the revolution!!! - Mohit Trendster

Friday, May 8, 2015

पोएटिक पोस्ट : मेरी आज़ादी का रुआब - मोहित शर्मा (ज़हन)


नमस्ते! दुनियाभर में अनेको लोग अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी संस्था, प्रभावशाली व्यक्ति, विचारधारा, सामाजिक प्रणालियों की परछाई में अपना जीवन काट देते है। उनसे अधिक दुर्भाग्यशाली लोग ऐसे होते है जो इतने जागरूक ही नहीं हो पाते कि अपनी सोच बना पायें। स्थापित प्रणाली पर बिना सवाल उठाये भेड़चाल का हिस्सा बन अपना जीवन काट देते है। उन्ही परिस्थितियों में काफी कम संख्या में लोग गलत परन्तु प्रचलित बातों के खिलाफ आंदोलन करते है। शांत, संतुष्ट जनता का बड़ा बहुमत होने के कारण सरकारों एवम शासको के लिए ऐसे विद्रोहों, आंदोलनों को कुचलना आसान बन जाता है।

अक्सर ऐसी कई आहुतियों की लपट हम तक पहुँच नहीं पाती। जैसे सूखी लकड़ियों और घी-कपूर में प्रज्वलित अग्नि में हवन सामग्री स्वाहा हो जाती है, वैसे ही शायद इस संघर्ष  का महत्त्व इन इकाई बलिदानो में साफ़ ना दिख पाये पर लगातार मंत्रो के बाद पड़ रही हवन सामग्री अग्नि की प्रचंडता समाप्त कर देती है, ठीक  वैसे ही लगातार छोटे-छोटे संघर्षों की बूँदें एक सैलाब बनकर भव्य शासको, शक्तिशाली विचारधारों को बहा ले जाती है। जनता को पूरे न्याय की ना जानकारी होती है और ना ही उम्मीद पर समस्या तब आती है जब बूँद-बूँद के लिए करोडो, अरबों को घिसटते हुए जीवन व्यतीत करना पड़ता है।  हर सक्षम नागरिक कि नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि असल और ढोंग के संघर्षों में फर्क करते हुए अपने कम भाग्यशाली देशवासियों की मदद में योगदान दे, प्रयासरत रहे। इस काव्य कॉमिक की प्रेरणा मुझे तिब्बत संघर्ष में बरसो से खुद को जलाकर, अपनी बलि दे रहे प्रदर्शनकारियों से मिली। 

यह यश ठाकुर ( हरीश अथर्व) जी कि पहली कॉमिक है जो काफी समय से अटकी हुयी थी, आखिरकार उनकी मेहनत सबके सामने है जिसके लिए उन्हें बहुत बधाई! हालाँकि, इस बीच उनकी कला में काफी सुधार आया है। पाठको और फेनिल शेरडीवाला जी के सुझावों, अवलोकन अनुसार आगे बेहतर काम आप सभी के सामने होगा। 
आपका 
मोहित शर्मा (ज़हन) 

Thursday, April 23, 2015

New Kavya Comic


Meri Aazadi ka Ruab exclusively at Fenil Comics website and social media pages. by yours truly, Yash (Harish Atharv) Thakur, Soumendra Majumder, Ajay Thapa and Manabendra Majumder.

Wednesday, April 8, 2015

लघुकथा - दहेज़ डील (मोहित शर्मा ज़हन)

लघु कथा - "दहेज़ डील" (from 'Bonsai Kathayen' collection) 

कसबे का लड़का लग गया मोबाईल टावर लगाने और उसकी मरम्मत करने वाली कंपनी मे। तनख्वाह भी अच्छी और घर से भी ठीक-ठाक। कसबे कि जवान लडकियाँ (जो उसकी जाति की थी) उनके माँ-बाप के लिए वो लड़का सोने की खान था। ऐसे ही एक आशावान माँ-बाप अपना भाग्य आजमाने लड़के के घर पहुँचे।

कसबे भर मे लगातार मिल रहे मुफ्त के सम्मान से लड़के के परिवार के भाव बढ़ गए थे।

लड़के की माँ - "हम्म ...लड़की तो सुन्दर है पर दहेज़ का क्या रहेगा?"

लड़की के पिता - " ....जी! बारहवी के बाद कम्पूटर कोरस भी किया है, ढाई हज़ार कमा रही है स्कूल मे। सारे काम कर लेती है। वो शादी अच्छे से करेंगे ...और .."

लड़के के पिता - " ....हाँ जी! पर दहेज़ का भी तो बताइए ..."

लड़की की माँ - "जी ...देने को तो ज्यादा कुछ नहीं है. ..पर .."

लड़के की माँ -" फिर तो जी मुश्किल है ..."

लड़की के पिता - "वकील साहब स्टेशन के पास ज़मीन है थोड़ी और थोड़े घर के पास कुछ खेत है।"

लड़के के माता-पिता ज़मीन सुनकर खुश हो गए।

"तो आप ज़मीन दोगे बेटी के साथ ...."

लड़की के पिता - "नहीं जी, आप बेटे जी से कह कर 2-3 टावर लगवा दो मोबाइल वाले हमारी ज़मीन और खेतो मे। उनके जो हर महीने 20-22 हज़ार आयेंगे वो आप लोगो के ..."

- मोहित शर्मा (ज़हन) ‪#‎mohitness‬ ‪#‎mohit_trendster‬

Wednesday, April 1, 2015

सपनो की एक्सपायरी डेट - मोहित शर्मा (ज़हन)


अपने सपनो के लिए जगदोजहद, मेहनत करते लोगो को देखना प्रेरणादायक होता है। एक ऐसा आकर्षण जिसकी वजह से हम फिल्मो, टीवी सीरियल्स से बंधे रहते है, उनके किरदारों में अपने जीवन को देखते है, ऐसा आकर्षण जिसके कारण कठिन समय में हम खुद को दिलासा देते है कि यह सब झेलने के बाद, यह वक़्त गुजरने के बाद हमे अपना सपना मिल जायेगा या उस से दूरी और कम हो जायेगी। कुछ ख्वाबो का महत्व इतना होता है कि उनके पूरे या ना पूरे होने पर जीवन की दिशा बदल जाती है, जबकि कुछ सपने बस किसी तरह अपनी जगह आपके ज़हन में बना लेते है - बाहर से देखने पर यह सपने बचकाने लगते है पर फिर भी अक्सर यह आपको परेशान करते है। 

व्यक्ति की आयु, परिस्थिति अनुसार सपने बदलते है, नए सपने इतने बड़े हो जाते है जो किसी उम्र के अधूरे-पुराने सपनो के आड़े आकर धुँधला कर देते है। मैंने कहीं सुना था कि सपनो को साकार करने का कोई समय नहीं होता जब साधन, भाग्य साथ हों तब उन्हें पूरा कर उनका आनंद लीजिए। पर जीवन तमाम चुनौतियाँ, उबड़-खाबड़ रास्ते लेकर आता है जिसके चलते निरंतर कुछ न कुछ सोचता दिमाग उन बिन्दुओं से काफी आगे बढ़ चुका होता है।  

अपना ही उदाहरण देता हूँ। मुझे बचपन से ही प्लेन में बैठने बड़ी इच्छा थी पर समस्या यह थी कि उस समय लगभग सभी करीबी रिश्तेदार दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के सीमावर्ती शहरों में रहते थे जहाँ 100 से 600 किलोमीटर्स के दायरे में होने के कारण अगर कोई आपात्कालीन स्थिति ना हो तो वैसे शादी आदि समाहरोह में पहुँचने के लिए साधनो में एरोप्लेन से पहले वरीयता ट्रैन, बसों को मिलती है। ऊपर से मध्यमवर्गीय परिवार तो 90 के दशक में टीवी पर ही प्लेन देखकर खुश हो लेता था। (अब घरेलु यात्रा हवाई टिकटों के दामो में काफी कमी आयी है खासकर पहले बुक करने पर, कभी-कभी तो बहुत लम्बी दूरी की हवाई यात्रा ट्रैन यात्रा से सस्ती पड़ती है) तो स्थिति यह रही कि बचपन से किशोरावस्था आई, जिसमे हवाई यात्रा की प्रबल इच्छा बनी रही पर कभी ऐसा मौका नहीं बना। वर्तमान में जहाँ सक्रीय हूँ यानी मेरठ, दिल्ली इनकी दूरी 70-75 किलोमीटर्स है और अब तक प्लेन में नहीं "घूमा"। 

पर अब वो सपना मर गया है, इच्छा कहीं गुम हो गयी जैसे उसकी एक्सपायरी डेट निकल गयी हो। किसी समय एक बच्चे की जो सबसे बड़ी विश होती थी जिसके लिए वो भगवान जी से प्रार्थना करता था, आज उसके पूरे होने ना होने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। उल्टा चिढ होती है, बेवजह गुस्सा आता है इस ख्वाईश के कभी याद आने पर। अब अगर कभी हवाईजहाज़ में बैठने का अवसर मिलेगा तो मन किसी प्रौढ़ उधेड़बुन में लगा होगा, रूखी आँखों में उस बच्चे या किशोर की चंचलता नहीं होगी जो अक्सर सपनो में प्लेन में बैठकर दुनियाभर की सैर कर आता था। 

कुछ सपनो का पूरा होना आपके हाथ में होता है और कुछ का भाग्य पर निर्भर। अपने बस में जो बातें हो उन्हें प्रगाढ़ता से पूरा करें ताकि इच्छाएँ मरने या बदलने से पहले....सपनो की एक्सपायरी डेट से पहले वो पूरे हो जायें।  :) 

 - मोहित शर्मा (ज़हन)
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Wednesday, March 4, 2015

झूठ की नोक पर बंदी भारत - मोहित शर्मा (ज़हन)


Note - वैसे तो आर्टिकल में मीडिया की आलोचना है पर आशय मुख्यधारा, बहुसंख्य मीडिया से है। इस क्षेत्र में भी हर जगह की तरह अच्छे, ईमानदार लोग, संस्थायें भी है। 

क्या भारत दुनिया के सबसे अच्छे राष्ट्रों में है? नहीं! क्या भारत दुनिया के सबसे बुरे देशो में है? नहीं! भारत लगभग हर पक्ष में कहीं बीच में है। तकनीक, पर्यटन, विकास, खेल, अपराध सब में। फिर कैसे हमे हिंसक अपराधो, महिला के विरुद्ध अपराधों, घोटालो जैसे मुद्दों में सबसे शीर्ष पर आ जाते है? कैसे पूरे विश्व की कैपिटल बन जाते है इन आपराधिक, अनैतिक मामलो में? मैं मानता हूँ कि अपराध से, बुराई से लड़ाई तेज़ होनी चाहिए और भारत में बहुत से सुधारों की आवश्यकता है पर हर पक्ष में योजनाबद्ध तरीके से, "कोसनाबद्ध" तरीके से नहीं। 

भारतीय मीडिया के बहुसंख्य हिस्से में एक ट्रेंड चला है पिछले कुछ वर्षो से जो मुझे चिंतित कर रहा है। हैरतअंगेज, होश उड़ा देने वाली, घृणित कर देने वाली ख़बरों को वरीयता 
देना। साथ ही देश और उस से जुडी बातों को कोसना। बाकी नियमित स्तर पर इतने विशाल देश से आयी सामान्य-अच्छी ख़बरें, उपलब्धियाँ इन "चौंका" देने वाले खुलासों में कहीं खो जाती है। परेशानी यहीं ख़त्म नहीं होती अक्सर घटनाओं से अधिक कवरेज बड़े लोगों के बयानों को मिलती है की फलाना ने फलाना बोलकर फलाना मानसिकता दर्शायी। देश में विचारों को व्यक्त करने की आज़ादी है और अगर वो बयान किसी के प्रति हिंसा नहीं फैला रहे (जो अधिकतर होता है) तो आप क्यों ठेकेदार बन रहे हो किसी के एक बयान के बल पर उसका पूरा व्यक्तित्व नापने वाले? आप जो खुद कॉर्पोरेट्स आदि निजी हितों से प्रायोजित ख़बरें दिखाते फिरते हो। वह भी एक इंसान है और कम से कम असली इंसान की हर मामले में नपी-तुली राय हो ही नहीं सकती। 

दूसरी बात जो मैं अक्सर दोहराता हूँ की लगभग 130 करोड़ के देश मे दशमलव प्रतिशत अपराध भी बाकी छोटे देशो के मुकाबले बड़े लगेंगे पर इसका मतलब यह नहीं की अपराधों के मामले में भारत पहले नंबर पर है। दुनिया के 200 कुछ देशों में अपराध दर में भारत कहीं बीच में है, 147 देशो के उपलब्ध डाटा में भारत का स्थान 72वां था, अगर सभी देशो से रिकार्ड्स आते तो भारत 100 की संख्या पार कर जाता, यानी भारत से अधिक अपराध दर वाले दर्जनो देश है। पर खबर पहले दिखाने का, सेन्शेसनलाइज़ करने का ऐसा भूत सवार है न्यूज़ चैनल्स, प्रिंट न्यूज़ मीडिया को कि ख़बरें वेरीफाई करना तो दूर, ख़बरें ईजाद तक कर दी जाती है। दिक्कत खबरें देने से नहीं है, दिक्कत है एक आपातकाल, मुसीबत का माहौल दिखाते रहने कि है। जिस से आम जन में पूर्वाग्रह बनने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक असर बैठता है, देश और लोगो के लिए हिकारत की भावना आती है की "मैं तो अच्छा/अच्छी हूँ, दुनिया बुरी है, और ऐसे लोग के साथ ऐसा ही होना चाहिए।" तो पहली बात देश, समाज उतना बुरा नहीं है जितना समय के साथ आपके मन में बैठा दिया गया है। हमारे विशालकाय देश का 2-3 प्रतिशत ही ऑस्ट्रेलिया की जनसँख्या से अधिक है, बाकी आप खुद समझदार है। तो अगली बार कोई संख्या देख कर पूरी जाँच कीजिये हल्ला काटने से पहले। 

अब इस एमरजेंसी के माहौल का पहला नुक्सान विदेशों में यह ट्रेंड कम है तो जब कोई देश खुद ही अपनी खिल्ली उड़ाए तो कंटेंट और वैरायटी के लिए यहाँ का "कोसना" वहाँ स्थानांतरित हो जाता है। तभी जिन देशो में भारत से ऊँची अपराध दर है वो तक हमारे ऊपर डॉक्यूमैंटरीज़, स्टोरीज, कार्टून्स, न्यूज़ रिपोर्ट्स दिखा कर अपनी जनता का ध्यान बँटाकर, अपनी सरकाओं की मदद करते है। 

दूसरा घाटा...कानून, संविधान, नीतियों के गलत बनने से होता है क्योकि समय के साथ लगातार ऐसी ख़बरों से गलत दबाव बनता है सिस्टम पर। फिर जल्दबाज़ी में गठित कानून, संवैधानिक बदलाव एक बड़े वर्ग को नुक्सान पहुँचाने लगते है। साथ ही वर्गों, स्थानो, लोगो के बीच पूर्वाग्रह, नकारात्मक वर्गीकरण बढ़ने लगता है I जिसमे वो अधपकी, अधूरी जानकारी के आधार पर फैसला सुनाकर पब्लिक ट्रायल से दबाव बनाते है। 

पर प्रोपोगंडा नहीं होगा, हल्ला नहीं होगा तो चैनल्स को दर्शक, विज्ञापन और स्पोंसर्स कैसे मिलेंगे? कागज़ पर चलने वाली या खानापूर्ति को स्टोर रूम में ऑफिस खोले हज़ारो स्वयंसेवी संस्थाओं को जनता, सरकार और विदेशी डोनेशन, ग्रांट्स कैसे मिलेंगी? विनती कुछ गलत होने पर हल्ला ना करने की नहीं है, बल्कि जितनी बात है उस स्तर का हल्ला करने की है। अपराध, अनैतिकता के खिलाफ आवाज़ और एक्शन दोनों ज़रूरी है पर कायदे में। अपने प्रतिद्वंदीयों को हराने की होड़ में देश की छवि तो धूमिल ना करें। मुझे गर्व है कि मैं समृद्ध विरासत वाले विविध देश भारत का नागरिक हूँ और सामान्य जीवन जीने वाले उन देशवासियों कि मेजोरिटी का हिस्सा हूँ जो खबरों के मामले में आपके मानको पर बोरिंग बैठते है, पर उनको दिखाये बिना भारत में त्राहि-त्राहि की तस्वीर दुनिया पर प्रोजेक्ट करना मेरे लिए किसी जघन्य अपराध से कम नहीं क्योकि क्योकि एक भारतीय होने पर गर्व की बात या भारत से जुडी कोई भी बात जिसमे अपराध का ज़िक्र ना हो सुनते ही बिना आगे कुछ सुने लोग हँसने लगते है या मुँह मोड़ लेते है। बाकी चीज़ों में तो पता नहीं पर देश को कोसने और हल्ला काटने में हम नंबर एक है। 

- मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohitsharma #mohit_trendster