...is "Celebrating (un)Common Creativity!" Fan fiction, artworks, extreme genres & smashing the formal "Fourth wall"...Join the revolution!!! - Mohit Trendster
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Sunday, February 14, 2021

जैसे वे कभी थे ही नहीं...(लघुकथा)

जॉली जीत और बॉबी जीत, सफल फिल्मकार भाइयों की जोड़ी थी। दोनों कुल 57 फ़िल्में बना चुके थे। जॉली की मृत्यु हुई तो बॉबी का रचनात्मक सफर भी खत्म हो गया। अब सिर्फ़ किसी अवार्ड समारोह, टीवी शो में मेहमान के तौर पर बॉबी साल में 2-4 बार लोगों के सामने आता था।

उनके पुराने नौकर ने ड्राइवर से कहा - "जॉली सर के जाने के बाद बॉबी सर के इंटरव्यू बदल गए हैं।"

ड्राइवर - "मैंने इतना ध्यान नहीं दिया...शायद गम में रहते होंगे, बेचारे।"

नौकर - "नहीं, जॉली सर के ज़िंदा रहते हुए, इन दोनों की फ़िल्मों पर बात करते समय बॉबी सर बारीकी से बताते थे कि जॉली सर ने किसी फ़िल्म में क्या-क्या और कितना अच्छा काम किया था। अब उनके इंटरव्यू में वह बारीकी सिर्फ़ अपने लिए रह गई है। जैसे..."

ड्राइवर - "जैसे?"

नौकर किसी के पास न होने पर भी दबी आवाज़ में बोला - "...जैसे जॉली सर कभी थे ही नहीं।"

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#ज़हन

Image by Daniel Frank

Tuesday, December 3, 2019

बहस-नेटर: हर बहस का अंत (कहानी)


प्रकाश अपनी सोशल मीडिया इमेज को लेकर बड़ा सजग रहता था। उसका मानना था कि जीवन में कोई भूल-चूक हो जाए तो चलता है पर इंटरनेट की आभासी दुनिया के प्रवासियों के सामने ज़रा सी भी कोताही नहीं। उसे कौनसे महान लोग या घटनाएं प्रेरणा देते हैं, कौनसी बातों और रुचियों को वह फॉलो करता है...सोशल मीडिया साइट्स पर सब नपा तुला दर्शाना। आभासी दुनिया के किसी मुद्दे पर अगर किसी दूसरे इंसान का मत उससे अलग हुआ प्रकाश झल्ला जाता था लेकिन अब सोशल मीडिया पर 'बड़प्पन' का नाटक भी करना है। इस कारण वह ऐसे दिखाता जैसे उसे फर्क नहीं पड़ा और वह इन बातों से ऊपर है। सामान्य बहस होने पर पहले वह कुछ ख़बरों, लेख वगैरह के लीक से हटकर और ढाई किलोमीटर लंबे लिंक लेकर आता। उसका मकसद सामने वाले इंसान को समझाने के बजाय तुरंत उसके हथियार डलवाना होता था ताकि उसका फैनबेस उसपर शंका न करे।  
इस बीच प्रकाश के खास गुर्गे उसका गुणगान कर देते, टिप्पणियों पर पसंद और दिल चिपका देते, वहीं प्रकाश से अलग विचार वाले इंसान की टिप्पणियों पर मज़ाक उड़ाती बातें और इमोजी डाल देते। ऐसे में वह मुद्दा पढ़ने वाले लगभग सभी अपने-आप प्रकाश को सही और दूसरे व्यक्ति को बचकाना मान लेते। ऐसी सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लेकर वह न जाने कितने लोगों को ब्रेनवाश करता।

फिर भी बात न बनती तो अंत में वह बह्रमास्त्र छोड़ता - "तुम इस फील्ड की बात कर रहे हो...क्या इस क्षेत्र से जुड़ी तुमने फलाना-फलाना कुछ किताबें पढ़ी भी हैं जो तुम 'मुझसे' (जिसको इतना ज्ञान है) से बहस करने की हिम्मत कर रहे हो?"

मुख्य विषयों और बातों की सबसे चर्चित कुछ दर्जन किताबें वह वाकई घोट कर पी चुका था। इनके अलावा दूसरी कई किताबों का सार पढ़ने में प्रकाश की गहरी रुचि थी। ज़ाहिर है सीखने के लिए कम और धौंस जमाने या आगे किसी बहस-'शो ऑफ' में स्टाइल झाड़ने के लिए ज़्यादा। सतही मेहनत के महल को पक्का बनाए रखने के लिए वह एक काम और करता। प्रकाश किसी से बहस या उसका मज़ाक उड़ाने से पहले जांच लेता था कि कहीं सामने वाला इस क्षेत्र का बड़ा ज्ञानी तो नहीं। अगर हाँ तो घुमा-फिरा कर और ध्यान बंटाकर विषय बदल देता या उस व्यक्ति को दूसरे क्षेत्र की बहस में लाने की कोशिश करता।

एक दिन प्रकाश की बहस इंजीनियरिंग कर रहे लड़के प्रवीण से हुई। बहस एक राज्य की राजनीती पर थी। प्रकाश को अपने जीतों की सूची में एक आसान जीत और दिख रही थी। लड़के ने प्रकाश की बात से अलग पक्ष रख उसकी शान में गुस्ताख़ी कर दी थी...सज़ा तो बनती थी। बात बढ़ती गई और प्रकाश ने अपने सारे पैंतरे आज़माए। कई लोग प्रकाश की तरफदारी करने आए और प्रवीण के कुछ साथी छात्रों ने उसका समर्थन किया। अंत में प्रकाश ने उस राज्य की राजनीती पर 5-7 मशहूर किताबों और कुछ शोध कार्यों का ज़िक्र किया। जवाब में प्रवीण ने अपनी पढ़ी, सुनी-देखी हुई सामग्री की बात कही....लेकिन असंगठित लेख आदि चाहे जितनी संख्या में हों...कहाँ मशहूर पुस्तकों के आगे टिक पाते। (ऐसा प्रकाश और आभासी दुनिया के कई लोगों का मानना था) अति आत्मविश्वास में प्रकाश ने यह भी स्वीकार लिया कि उस राज्य पर उसने इतना ही पढ़ा है और यह उन 'बच्चों' के सामने आई सामग्री से कहीं ज़्यादा महत्व रखता है। 

"अच्छी बात है, सर। हाल ही में मद्रास यूनिवर्सिटी और कोंकण यूनिवर्सिटी के साझा प्रयास से सबके इस्तेमाल के लिए मुफ़्त 'बहसनेटर' नामक सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है। इसमें दो या ज़्यादा पक्षों के तर्क के पीछे जानकारी के सभी स्रोतों की निष्पक्षता और जानकारी के स्तर की तुलना की जाती है।"

प्रकाश ने ऐसी उम्मीद नहीं की थी। उसने जवाब दिया - "ऐसा नहीं हो सकता...किसी भी क्षेत्र में ज्ञान और जानकारी की कोई सीमा नहीं होती। तो फिर कौन ज़्यादा और कौन कम?"

प्रवीण को ऐसे सवाल की ही उम्मीद थी - "सहमत हूँ, वैसे तो किसी भी क्षेत्र में जानकारी की कोई सीमा नहीं पर किसी विषय पर दो पक्षों को तुलनात्मक रूप से कितनी जानकारी पता है और उसमें से कितनी सही, गलत या विवाद करने लायक है का एक अंदाज़ा लगता है, नतीजे में 5-10 प्रतिशत का अंतर हो सकता है पर ज़्यादा नहीं।"

प्रकाश का धैर्य टूट रहा था - "हाँ, तो यह सब मुझे क्यों बता रहे हो?"

प्रवीण - "आपकी बताई किताबों, शोध आदि को एक पक्ष में रखा और हमारे बताए गए लेख, वीडियो आदि सामग्री दूसरे पक्ष में...सॉफ्टवेयर से मिला रिजल्ट यह है कि इस विषय पर आपके पक्ष की तुलना में हमारे पक्ष के पास 79.2% ज़्यादा जानकारी है। हाँ, संभव है कि इस सॉफ्टवेयर में कमियां हों पर यहाँ 20-30 नहीं बल्कि लगभग 80% का अंतर दिख रहा है। आपको बाकी विषयों की जानकारी होगी पर यहाँ तो कम से कम चुप ही रहें। 

एक आखिरी बात और क्योंकि मैंने आपका ऑनलाइन ढोंग काफी समय से देखा है। मुझे पता है इसके बाद आप मेरा और मेरे दोस्तों का मज़ाक उड़ाएंगे, इस सॉफ्टवेयर को हवाई बताएंगे और अपने खलिहर फॉलोअर्स से हमें बुली करवाएंगे। आप यहाँ ही नहीं रुकेंगे कुछ दिन बाद आप इस विषय पर अपनी बात को सही साबित करते हुए लंबी पोस्ट लिखेंगे और उसके फॉलो-अप में बातें लिखते रहेंगे क्योंकि आप तो कभी गलत नहीं हो सकते। आप तो फ़रिश्ते पैदा हुए हो जो आज तक किसी भी विषय में कमतर या गलत साबित नहीं हुआ। किताबें पढ़ना अच्छी बात है पर उसके बाद आप जो ओछी हरकतें करते हैं वह सब गुड़ गोबर कर देती हैं। मेरी बस एक सलाह है, खुद को सही मानें पर फालतू की आत्ममुग्धता से बचें। सामने वाला इंसान कुछ कह रहा है तो पहले उसकी बात को समझें। कोई विपरीत पक्ष आने पर आप उस इंसान की बात को ऐसे नकारते हैं जैसे वह परसों पैदा हुआ हो। जिन वेबसाइट जैसे रेडिट, क्वोरा आदि का हमनें हवाला दिया है वहां अनगिनत मुद्दों पर तो करोड़ो शब्दों की सामग्री पड़ी है जिसमें से सब नहीं तो लाखों शब्द काम के हैं और दर्जनों किताबों के बराबर हैं। किसी ने अगर असंगठित जगहों से थोड़ी-थोड़ी जानकारी ली है तो इसका यह मतलब नहीं कि उसे 'कुछ' पता ही नहीं। हो सकता है उसके थोड़े-थोड़े दशमलव जुड़कर आपके एक जगह के चौके-छक्के से कहीं ज़्यादा हो जाएं। मैं देखना चाहूंगा कि बहसनेटर पर आप और सोशल मीडिया पर ज्ञान की दुकान खोले बैठे कई लोग बाकी विषयों में कितने पानी में हैं। आपकी प्रोफाइल मैंने हैक कर ली है...घबराएं नहीं कोई गलत इस्तेमाल नहीं करूंगा पर पिछले कुछ महीनों के आपके स्टंट बहसनेटर पर तोलकर आपकी सभी सोशल मीडिया प्रोफाइलों पर आपके नाम से ही डाल रहा हूँ। आगे दोबारा नौटंकी की कोशिश की तो फिर से प्रोफाइल हैक करके ऐसा करूंगा। पुलिस को ज़रूर बताएं...मुझे आपके इनबॉक्स में मिली सामग्री की कसम आपसे कम ही सज़ा होगी। इस बहस से जुड़े और बाकी 'काम के' सारे स्क्रीनशॉट ले लिए हैं। धन्यवाद!"

प्रकाश का उसी के खेल में शिकार हो चुका था। उसका आभासी स्टारडम और दिमाग अपनी जगह पर आ गए।

समाप्त!

#ज़हन

Monday, July 9, 2018

कुबोध (कहानी) #ज़हन


इंटरनेट क्रांति के बाद समान विचार, व्यवसाय और रुचियों वाले लोग काफी करीब आ गये थे। जहाँ किसी और दौर में अनमोल जैसे नये लेखक के लिए स्थापित साहित्यकारों से बात करना सपना होता वहीं अब सोशल मीडिया पर रोज़ बड़े नामों से बातचीत हो जाया करती थी। कुछ बातें लंबी खींच जाती तो कुछ थोड़े शब्दों में निपट जाती। कुछ बड़े नामों को सोशल मीडिया की लत लग गयी थी...पर समस्या यह थी कि वे बड़े नाम थे। अब पूरा दिन ऑनलाइन भी रहना था और आम जनता के लिए खुद को व्यस्त भी दिखाना था। उनकी प्रोफाइल व अक्सर साझा की गयी जानकारी बड़ी अच्छी लगती। ऐसा लगता जैसे हर बात, हर पोस्ट-अपडेट में बड़ा समय दिया गया है। ऐसे ही एक 'कुछ बड़े' सज्जन सुबोध दिखाते कि उन्हें अपनी ऑनलाइन छवि का कोई फर्क नहीं पड़ता पर नामचीन लोगों-कलाकारों के साथ उनकी तस्वीरें, उनको टैग करती लंबी पोस्ट्स देखकर लगता कि उनके सबसे बड़े राज़दार तो सुबोध साहब हैं। मानो अपने सोशल मीडिया के लिए उन्होंने अलग से पी.आर. (जनसंपर्क) अधिकारी रखा हुआ हो। सुबोध की ऑनलाइन जगमगाहट से आकर्षित अनमोल अक्सर उनकी तस्वीरों, बातों और पोस्ट्स पर अपने विचार रखता पर उसे कोई जवाब नहीं मिलता। जबकि सुबोध की बातों पर इतना मज़मा नहीं होता था कि वे कभी अनमोल से बात तक ना कर पायें। उनसे कहीं बड़े और व्यस्त लोग अनमोल की बातों से प्रभावित होकर उससे चर्चा करते रहते थे।

"व्यस्त लेखकों के पास कहाँ समय होता होगा कि सबको जवाब दें।"

ऐसा सोचकर अनमोल बात भूल गया। कई वर्षों तक गाहे बगाहे सुबोध की ऑनलाइन गतिविधि देखने के बाद अनमोल ने गौर किया कि सुबोध अपने साथ काम करने वालों और अपने स्तर से ऊपर के कलाकारों पर ही ध्यान देते हैं....या अगर कोई किसी कारणवश देश या विदेश की ख़बरों में आया हो। अनमोल जैसे बहुत से लोग सुबोध को दिखते नहीं थे। 

अनमोल अपनी रिटेल नौकरी करते हुए लिखता रहा और उसके एकसाथ 3 उपन्यास प्रकाशित हुए। अनमोल जल्द ही बाजार में 'बड़ा नाम' बन गया और उसकी किताबों के अधिकार एक नामी फिल्म निर्माता ने खरीद लिए। खबर आते ही सुबोध का रडार गड़गड़ाया और उन्होंने अनमोल को टैग करते हुए उसकी मेहनत, लगन, फलाना-ढिमका पर ढाई किलोमीटर की पोस्ट कर दी। वह जनता को दिखा रहे थे कि "देखो, मैं एक और बड़े नाम -अनमोल को जानता हूँ।" अनमोल ने सुबोध की पोस्ट की बातें पढ़ी और "भक!" बोलकर...उन्हें ब्लॉक कर मन की शान्ति पायी। 

समाप्त!
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Monday, June 25, 2018

रिक्शेवाली चाची (कहानी)


"डॉक्टर ने तेरी चाची के लिए क्या बताया है?"

मनोरमा ने अपनी देवरानी सुभद्रा के बारे में अपनी 17 वर्षीय बेटी दिव्या से पूछा। 

"मेजर डिप्रेशन बताया है।"

मनोरमा ने तंज कसा, "हाँ, उस झल्ली सी को ही हो सकता है ऐसा कुछ!"

दिव्या अपनी चाची के लिए ऐसे तानों, बातों से उलझन में पड़ जाती थी। 

हर शाम छत पर टहलना दिव्या को पसंद था। पास में पार्क था पर शायद उसकी उम्र अब जा चुकी थी। छत पर उसकी फेवरेट निम्मी दीदी मिल जाती थी। वो दिव्या के संयुक्त परिवार से सटे पी.जी. में  रहकर स्थानीय कॉलेज में इतिहास की प्राध्यापक थी। अक्सर दिनचर्या से बोर होती निम्मी भी दिव्या के परिवार की बातों में रूचि लेती थी। घर के लगभग 2 दर्जन सदस्यों से ढंग से मिले बिना भी निम्मी को उनकीं कई आदतें, किस्से याद हो गये थे। सुभद्रा चाची के गंभीर अवसाद में आने की ख़बर से आज वो चर्चा का केंद्र बन गयीं। 

दिव्या - "बड़ा बुरा लगता है चाची जी के लिए। बच्चा-बड़ा हर कोई उनसे ऐसे बर्ताव करता है..."

निम्मी ने गहरी सांस ली, "औरत की यही कहानी है।"

दिव्या - "अरे नहीं दीदी, यहाँ वो वाली बात नहीं है। सुभद्रा चाची से छोटी 2 चाचियाँ और हैं। मजाल है जो कोई उनको ऐसे बुला दे या उनके पति, दादा-दादी ज़रा ऊँची आवाज़ में हड़क दें। तुरंत कड़क आवाज़ में ऐसा जवाब आता है कि सुनाने वाले की बोलती बंद हो जाती है। किसी ताने या बहस में उनके सख्त हाव भाव....यूँ कूद के पड़ती हैं जैसे शहर की रामलीला में वीर हनुमान असुर वध वाली मुद्रा बनाते हैं। इस कारण उनकी बड़ी ग़लती पर ही उन्हें सुनाया जाता है बाकी बातों में पास मिल जाता है। वहीं सुभद्रा चाची को छोटी बातों तक में कोई भी सुनाकर चला जाता है। चाचा और दादी-दादा हाथ भी उठा लेते हैं। अब ऐसे में बड़ा डिप्रेशन कैसे ना हो?"

निम्मी ने हामी में सिर हिलाते कहा - "हम्म...यानी तुम्हारी सुभद्रा चाची घर की रिक्शावाली हैं।"

दिव्या चौंकी - "हैं? रिक्शेवाली चाची? नहीं समझ आया, दीदी।"

निम्मी - "अरे, समझाती हूँ बाबा! देखो, छोटी बात पर कार या बाइक से उतर कर रिक्शेवालों को थप्पड़ मारते, उन्हें पीटते लोग आम दृश्य है। ऐसे ही मज़दूर, अन्य छोटे कामगारों को पीटना आसान है और लोग अक्सर पीटते भी हैं। वहीं अगर कोई बड़ी बात ना हो तो बाकी लोगो को पीटना जैसे कोई कार में बैठा व्यापारी या बाइक चला रहा मध्यमवर्गीय इंजीनियर मुश्किल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि 'बड़े लोगों' की एक सीमा बन जाती है उनके हाव भाव, पहनावे, बातों से...यह सुरक्षा कवच 'छोटे लोगों' के पास नहीं होता। वो तो बेचारे सबके पंचिंग बैग होते हैं। अन्य लोगो के अहंकार को शांत करने वाला एक स्थाई पॉइंट। ऐसा ही कुछ सीधे लोगों के साथ उनके घर और बाहर होता है। कई बार तो सही होने के बाद भी ऐसे लोग बहस हार जाते हैं।"

दिव्या - "ओह! यानी अपनी बॉडी लैंग्वेज, भोली बातों से चाची ने बाकी सदस्यों को अपनी बेइज़्ज़ती करने और हाथ उठाने की छूट दे दी जो बाकी महिलाओं या किसी छोटे-बड़े सदस्य ने नहीं दी। अगर चाची भी औरों की तरह कुछ गुस्सा दिखातीं, अपने से छोटों को लताड़ दिया करती और खुद पर आने पे पूरी शिद्दत से बहस करती तो उन्हें इज़्ज़त मिलती। फ़िर वो डिप्रेस भी ना होती। दीदी, क्या चाची जैसी नेचर होना अभिशाप है?"

निम्मी ने थोड़ा रूककर सिर ना में हिलाया पर उसका मन हाँ कह रहा था। 

समाप्त!
मोहित शर्मा ज़हन
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Thursday, April 5, 2018

झूठी भावना पर सच्चा आशीर्वाद (कहानी) #ज़हन

Artwork #WIP by Esmeralda Platania‎

सोशल मीडिया स्टार रूपल के पास कोई ख़ास हुनर नहीं था। अपनी तस्वीरें, निजी ज़िंदगी इंटरनेट के माध्यम से दुनिया को परोसने के बदले में कुछ नाम और पैसा मिल जाया करता था। वैसे उसके कई हज़ार फॉलोवर्स थे पर यहाँ "कुछ" का मतलब उसके जैसी बिना हुनर वाली बड़ी हस्तियों के मुक़ाबले काफी कम। फिर भी स्थानीय स्तर पर उसका अच्छा काम चल जाता था। भावनात्मक मुद्दों पर इंटरनेट से काट-छांट कर बनी उसकी बातें, कई सामाजिक कैंपेन की आड़ लेकर अपने पब्लिसिटी कैंपेन चलाना आदि रूपल की खूबी थी। रूपल की माँ श्रीमती सुनैना लिवर कैंसर से पीड़ित थी। पिछले कई हफ़्तों से वह इस लिवर कैंसर की पोस्ट्स से लोगो की सहानुभूति का लिवरेज ले रही थी। ऐसी भावनात्मक बातों पर आम बातों, फोटोज़ से कहीं ज़्यादा प्रतिक्रिया आती थी। इस वजह से आभासी दुनिया में रूपल के "प्रशंसकों" की संख्या तेज़ी से बढ़ रही थी। रूपल को जब पता चला कि उसकी माँ की बीमारी गंभीर हो चली है और वें अब कुछ ही दिनों की मेहमान हैं तो वह चिंता में पड़ गयी। इधर सुनैना अपनी बच्ची को दिलासा दे रहीं थी कि उनके बिना भी इतना कुछ है दुनिया में वह किसी बात की चिंता ना करे। यहाँ रूपल की चिंता सुनैना की सोच से कुछ अलग थी। 

दो दिन बाद ही सुनैना ने नींद में दुनिया छोड़ दी पर शायद उनकी आत्मा में दुनियादारी का मोह बचा था। इस कारण अपने परिजनों को देखने और उनके मन में झाँकने को रुक गयीं। सब जगह से अच्छी-बुरी यादें, अपनों के मन की बातें टटोल कर आखिर में सुनैना की आत्मा रूपल के पास पहुँची। 

"रो नहीं रही है? ज़रूर सदमा लग गया है बेचारी को! हे भगवान! मेरी लाली ने गुम चोट की तरह अपने ग़म को मन में दबा लिया। ज़रा मन में तो झाँकू इसके..."

रूपल के मन में दंगे चल रहे थे....

"क्या यार! थोड़े दिन बाद नहीं जा सकती थी मम्मी? इतना मटेरियल जमा कर रखा था मैंने....थोड़ा-थोड़ा करके ऑनलाइन डालती। अब खुद उनकी डेथ की अपडेट नहीं कर सकती...सब कहेंगे मातम की जगह नौटंकी कर रही हूँ। काश रश्मि, प्रियंका लोग आ जायें तो वो तो अपनी फोटोज़, अपडेट्स में टैग-मैंशन कर ही देंगी...उनकी फॉलोइंग भी अच्छी है।"

बेटी की नादानी पर सुनैना मुस्कुरा उठी। किसी माँ को अपने बच्चों पर गुस्सा आता ही कहाँ है? जाते-जाते माँ ने रूपल की इच्छा पूरी कर दी...समूह में रूपल की माँ की मौत वाली खबर फैलने से 2-4 नहीं बल्कि दर्जनों रूपल जैसी सोशल मीडिया हस्तियां 'सांत्वना' की कैंडी लेकर उसके घर पहुँची। उस दिन सौइयों फोटो में दिख रही रूपल और उसके दुख की सुनामी में इंटरनेट बह गया। एक घटना से रूपल के इंटरनेट वाले आभासी जानकारों की गिनती लाखों-करोड़ों में पहुँच गयी...माँ का आशीर्वाद जो साथ था।

समाप्त!
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Monday, July 10, 2017

विकिपीडिया और बिकाऊ मीडिया के पार की दुनिया (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


नाखून चबाती मशहूर अभिनेत्री मेघना कमल कमरे में इधर-उधर टहल रही थी। फ़ोन पर अपने मैनेजर पर चिल्लाती हुई वो टीवी न्यूज़ चैनल्स बदल-बदल कर खुद पर आ रही खबरों को देखने लगी। पिछली रात पास के अपार्टमेंट में से किसी ने उसकी एक वीडियो बनाई थी जिसमें वो एक पिल्ले को किक मारती हुई अपने बंगले से बाहर कर रही थी। शुरुआत में हरकत कर रहा पिल्ले का शरीर मेघना की 5-7 लातें खाने के बाद निर्जीव हो गया। विडिओ पर ना सिर्फ जानवर के अधिकारों वाली संस्थाओं की तीखी प्रतिक्रिया आ रही थी बल्कि देश-विदेश की जनता मेघना की इस हरकत से गुस्से में थी। बड़े निर्माताओं, निर्देशकों पर मेघना को अपनी फिल्मों से बाहर करने, कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का दबाव बढ़ रहा था। कुछ ही देर में मेघना के घर के बाहर मीडिया का तांता लग गया। 

मेघना ने अपने पिता और बीते ज़माने के सुपरस्टार अभिनेता हरीश कमल को फ़ोन किया। 
"पापा...आई ऍम सॉरी, मेरी वजह से आपका नाम भी उछल रहा है। नशे में करियर बर्बाद कर लिया! सब ख़त्म हो गया!"

हरीश शांत स्वर में मेघना को समझाने लगे - "चिंता मत कर मेघू बेटे! ऐसे करियर बर्बाद होने लगते तो मैं कबका एक्टिंग छोड़ चुका होता। तेरा वीडियो मैंने देखा है। एक पार्सल भेजा है तुझे, बाकी फ़ोन पर नहीं समझाऊंगा। अपने मैनेजर और टीम को बुला ले उन्हें समझा दिया है, उनकी बात ध्यान से सुनकर वैसा ही करना... "

उस शाम मेघना ने अपने घर पर ही प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी। कुछ सवालों के जवाब देने के बाद वह अपनी रिहर्स की हुई लाइनों पर आ गई। 

"मैं जानती थी कि भारत के ज़्यादातर लोगो की जो मानसिकता हैं उनसे मुझे ऐसी ही प्रतिक्रिया मिलेगी। कल रात मैंने जानबूझ कर एक रोबोटिक खिलौने पप्पी को मारा, जो दूर से एकदम असली लगता है। यह देखिये इस पार्सल में उस से मिलता-जुलता खिलौना है। मेरा उद्देश्य लोगो में निरीह जानवरों के अधिकार, उनपर होने वाली हिंसा, मानव आबादी से कम होते जंगलों के लिए जागरूकता बढ़ाना था और देश क्या पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए इस स्टंट से बेहतर मुझे कोई उपाय नहीं लगा। इस बीच मुझे चुभने वाली एक सच्चाई का सामना करना पड़ा, एक लड़की के लिए चाहे वो एक सफल अभिनेत्री ही सही इस देश के लोग अपनी छोटी सोच दिखा ही देते हैं। भारत के लोगो और कई सेलेब्रिटीज़ की बातों ने मुझे आहत किया है।"

इतना कहते ही मेघना प्रेस वार्ता में रोने लगी। कैमरों की चमक से आँगन जगमगा उठा। हर ओर मेघना की तारीफ़ और चर्चे थे। इस घटना के बाद मेघना को कुछ अवार्ड मिले, तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने मेघना को अपना गुडविल एम्बेस्डर बनाया और वो बड़े बजट निर्माताओं की पहली पसंद बन गयी। एक दिन हरीश कमल ने मेघना को हँसते हुए बताया कि मेघना का किया कांड तो कुछ भी नहीं उन्होंने अपने समय में कितने कानून तोड़े, लोगो को गायब तक करवाया पर आज भी देश उन्हें पूजता है। 

समाप्त!
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Image - Watercolor Painting by artist Shilpi Mathur
#mohitness #mohit_trendster

Tuesday, April 18, 2017

मरणोपरांत आशीर्वाद (कहानी) #ज़हन


पत्नी के देहांत के बाद रविन्दु सामंत गहरे अवसाद में चले गए थे। उनकी दिनचर्या अपने कमरे तक सीमित हो गयी थी। वहीं उनके तीन बच्चो की अब और इंतज़ार करने की इच्छा नहीं थी। एक शांत दिन उनके 3 बच्चो ने उन्हें बेहोशी की दवा सुंघा कर बेहोश किया और फिर पंखे से टांग कर उन्हें मार दिया गया, कुछ इस तरह कि पत्नी की मौत के शोक में उनकी मौत एक आत्महत्या लगे। उनकी लिखाई से मिलता-जुलता नोट रखने जा रहा उनका छोटा बेटा राजदीप कुछ देखकर ठिठक गया। पुलिस के सामने दी जाने वाली अपनी कहानी का रिहर्सल कर रहे उसके बड़े भाई-बहन ने कारण पूछा तो जवाब आया - "यहाँ तो पहले से एक नोट पड़ा है!"

"नोट है या ऐसे ही कोई रसीद-वसीद?"

राजदीप - "नोट ही है, लिखा है वो हम पर बोझ नहीं बनना चाहते थे और संपत्ति हम तीनो में बाँटकर आज रात पापा हमेशा के लिए ऋषिकेश के एक आश्रम जाने वाले थे।"

3-4 क्षण अवाक रहने के बाद तीनो बिना नज़रे मिलाये फिर अपने काम में लग गए। कुछ समय बाद पुलिस औपचारिकता निभा कर चली गई। एक हफ्ता बीतने के बाद रविन्दु सामंत के इंश्योरेंस एजेंट की शिकायत पर पुलिस का जांच दल दोबारा उनके घर आया। बीमा एजेंट के अनुसार रविन्दु सामंत के सुसाइड नोट की लिखावट उनकी राइटिंग से पूरी तरह नहीं मिलती थी। पुलिस टीम द्वारा जांच के लिए कुछ सामग्री जप्त की गयी और थोड़े दिन के बाद नतीजे की पुष्टि की बात हुई। तीनों भाई-बहन के चेहरे सफ़ेद पड़ गए और उन्हें जेल दिखने लगा। उन्हें यकीन था कि पुलिस के विशेषज्ञ लिखावट में अंतर पकड़ लेंगे। 5 दिनों बाद उन्हें सभी पत्र और जांच के लिए जप्त की गयी सामग्री वापस कर दी गयी। राजदीप अचंभित था कि आखिर कैसे दोनों लिखावट मिल गयीं और वो लोग बच गए? वह सारे पत्र देखने लगा और एक कागज़ देखकर उसे सांप सूँघ गया।  भाई ने कहा "चलो जान बची, पर तू सिर पकडे क्यों कांप रहा है? ठण्ड रख! अब कोई नहीं आ रहा हमें पकड़ने।"

राजदीप - "सुसाइड नोट की राइटिंग तो मैच हो गयी पापा की लिखावट से पर यह सुसाइड नोट वो नहीं जो मैंने लिखा था... "

समाप्त!
#mohitness #mohit_trendster #मोहित_शर्मा_ज़हन

Wednesday, March 29, 2017

जीत का समझौता (कहानी)


इंटरकॉन्टिनेंटल कप के पहले दौर में हारकर बाहर होने के बाद पापुआ न्यू गिनी क्रिकेट खेमे के एक कोने में 2 खिलाडियों के बीच गंभीर वार्ता चल रही थी। 

"आप जब खुद यह टीम नहीं छोड़ रहे हैं तो मुझसे ऐसा करने के लिए क्यों कह रहे हैं?" परेशान होकर मेज़ के कोने को मसलने की कोशिश करते क्रिकेटर पॉल ने अपने गुरु जैसे सीनियर जिम्मी से पूछा। 

जिम्मी सोच रहा था कि किस तरह ऐसे वाक्य गढ़े जो पॉल की चिंता को कम करें। फिर अपने निर्णय का ध्यान करते हुए वह बोला - "मुझे पापुआ न्यू गिनी में क्रिकेट का भविष्य नहीं दिखता। बाहर निजी क्रिकेट लीग्स में तुम जैसे खिलाडियों को अच्छे अवसर मिलते हैं।"

पॉल - "आप मुझसे बेहतर क्रिकेट खेलते हैं। तो अकेले मेरे जाने का क्या मतलब?"

जिम्मी - "बात को समझो पॉल! तुम अभी से बाहर जाकर संघर्ष करोगे तब जाकर कुछ सालों बाद उसका फल मिलेगा। यहाँ से निकलने में जितनी देर करोगे उतना ही बाहर की लीग्स में सफल होने की सम्भावना कम हो जायेगी। दो साल बाद वर्ल्ड कप क्वालिफाइंग टूर्नामेंट है, जिसमे पापुआ न्यू गिनी के जीतने की और अपना एक दिवसीय दर्जा बचाने की ना के बराबर उम्मीद है। मैंने किशोरावस्था से 2 दशक से अधिक इस देश के क्रिकेट में लगाएं हैं। ना के बराबर ही सही पर दशमलव में कुछ उम्मीद तो है? बस उसी के लिए रुका हूँ...पर तुम्हे यह सलाह नहीं दूंगा।"

पॉल - "आप मेरे आदर्श रहे हैं..."

जिम्मी - "मुझे अपना आदर्श क्रिकेट मैदान के अंदर तक मानो, उसके बाहर अपनी स्थिति अनुसार बातों को समझो और करो। तुम देश के बाहर जाकर किसी विदेशी टीम में नाम कमाओगे तो भी इसी देश के वासी कहलाओगे, इस धरती का नाम रोशन करोगे, क्रिकेट के टैलेंट स्काउट्स तुम्हारे नाम का हवाला देकर यहाँ नए खिलाड़ी खोजने आयेंगे। हारे हुए संघर्ष से बेहतर जीता हुआ समझौता है।"

पॉल के झुके सिर को हामी में हिलता देख जिम्मी ने खुद को दिलासा दिया कि इस डूबते जहाज़ से उसने एक यात्री को बचा ही लिया। 

समाप्त!

#ज़हन

Saturday, February 18, 2017

राजा की मिसमिसाहट (हास्य कहानी)

Digital Artwork - Andrei Militaru‎

बहुत पुरानी बात है...ऐसा लेखक को लगता है पर आप अपने हिसाब से टाइमलाइन सेट कर लो, कोई फॉर्मेलिटी वाली बात नहीं है। मैटरनल काका नाम का एक राजा था, जिसके द्वारा स्थापित पीपणीगढ़ नामक एक विशाल राज्य था, मतलब भोम्पूगढ़ जितना विशाल नहीं पर फिर भी विशाल मेगा मार्ट से बड़ा तो कहूंगा मैं! तो राजा मैटरनल काका को अपनी सेना और आम जनता को परेशान कर के बड़ा सुख मिलता था। आखिर अपने से कमज़ोर को सताने में किसे मज़ा नहीं आता? पता नहीं किसी वैद्य ने उन्हें मानसिक थेरेपी बताई थी या यह चीज़ मैटरनल ने स्वयं सोची थी। 

एक दिन मैटरनल काका रोज़ की खुराफात करने निकले थे और उन्हें टीले के पीछे एक सिर पर बड़े सलीके से काढ़े गए बाल दिखे। अचानक उनके मन में मिसमिसी छूटने लगी और उनकी उँगलियों में थिरकन मचने लगी। वो तेज़ी से उन बालो के स्वामी के पास पीछे से आये और ऐसे कोण से लात जमाई की वह व्यक्ति कलामंडी खाता हुआ नीचे जाकर गिरा। उसका शरीर मिट्टी में लोटमपोट हो गया पर उसके बाल अभी तक व्यवस्थित थे। यह बात पूर्णतावादी मैटरनल को कहाँ रास आने वाली थी? राजा ने उस भ्रमित व्यक्ति का खोपड़ा पकड़ के मिट्टी में लोटा दिया। कुछ इस तरह कि बेचारे व्यक्ति का एक-एक बाल भूरा हो जाए। 

अपनी विजय का आनंद उठाते मैटरनल काका को तब झटका लगा जब वह व्यक्ति एक सिद्ध मुनि निकला। धूलधुसरित मुनि पहले थोड़ी देर बच्चो की तरह रोये, फिर शांत होने के बाद जब वो राजा को श्राप देने को हुए तो मैटरनल अपने सैनिको के साथ वहाँ से भाग गया। उसे लगता था कि श्राप सिर्फ आमने-सामने दिया जा सकता है, ऐसा ही उसने कथाओं में सुना था। मुनि के नाक, कान, मुँह में मिट्टी भर गयी थी इसलिए वो आराम से श्राप सोच नहीं पाए और गुस्से में उन्होंने राजा के राज्य के कई गाँवो  को अजीब सा श्राप दे डाला। उस दिन के बाद से किसी गाँव में सिर्फ लड़के जन्म लेने लगे और किसी गाँव में सिर्फ लड़कियां। शुरुआत के कुछ महीने तो सब सामान्य रहा पर धीरे-धीरे लोगो को आभास हुआ कि किसी अपशगुन या श्राप के कारण राज्य के गाँवों में यह अजीब असंतुलन बढ़ रहा है। राजा के साथ रहने वाले मंत्री ने सभी घटनाओ का अवलोकन किया और पाया की मैटरनल द्वारा किसी सिद्ध व्यक्ति को परेशान करने के कारण ऐसा हो रहा है। राजा को सलाह दी गयी कि अबतक जिन सिद्ध लोगो, मुनियों को उसने परेशान किया है सबसे क्षमा मांग ले। वहीं मैटरनल काका अपनी गलती मानने को तैयार नहीं था, उसने सभी गर्भवती महिलाओं, जवान युवक-युवतियों को उनके गाँव के अनुसार इस तरह चिन्हित कर बसाया कि आगे पैदा होने वाले शिशुओं में गाँव के हिसाब से निर्धारित हो रहे लिंग की बाधा ना रहे। राजा ने ऐसी अकलमंदी जीवन में पहली बार दिखाई थी और परिणाम जानने के लिए वह उत्सुक था...कुछ महीनो बाद हद हो गयी! अब राज्य में पैदा होने वाले सभी बच्चे अलैंगिक या किन्नर के रूप में पैदा होने लगे, इसलिए कहते हैं ज़्यादा ओवरस्मार्टनेस कई बार गोबरस्मार्टनेस में बदल जाती है। 

राजा हार कर सभी मुनियों के पास गया और अपनी भूली-बिसरी भूलों की क्षमा-याचना की, तब एक गंजे ऋषि ने उसे बताया कि किस तरह मैटरनल काका ने उसे पूजा करते हुए टीले से गिराया और उसे धूल-मिट्टी में लोटा दिया। राजा के मौका-ए-वारदात से भागने के बाद उसने झुंझलाहट में मैटरनल के राज्य को ऐसा श्राप दिया। उस दिन के बाद से मुनि प्रतिशोध में जलता रहा और उसने अपने सुन्दर, घने बाल राजा के पश्चयताप करने तक के लिए कटवा लिए (या शायद कुछ इतिहासकारो की माने तो उस घटना के बाद उन्हें काफी डेंड्रफ हो गई थी इसलिए बाल कटवा लिए)। अपनी बात वापस लेने और बाल दोबारा उगाने की उसकी एक ही शर्त थी...

...मुनि ने मैटरनल को पूरी शिद्दत से कीचड़, मिट्टी लोटा-लोटा के परमसुख की प्राप्ति की और अपना श्राप वापस लिया। राज्य के सभी नवजात सामान्य हुए और राजा को अपनी गलती का सबक मिला... मतलब अब वो किसी अनजान व्यक्ति का पूरा बैकग्राउंड देखकर उसे छेड़ता है। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Sunday, February 5, 2017

अमीर की हाय (कहानी) #ट्रेंडस्टर

दूसरे हृदयघात के बाद आराम से उठने के बाद उद्योगपति तुषार नाथ का व्यक्तित्व बदल गया था। पहले व्यापार पर केंद्रित उनका नजरिया अब किसी छोटे बच्चे जैसा हो गया था। छोटी-छोटी बातों पर चिढ जाना, उम्र के हिसाब से गलत खान-पान और व्यापार में हो रहे घाटे पर ध्यान ना देना अब उनके लिए आम हो गया था। परिवार और परिचितों को साफ़ लग रहा था कि उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। 

एक दिन उन्होंने अपनी दुकानों के सभी कर्मचारियों और अपने परिचित जनो को एक मंदिर के पास बुलाया। सभी चकित और कारण जानने के लिए आतुर थे कि ऐसी क्या आपात स्थिति आन पड़ी जो तुषार नाथ जी ने दो-ढाई सौ लोगो को अपने घर से अलग एक जगह बुलाया। तुषार जी की हरकतें और चेहरे के हाव-भाव देख कर लग रहा था कि कुछ गड़बड़ है। वो एक मंच पर चढ़े और माइक्रोफोन से सभी एकत्रित लोगो को संबोधित करने लगे। 

"हेल्लो फ्रेंड्स! आज मैं आप सबको भोला भिखारी से मिलवाना चाहता हूँ।" इतना कहकर उन्होंने मंदिर की सीढ़ियों पर अंगड़ाई ले रहे एक भिखारी की तरफ इशारा किया। 

एक कर्मचारी अपने मित्र से बोला - "मैं पहले ही कहता था कि हार्ट अटैक के बाद से बुडढा सटक गया है! लगता है अपनी संपत्ति इस भिखारी को देने वाला है।"

कुछ ऑफ टॉपिक बातें करने के बाद तुषार नाथ को अपना असल मुद्दा याद आया - "....हाँ, तो मैं कह रहा था कि आप सभी लोग भोला को हाय दो। मतलब हॉय-हेल्लो वाला नहीं जो दिल से किसी के लिए हाय निकलती है वो वाली हाय!"

ये क्या था? मतलब ये हुआ क्या? कुछ अचंभित, कुछ अपनी हँसी छुपाते पर सबके मन में यही बात थी। 

तुषार नाथ - "मंदिर से लौटते हुए गलती से मेरा पैर इसके पैसे वाले कटोरे पर लग गया और इसके सिक्के सीढ़ियों पर नीचे बिखर गए। जब गुस्से में यह मेरी ओर मुझे मारने को बढ़ा तो मेरे गार्ड ने इसे 1 थप्पड़ लगा दिया। फिर इसने बोला कि एक गरीब की बड़ी हाय लगेगी मुझे....पर इस नादान को पता नहीं कि मैं कौन हूँ! इसलिए आप सब अमीरो, मिडिल क्लास लोगो को यहाँ भोला को लगभग 200 सामूहिक हाय लगाने के लिए बुलाया है।"

किसी त्यौहार पर मंदिर के पास से जयकारों की तेज़ ध्वनि आती थी। आज एक सामान्य दिन ऐसी ही एक आवाज़ गूँजी....

"....हाय!"

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन
Artwork: Katan Walker

Sunday, September 4, 2016

Kaddu le lo (Audio Story) #mohitness

Kaddu le lo (Secular Audio Story), कद्दू ले लो (धर्मनिरपेक्ष कहानी) Social Message


*) - Youtube: http://goo.gl/AeI1Bv
*) - SoundCloud: http://goo.gl/klCe7H 
*) - Vimeo: http://goo.gl/uaQ4Ih

Duration - 5 Minutes 28 Seconds

#message #social #mohitness #mohit_trendster #freelancetalents #freelance_talents #religion #fiction #debate #dark #humor #satire #ज़हन #ज़हनजोरी

Tuesday, July 19, 2016

स्वर्ण बड़ा या पीतल? (कहानी)

शीतकालीन ओलम्पिक खेलों की स्पीड स्केटिंग प्रतिस्पर्धा में उदयभान भारत के लिए पदक (कांस्य पदक) जीतने वाले पहले व्यक्ति बने। यह पदक इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योकि भारत में शीतकालीन खेलों के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। मौसम के साथ देने पर हिमांचल, कश्मीर जैसे राज्यों में कुछ लोग शौकिया इन खेलों को खेल लेते थे। भारत लौटने पर उदयभान का राजा की तरह स्वागत हुआ। राज्य और केंद्र सरकार की तरफ से उन्हें 35 लाख रुपये का इनाम मिला। साथ ही स्थानीय समितियों द्वारा छोटे-बड़े पुरस्कार मिले। जीत से उत्साहित मीडिया और सरकार का ध्यान इन खेलों की तरफ गया और चुने गए राज्यों में कैंप, इंडोर स्टेडियम आदि की व्यवस्था की गयी। खेल मंत्रालय में शीतकालीन खेलों के लिए अलग समिति बनी। इस मेहनत और प्रोत्साहन का परिणाम अगले शीतकालीन ओलम्पिक खेलों में देखने को मिला जब उदयभान समेत भारत के 11 खिलाडियों ने अपने नाम पदक किये। उदयभान ने अपना प्रदर्शन पहले से बेहतर करते हुए स्वर्ण पदक जीता। 

जब मीडियाकर्मी, उदयभान के घर पहुंचने पर उनका और परिवार का साक्षात्कार लेने आये तो उदयभान के माता-पिता कुछ खुश नहीं दिखे। कारण -

"रे लाला ने इतनी मेहनत की! पहले से जादा लगा रहा...गोल्ड जित्ता, फेर भी पहले से चौथाई पैसा न दिया सरकारों ने। यो के बात हुई? इस सोने से बढ़िया तो वो पीतल वाला मैडल था।"

उदयभान के साथ सभी मीडियाकर्मियों में मुस्कराहट फ़ैल गयी। पहले स्पॉटलाइट में उदयभान पहला और अकेला था...अब उसका पहला होना रिकॉर्ड बुक में रह गया और उसके साथ 10 खिलाडी और खड़े थे। जिस वजह से उसे पहले के कांस्य जीतने पर जितने अवार्ड और पैसे मिले थे, उतने इस बार स्वर्ण जीतने पर नहीं मिले। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

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Read टप...टप...टप...(हॉरर) Story - Mohit Trendster Archives

Saturday, July 9, 2016

एकल-युगल-पागल (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन

"जी सर! मैंने चक्कू घोंप दिया ससुरे की टांगों में अब आपका जीतना पक्का।"

टेनिस एकल प्रतिस्पर्धा में स्टीव जो एक जाना-पहचाना नाम था, जिसके नाम कुछ टाइटल थे। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के दौरान वह सफलता से दूर ही रहा। फिटनेस के हिसाब से उसमे 2-3 सीजन का खेल बचा था और इस बीच वह अधिक से अधिक टाइटल अर्जित करना चाहता था। सबसे पहले वह तुलनात्मक रूप से आसान और नीची रैंक के खिलाड़ियों से भरे टूर्नामेंट चुनता था ताकि उसके जीतने की सम्भावना बढ़े, किस्मत से वह एक नामी टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में पहुंचा जहां उसका प्रतिद्वंदी दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी था। इस खिलाड़ी से पार पाना स्टीव के बस की बात नहीं थी। स्टीव ने उस खिलाड़ी को घायल करवाने के लिए अपने एक जुनूनी देशवासी को ब्रेनवाश किया कि देश के नाम और सम्मान के लिए उसे वर्ल्ड नंबर वन को खिलाड़ी घायल करना है। पूरी रात पार्टी कर अगले दिन वॉकओवर मिलना सुनिश्चित मान स्टीव कोर्ट पर उतरा जहाँ फिट्टम-फिट दुनिया का नंबर एक खिलाड़ी उसका इंतज़ार कर रहा था। उसके पैरो तले ज़मीन और खोपड़े छज्जे आसमान खिसक गए। काश कल न्यूज़ में कन्फर्म कर लेता तो दारु तो ना पीता, अब तो 6-0, 6-0 पक्का! पता नहीं किस बेचारे के पैरों में चक्कू घोंप दिया गधे ने? 

बगल के कोर्ट में इस प्रतियोगिता का युगल (डबल्स) टेनिस खेल रही एक टीम को वॉकओवर मिला क्योंकि उनकी विरोधी टीम के एक खिलाड़ी पर पिछली रात टांगलेवा हमला हुआ था, यह खिलाड़ी विश्व डबल्स टेनिस में नंबर एक रैंक पर था। 

इस कहानी से शिक्षा मिलती है जुनूनी के साथ-साथ थोड़ी अक्ल वाले बंदे-बंदियों से ऐसे काम करवाने चाहिए।

समाप्त!

Wednesday, July 6, 2016

जीवन दण्ड (कहानी) - Mohit Trendster

ढेरी नामक तटीय क्षेत्र के जंगल में मानव सभ्यता से दूर टोमस जंगली प्रजाति रहती थी। अब तक दुनिया में ऐसी गिनी-चुनी प्रजातियां रह गयीं थी जिनका मानव सभ्यता से कोई संपर्क नहीं हुआ हो। किसी भी संपर्क की कोशिश पर टोमस जंगली बेहद आक्रामक हो जाते और इनकी सुरक्षा के लिए सरकार या सेना को पीछे हटना पड़ता। समय के साथ प्रगति करते देश में विदेशी निवेशकों और उद्योगपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा। कुछ वर्षों बाद एक प्रभावशाली उद्योगपति की नज़र उस जंगल और तटीय क्षेत्र पर पड़ी। वहाँ मिलने वाले कुछ खनिजों का उत्खनन उसकी संपत्ति कई गुना बढ़ा सकता था पर उसके रास्ते में थी टोमस प्रजाति। समय के साथ सरकार का रुख बदला और उद्योगपति ने छद्म रूप से टोमस जंगलियों को खत्म करवाना शुरू किया। साम-दाम-दण्ड-भेद के बल पर 1-2 वर्षों में टोमस प्रजाति के सौइयों लोगो को मारा गया और बाकी बचे जंगलियों ने अपनी सुरक्षा के लिए आस-पास के क्षेत्रों में प्रवास कर लिया। 

अपनी सफलता पर इतराता वह कॉर्पोरेट माफिया उस क्षेत्र में बहुत सा निवेश ले आया और जंगल के बड़े हिस्से की कटाई के साथ खनन कार्य शुरू किया। गाहे-बगाहे उसे, उसकी टीम या मज़दूरों को वो जंगली दिख जाते तो जंगली घूरते हुए कुछ मंत्र पढ़ देते। ये लोग ऐसे जंगलियों को हँसी में टाल जाते। कुछ महीनों बाद 8 रिक्टर स्केल का भूकंप और सुनामी आई जिस से खनन के लिए हुआ सारा इंतेज़ाम तहस-नहस हो गया और उत्खनन कार्य मे लगे कई लोग मारे गए। बड़े भौगोलिक परिवर्तन में उस तटीय क्षेत्र और जंगल का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया और साथ ही उस उद्योगपति का सारा निवेश डूब कर उसे कंगाल बना गया। कर्जदारों से बचने के लिए उसने आत्महत्या करने की ठान ली पर अपने हाथों से अपनी जान लेने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। अपराधबोध-ग्लानि से भरे उस व्यक्ति ने प्रजाति के प्रमुख के सामने समर्पण कर दिया कि वो तो उसे मार ही देगा। प्रमुख ने उसे ज़िंदा छोड़ दिया और अब वह कॉर्पोरेट किंग अपने अपराधों के बोझ ढोता जंगलों में भटकता है...शायद मरने के बाद भी भटकेगा।

समाप्त!

Sunday, July 3, 2016

कला की डोर (लघुकथा) - मोहित शर्मा ज़हन

रोज़ की तरह मंदिर के पास से घंटो भजन गा कर उठ रहे बुज़ुर्ग को पंडित जी ने रोका। 

पंडित जी - "बाबा मैंने सुना आपकी पेंशन आपका नकारा लड़का और बहु खा रहे हैं। आप घर से सटे टीन शेड में सोते हो?"

बाबा - "हाँ, शायद अपने ही कर्म होंगे पहले के जो सामने आ रहे हैं।"

पंडित जी - "तो पड़ोसी-पुलिस-रिश्तेदार किसी से बात करो। ठीक से खाना भी नहीं देते वो लोग आपको...यहाँ छोटी सी जगह गाने आते रहोगे तो मर जाओगे किसी दिन।"

बाबा - "पंडित जी, ऐसी हालत में मर तो बहुत पहले जाना चाहिए था पर कलाकार जो ठहरा, कला की डोर पकड़े जीवन चला रहा हूँ...खाने का तो पता नहीं पर यहाँ न आया तब मर जाऊंगा।"

समाप्त!

Art - Jorgina Sweeney

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Author Note - कुछ रचनात्मक लोगो को सामान्य दृष्टि से अलग कामो से संतुष्टि मिलती है। ऐसे काम जो सामान्य लोगो द्वारा धन-सम्पत्ति-यश जुटाने की तरफ बढ़े कदमों से परे एक अलग दुनिया में काल्पनिक महल करने से प्रतीत होते हैं। दूर से उनको देखकर हँसी आती है पर अगर गलती से आप उनकी दुनिया में भटक जाएं तो आपको एक ऐसा शिल्पकार दिखेगा जो हर दिन-हर घंटे-हर मिनट अपनी कला में तल्लीन रहता है। सामान्य दुनिया में आने पर उसमे एक शून्यता, अनुपस्थिति सी दिखाई देती है यह उसकी कल्पना के बंधन होते हैं जो उसे बेचैन रखते हैं। तभी अक्सर ऐसे लोग आम दुनिया में पिछड़ जाते हैं और फिर भी कई आगे बढ़े लोगो से सुखी दिखाई पड़ते हैं।

Sunday, June 19, 2016

अकूत संपत्ति (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


2 पुराने दोस्त राजीव मेहरा और मयंक शर्मा 18-20 सालों बाद मिले थे। भाग्य के फेर से अपनी ज़िंदगियों में काफी व्यस्त और एक-दूसरे से हज़ारों किलोमीटर दूर की शुरू के कुछ सालों बाद दोनों जैसे भूल ही गए अपने जिगरी यार के हाल-चाल लेना। इतने समय में कई चीज़ें बदल गयीं थी। अब प्रौढ़ अवस्था में वो किशोरों वाली फुर्ती नहीं थी और न ही हर बात पर ठहाके-ठिठोली। हाँ, पर दोनों की आँखों में वही पहले वाली चमक थी। बातें करते-करते दोनों छत पर आ गए, किनारे चेस बोर्ड और प्यादे पड़े थे। 

मयंक - "यार पहले की तरह उछला-कूदा नहीं जा सकता पर चेस तो खेल ही सकते हैं। आ बैठ चारपाई पे!"

दोनों चेस की बाज़ी के साथ जीवन की बातें करने लगे। 

राजीव - "भाई बड़ा मलाल हो रहा है। एक प्रॉपर्टी मुझे 4 साल पहले 37 लाख की मिल रही थी, मैंने तब ली नहीं किसी और चक्कर मे पड़ा था। उसके आस-पास कुछ सोसाइटी अप्रूव हो गईं, हाई-वे बन गया अब कीमत 8 करोड़ है उसकी। उस समय इधर ध्यान दिया होता, नादानी न की होती तो आज तेरा भाई आराम से रिटायर होता।"

मयंक - "बुरा हुआ!...तेरी बात से याद आया मैंने भी करोड़ो-अरबों की संपत्ति गंवा दी अपने हट और नादानी की वजह से।"

राजीव - "मज़ाक मत कर यार! मैं तुझे जानता हूँ... तू ठहरा एक साधु आदमी, ये प्रॉपर्टी वगैहरह में तू कभी नहीं पड़ने वाला।"

मयंक - "सोनिया देशपाल का नाम सुना है?"

राजीव - "हाँ, वो बैडमिंटन मे वर्ल्ड नंबर वन ना? अभी ओलिम्पिक मे कोई मेडल भी जीता है बच्ची ने..."

मयंक - "हाँ, वही! अंदर 14 नेशनल मीट में मेरी 12 साल की बच्ची रूपल ने अपनी सीनियर सोनिया को फाइनल मे हराया था। पढ़ाई मे औसत थी वो और क्लास 7 बड़ी मुश्किल से पास करवाई थी हमने उसे। टूर्नामेंट के बाद उसके क्लास 8 के पेपर थे, उसका ध्यान न डिगे इसलिए नेशनल मीट के बाद मैंने और तेरी भाभी ने इसे इतना मारा और सुनाया की उसने बैडमिंटन छोड़ दिया और यही हम चाहते थे।"

राजीव - "ओह! भाई ये तो बड़ी गलती हो गई! आज शायद रूपल भी सोनिया जैसे मेडल ला रही होती, बाहर के टूर्नामेंट जीत रही होती...पर तूने तो सिर्फ छोटी निवेदिता से मिलवाया। रूपल कहाँ है?"

मयंक - "उसके कुछ दिन बाद तनाव में रूपल ने आत्महत्या कर ली...अरबों-खरबों की संपत्ति, अपनी परी को मैंने अपने पागलपन में गंवा दिया।"

समाप्त!

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Sunday, June 12, 2016

इज़्ज़त का अचार (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन

होपी नामक क़स्बा नक्काशी के काम और पुराने मंदिरों की वजह से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र था। यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या काफी थी। संपन्न परिवार का दिनेश वहां अकेले ट्रेवल एजेंसी, टूर गाइड्स, होटल आदि काम संभालता था। उसे लगता था उसके पुरखों को कमाना नहीं आता था और जितना वे कमा सकते थे उतना कमाया नहीं। वह अपने ड्राइवर्स, होटल मैनेजर, गाइड्स आदि के साथ मिलकर हर सेवा के विदेशी पर्यटकों से ज़्यादा पैसे वसूलता, घटिया सामान खरीदवाता और मौका मिलने पर अपने ही पॉकेटमार, चोर लड़के-लड़कियों से पर्यटकों के पैसे और कीमती सामान उठवाता। 

एक दिन यूँ ही काम का जायज़ा ले रहे दिनेश के पिता ने उसे टोका तो उसका जवाब था - "पिता जी आप बेफिक्र रहो! पुलिस अपनी जेब में है, बस टूरिस्ट को दिखाने का नाटक करते हैं। न इस जगह कोई दूसरा कॉम्पिटिशन है अपना।"

बिजनस सँभालने के डेढ़ साल के अंदर ही पहले से काफी अधिक मुनाफा हुआ तो दिनेश ने खाना खाते हुए अपने बुजुर्गो को ताना मारा - "बाउ जी ऐसे कमाया जाता है रुपया।"

इन डेढ़ वर्षों के दौरान इंटरनेट फ़ोरम्स, सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ रिपोर्ट्स में होपी क़स्बा पर्यटकों से चोरी, धोखाधड़ी के मामलो में कुख्यात हो गया था। कभी हज़ारो विदेशी पर्यटकों के आकर्षण पर अब गिने-चुने विदेशी आने लगे। दिनेश के काम एक-एक कर ठप होने लगे और ज़मीन बेचने की नौबत आ गयी। बाबा से रहा न गया - "बेटा, ज़मीन के अलावा घर भी बेचना पड़े कोई बात नहीं.... इन्हे बेच कर इस परिवार, जगह और देश की खोई इज़्ज़त वापस मिले तो लेते आना।"

समाप्त!
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Wednesday, May 25, 2016

बाज़ीगरनी (लघुकथा) - लेखक मोहित शर्मा ज़हन


अक्सर सही होकर भी बहस में हार जाना दीपा की आदत तो नहीं थी, पर उसका बोलने का ढंग, शारीरिक भाषा ऐसी डरी-दबी-कुचली सी थी कि सही होकर भी उसपर ही दोष आ जाता था। जब वह गलत होती तब तो बिना लड़े ही हथियार डाल देती। आज उसकी एफ.डी. तुड़वा कर शेयर में पैसा लगाने जा रहे पति से हो रही उसकी बहस में उसके पास दमदार तर्क थे। 

"आप...आपने पहले ही कितना पैसा गंवाया है शेयर्स में! ये एफ.डी. इमरजेंसी के लिए रख लेते हैं ना? वो...आप दोबारा जोड़ कर लगा लेना पैसे शेयर में।"

"अरे चुप! पति एकसाथ तरक्की चाह रहा है और तू वही चिंदी चोरी जोड़ने में लगी रहियों। तेरी वजह से मेरी अक्ल पर भी पत्थर पड़ जाते हैं!"

"मेरी वजह से? मैंने...क्या किया? मैंने कुछ नहीं किया!"

...और इस तरह दीपा ने एक बार फिर से जीत के मुंह से हार छीन ली। अपनी आदत उसे पता थी और इस बार उसे हार नहीं माननी थी। 

कुछ देर बाद पति पैसे लेकर बाहर निकला तो 2 नकाबपोश बाइक सवार उसका झोला झपट के चले गए। पति ओवरलोडेड इंजन की तरह आवाज़ निकालता थाने गया और वो 2 बाइक सवार दीपा को झोला पकड़ा कर चले गए। दीपा ने अपने भाई को सारी बात बताई और भाई ने अपने दोस्त भेज कर दीपा को हार कर भी जीतने वाली बाज़ीगर बनवाई। 

समाप्त!

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Sunday, March 13, 2016

अक्ल-मंद समर्थक (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


Scene 1) - एक हिंसक गैंगवार के बाद एक छोटे कसबे के घायल नेता को उसके समर्थको की भीड़ द्वारा अस्पताल लाया गया। डॉक्टर्स ने जांच के बाद नेता जी को मृत घोषित कर दिया।  

"अरे ऐसे कैसे हमारे मसीहा को मरा हुआ बता दिया?" समर्थको का गैंगवार से मन नहीं भरा था। .....उन्होंने डॉक्टर्स को ही पीट-पीट कर मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद अस्पताल के मैनेजमेंट ने फैसला किया कि आगे से किसी नेता, दबंग या प्रभावशाली व्यक्ति की मौत होने पर भी उसे ज़िंदा बताकर दिल्ली या पास के किसी बड़े शहर के अस्पताल रेफर कर दिया जाएगा। 

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Scene 2) - ऐसे ही गैंगवार में दूसरे गुट का गंभीर रूप से घायल नेता जब अस्पताल लाया गया तब ड्यूटी पर डॉक्टर एक ऑपरेशन में व्यस्त थे। समर्थको से डॉक्टर्स का इंकार और इंतज़ार बर्दाश्त नहीं हुआ। डॉक्टर्स को भीड़ ने पीट-पीट का लहूलुहान, बेहोश कर दिया।  जब तक डॉक्टर्स होश में आये तब तक ऑपरेशन वाला पहला मरीज़ और इंतज़ार कर रहे नेता जी दोनों त्वरित इलाज के अभाव में दुनिया को टाटा कर चुके थे। समझदारी का परिचय देते हुए यहाँ के डॉक्टर्स ने दूसरे नेता जी को लखनऊ के हॉस्पिटल रेफर कर दिया। 

समाप्त!

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Tuesday, January 19, 2016

भूत स्वैग - लेखक मोहित शर्मा ज़हन #mohitness

Holi festival 2014 Pic
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टीनएजर भूतों के एक ग्रुप के लड़के एक दूसरे पर शेखी बघार रहे थे। 

भोलू भूत - "भाई एक बार मैं इंद्र देव की मूर्ति के बगल से निकल चुका हूँ।" 

भक भूत - "चल बे! इतने में ही बस ..मै तो शिवजी भोलेनाथ की प्रतिमा के सामने से गया हूँ।" 

पीछे से आवाज़ - "बस-बस! लिपरीडिंग की थी तब तेरी सबने! कांपते हुए शंकर जी के सामने नर्वसनेस में जय संतोषी माता निकल रहा था तेरे मुंह से। वो तो बाइचांस की बात है कि भोलेबाबा ने तुझे माफ़ कर दिया होगा।"

थोड़ा झेंपने और ध्यान बंटने के बाद फिर डिस्कशन चालू।

भोलू भूत - "यार तू भरी सुबह में क्यों निकलता है। कोई तांत्रिक पकड़ ले, कुछ उंच नीच हो जाए तो क्या इज़्ज़त रह जायेगी तेरी फैमिली की?"

भक भूत - "अबे भाई-यार भक बे! तुम डरपोक सुबह साढ़े तीन बजे निकल लेते हो, हम साढ़े 6 से पहले वापस नहीं जाते, अपनी शान में रहते है।" 

पीछे से आवाज़ -  "....और तभी रोशनी से झुलस कर फ्राइड मोमोज़ हुए फिरते हो।" 

भक भूत ने मण्डली के हंसने से पहले ही नया दावा किया - "मेरे सुबह घूमने की आदत की वजह से...बाय चांस मुझे देख कर एक बार एक अंकल जी को हार्ट अटैक आ गया और वो मर गए।"

पीछे से आवाज़ - "वो उन्हें पहले से ही अटैक पड़ा था, तू तो बस क्रेडिट लेने कूद पड़ा उनके सामने उनके मरने के बाद।" 

भक भूत - "अरे! ये कौन है पीछे से अफवाहें फैला रहा है? अब एक हीरो शान्ति से अपने किस्से भी नहीं सुना सकता !!"

पीछे की आवाज़ का मालिक आगे आया - "मै वही अंकल जी का भूत हूँ, जिसकी नेचुरल डेथ का क्रेडिट तू अपनी दहशत के नाम चढ़ा रहा था। आजा मेरी नन्ही परी...कुछ छड़ी खा ले....तेरे अंदर का स्वैग निकालू।"

समाप्त!

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