...is "Celebrating (un)Common Creativity!" Fan fiction, artworks, extreme genres & smashing the formal "Fourth wall"...Join the revolution!!! - Mohit Trendster
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Saturday, January 18, 2020

मज़ा आना चाहिए बस...(लघु-कहानी) #ज़हन


गगन कई महीनों बाद अपने दोस्त सुदेश के साथ सिनेमा हॉल आया था। 3-4 बार योजना बनाने और फिर नहीं मिल पाने के बाद आखिरकार दोनों को साथ फिल्म देखने का मौका मिला था। स्कूल के दिन तो कबके जा चुके थे पर इस तरह मिलकर दोनों स्कूल जैसा समय वापस जीने का प्रयास करते थे।

फिल्म से पहले चल रहे दूसरी फिल्मों के ट्रेलर विज्ञापनों पर गगन बोला - "क्या यार! ट्रेलर में तो इस पिक्चर का म्यूज़िक, कहानी और यहां तक की लोकेशन, किरदारों का मेकअप भी पिछले साल आई हॉलीवुड फिल्म से मिलते-जुलते हैं। कब सुधरेंगे ये बॉलीवुड वाले? हर दूसरी फिल्म का यही हाल है। साउथ और बाकी रीजनल सिनेमा वाले भी बहुत कॉपी मारते हैं। इतने लेखक, कलाकार बैठे हैं अपने इंडिया में उनसे ही कुछ ले लो...मगर नहीं! जो आईडिया बाहर पैसे कमाएगा उसकी हूबहू नक़ल ये लोग बना देंगे..."

सुदेश ने गगन की बातों वाली ट्रेन की चेन खींचकर उसे रोका - "भाई, तू इंजीनियर है, ज़्यादा प्रेमचंद मत बन! मज़ा आना चाहिए बस...बाकी सब फालतू की बातें हैं।"

कुछ महीने बीतने के बाद कॉलेज के दोस्तों में गप्पे लड़ाते हुए सुदेश बोला - "इंडिया वालों पर कुछ नहीं होता! कल छोटे से देश कोस्टा रिका के दो कलाकारों को ऑस्कर मिला और कई सालों की तरह इंडिया को ठेंगा। ये..."

अब गगन की बारी थी, उसने वह कालजयी डायलॉग कंठस्त कर लिया था - "रहने दे भाई....मज़ा आना चाहिए बस...बाकी सब फालतू की बातें हैं।"

समाप्त!
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Thursday, June 20, 2019

रूठ लो... #Ghazal


कुछ रास्तों की अपनी जुबां होती है,
कोई मोड़ चीखता है,
किसी कदम पर आह होती है…

पूछे ज़माना कि इतने ज़माने क्या करते रहे?

ज़हरीले कुओं को राख से भरते रहे,
फर्ज़ी फकीरों के पैरों में पड़ते रहे,
गुजारिशों का ब्याज जमा करते रहे,
हारे वज़ीरों से लड़ते रहे…
और …खुद की ईजाद बीमारियों में खुद ही मरते रहे!

रास्तों से अब बैर हो चला,
तो आगे बढ़ने से रुक जाएं क्या भला?
धीरे ही सही ज़िंदगी का जाम लेते हैं,
पगडण्डियों का हाथ थाम लेते हैं…

अब कदमों में रफ़्तार नहीं तो न सही,
बरकत वाली नींद तो मिल रही,
बारूद की महक के पार देख तो सही…
नई सुबह की रौशनी तो खिल रही!

सिर्फ उड़ना भर कामयाबी कैसे हो गई?
चलते हुए राह में कश्ती तो नहीं खो गई?
ज़मीन पर रूककर देख ज़रा तसल्ली मिले,
गुड़िया भरपेट चैन से सो तो गई…

कुछ फैसलों की वफ़ा जान लो,
किस सोच से बने हैं…ये तुम मान लो,
कभी खुशफहमी में जो मिटा दिए…वो नाम लो!

किसका क्या मतलब है…यह बरसात से पूछ लो,
धुली परतों से अपनों का पता पूछ लो…
अब जो बदले हो इसकी ख़ातिर,
अपने बीते कल से थोड़ा रूठ लो…
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#ज़हन

*Published - Ghazal Dhara (June 2019)

Sunday, February 5, 2017

अमीर की हाय (कहानी) #ट्रेंडस्टर

दूसरे हृदयघात के बाद आराम से उठने के बाद उद्योगपति तुषार नाथ का व्यक्तित्व बदल गया था। पहले व्यापार पर केंद्रित उनका नजरिया अब किसी छोटे बच्चे जैसा हो गया था। छोटी-छोटी बातों पर चिढ जाना, उम्र के हिसाब से गलत खान-पान और व्यापार में हो रहे घाटे पर ध्यान ना देना अब उनके लिए आम हो गया था। परिवार और परिचितों को साफ़ लग रहा था कि उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। 

एक दिन उन्होंने अपनी दुकानों के सभी कर्मचारियों और अपने परिचित जनो को एक मंदिर के पास बुलाया। सभी चकित और कारण जानने के लिए आतुर थे कि ऐसी क्या आपात स्थिति आन पड़ी जो तुषार नाथ जी ने दो-ढाई सौ लोगो को अपने घर से अलग एक जगह बुलाया। तुषार जी की हरकतें और चेहरे के हाव-भाव देख कर लग रहा था कि कुछ गड़बड़ है। वो एक मंच पर चढ़े और माइक्रोफोन से सभी एकत्रित लोगो को संबोधित करने लगे। 

"हेल्लो फ्रेंड्स! आज मैं आप सबको भोला भिखारी से मिलवाना चाहता हूँ।" इतना कहकर उन्होंने मंदिर की सीढ़ियों पर अंगड़ाई ले रहे एक भिखारी की तरफ इशारा किया। 

एक कर्मचारी अपने मित्र से बोला - "मैं पहले ही कहता था कि हार्ट अटैक के बाद से बुडढा सटक गया है! लगता है अपनी संपत्ति इस भिखारी को देने वाला है।"

कुछ ऑफ टॉपिक बातें करने के बाद तुषार नाथ को अपना असल मुद्दा याद आया - "....हाँ, तो मैं कह रहा था कि आप सभी लोग भोला को हाय दो। मतलब हॉय-हेल्लो वाला नहीं जो दिल से किसी के लिए हाय निकलती है वो वाली हाय!"

ये क्या था? मतलब ये हुआ क्या? कुछ अचंभित, कुछ अपनी हँसी छुपाते पर सबके मन में यही बात थी। 

तुषार नाथ - "मंदिर से लौटते हुए गलती से मेरा पैर इसके पैसे वाले कटोरे पर लग गया और इसके सिक्के सीढ़ियों पर नीचे बिखर गए। जब गुस्से में यह मेरी ओर मुझे मारने को बढ़ा तो मेरे गार्ड ने इसे 1 थप्पड़ लगा दिया। फिर इसने बोला कि एक गरीब की बड़ी हाय लगेगी मुझे....पर इस नादान को पता नहीं कि मैं कौन हूँ! इसलिए आप सब अमीरो, मिडिल क्लास लोगो को यहाँ भोला को लगभग 200 सामूहिक हाय लगाने के लिए बुलाया है।"

किसी त्यौहार पर मंदिर के पास से जयकारों की तेज़ ध्वनि आती थी। आज एक सामान्य दिन ऐसी ही एक आवाज़ गूँजी....

"....हाय!"

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन
Artwork: Katan Walker

Friday, July 22, 2016

अर्द्धअच्छा काम (कहानी)

दिनेश ऑफिस से थका हारा घर पहुंचा। उसकी पत्नी रूपाली जो 1 महीने बाद अपने मायके से लौटी थी, उसके पास आकर बैठी। दोनों बीते महीने की बातें करने लगे। फिर दिनेश ने महीने की बातों के अंत के लिए एक किस्सा बचा कर रखा था। "परसो एक आदमी फ़ोन पर बात कर रहा था। जल्दबाज़ी में ऑफिस के बाहर बैग छोड़ गया, मैंने फिर वापस किया...नहीं तो काफी नुक्सान हो जाता बेचारे का।"

रूपाली - "अरे वाह...प्राउड ऑफ़ यू! आखिर पति किसके हो! पर इसमें क्या ख़ास बात है जो बताने से पहले इतना हाइप बना रहे थे?"

दिनेश - "पहले मैंने बैग चेक किया। उसमे वीडियो कैमरा, डाक्यूमेंट्स, 75 हज़ार रुपये, घडी-कपडे टाइप सामान था। तो 17 हज़ार रुपये निकाले बाकी सामान एक बंदे से उसके पते पर छुड़वा दिया।"

रुपाली - "हौ! चोर! ऐसा क्यों किया? गलत बात!"

दिनेश - "देखो जैसा लोग काम करते हैं, वैसा उन्हें फल मिलता है, लापरवाही करोगे तो कुछ सज़ा मिलनी चाहिए ना? मुझे तो भगवान ने बस साधन बनाया। अब उस आदमी आदमी को सबक मिलेगा।"

रुपाली - "ये देखो गीता पढ़ कर भगवान कृष्ण के दूत बनेंगे सर। अरे लौटा दो बेचारे के पैसे।"

दिनेश - "नहीं हो सकता, ये देखो।"

रुपाली - "यह क्या है?"

दिनेश - "जो फ़ोन तुम्हे गिफ्ट किया उसकी रसीद। 16990 रुपये का है, अब 10 रुपये लौटाने क्या जाऊं। इसकी एक-एक ऑरेंज चुस्की खा लेते हैं।"

रुपाली - "यू आर सच ए..."

दिनेश - "आखिर पति किसका हूँ?"

समाप्त!

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- मोहित शर्मा ज़हन

Sunday, June 26, 2016

Featured | DK Boss/Se7enth Sense (the artworks) | Artist Dheeraj Kumar

Creative Artist Dheeraj Dkboss Kumar is an Indian Graphic Designer, Colorist and Illustrator. 

Qualifications: Bachelor of Fine Arts (BFA) - 2004-2008 , Allrounder of Applied Art - 2008, AD3D+ (complete animation course) - 2008-2010. 

Awards and Accolades: 24FPS Animation Awards for Best Story and Best Movie (Winner), Indian Comics Fandom Awards 2013 - Colorist (Silver), Indian Comics Fandom Awards 2014 - Cartoonist (Gold), Indian Comics Fandom Hall of Fame 2014. 

Location - Lucknow, India. FB page - DK Boss/Se7enth Sense (the artworks)
Here are some of his works....




Webcomic - Jhoomritallaiyaa

Sunday, March 27, 2016

लेखकों के लिए कुछ सुझाव

हर लेखक (या कवि) अपनी शैली और पसंद के अनुसार कुछ रचना-पद्धतियों (genres) में अच्छा होता है और कुछ में उसका हाथ तंग रह जाता है। यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि कुछ विधाओं में लेखक अधिक प्रयास नहीं करता। समय के साथ यह उसकी शैली का एक हिस्सा बन जाता है। अक्सर किसी अनछुई विधा को कोई लेखक पकड़ता भी है तो उसमे अनिश्चितता और असंतोष के भाव आ जाते है। सबसे बड़ा कारण लेखक ने इतने समय में स्वयं के लिए जो मापदंड बनाए होते हैं, उनपर इस नयी विधा की लेखनी खरी नहीं बैठती। ऐसा होने पर लेखक रही उम्मीद भी छोड़ कर वापस अपनी परचित विधाओं की तरफ वापस मुद जाता है। अपने अनुभव की बात करूँ तो मुझे हास्य, हॉरर, ट्रेजेडी, इतिहास, ड्रामा, सामाजिक संदेश जैसे विषयों पर लिखना अधिक सहज लगता है, जबकि रोमांटिक या साइंस फिक्शन जैसी थीम पर मैंने काफी कम लेखन किया है। नयी श्रेणियों में पैर ज़माने का प्रयास कर रहे लेखकों और कवियों के लिए कुछ सुझाव हैं। 

*) - अपनी वर्तमान लेखन क्षमता, शैली और उसकी उसकी लोकप्रियता की तुलना नयी विधा में अपने लेखन से मत कीजिये। ऐसा करके आप नयी रचना-पद्धति में अपने विकास को शुरुआती चरण में रोक देते हैं। खुद को गलती करने दें और नए काम पर थोड़ी नर्मी बरतें। याद रखें बाकी लेखन शैलियों को विकसित करने में आपको कितना समय लगा था तो किसी अंजान शैली को अपना बनाने में थोड़ा समय तो लगेगा ही। 

*) - शुरुआत में आसानी के लिए किसी परचित थीम के बाहुल्य के साथ अंजान थीम मिलाकर कुछ लिखें। इस से जिस थीम में महारत हासिल करने की आप इच्छा रखते हैं उसमे अलग-अलग, सही-गलत समीकरण पता चलेंगे। थोड़े अभ्यास के बाद परिचित थीम का सहारा भी ख़त्म किया जा सकता है।    

*) - आदत अनुसार कहानी, लेख या कविता का अंत करने के बजाए उस थीम में वर्णन पर ध्यान दें। चाहे एक छोर से दूसरा छोर ना मिले या कोई अधूरी-दिशाहीन रचना बने फिर भी जारी रहें। इस अभ्यास से लेखन में अपरिचित घटक धीरे-धीरे लेखक के दायरे में आने लगते हैं। 

*) - यह पहचाने की आपकी कहानी/रचना इनसाइड-आउट है या आउटसाइड-इन। इनसाइड-आउट यानी अंदर से बाहर जाती हुयी, मज़बूत किरदारों और उनकी आदतों, हरकतों के चारो तरफ बुनी रचना। आउटसाइड-इन मतलब दमदार आईडिया, कथा के अंदर उसके अनुसार रखे गए किरदार। वैसे हर कहानी एक हाइब्रिड होती है इन दोनों का पर कहानी में कौन सा तत्व ज़्यादा है यह जानकार आप नए क्षेत्र में अपनी लेखनी सुधार सकते हैं।

 - मोहित शर्मा ज़हन 

Read रचनात्मक प्रयोगों से डरना क्यों?


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Tuesday, January 19, 2016

भूत स्वैग - लेखक मोहित शर्मा ज़हन #mohitness

Holi festival 2014 Pic
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टीनएजर भूतों के एक ग्रुप के लड़के एक दूसरे पर शेखी बघार रहे थे। 

भोलू भूत - "भाई एक बार मैं इंद्र देव की मूर्ति के बगल से निकल चुका हूँ।" 

भक भूत - "चल बे! इतने में ही बस ..मै तो शिवजी भोलेनाथ की प्रतिमा के सामने से गया हूँ।" 

पीछे से आवाज़ - "बस-बस! लिपरीडिंग की थी तब तेरी सबने! कांपते हुए शंकर जी के सामने नर्वसनेस में जय संतोषी माता निकल रहा था तेरे मुंह से। वो तो बाइचांस की बात है कि भोलेबाबा ने तुझे माफ़ कर दिया होगा।"

थोड़ा झेंपने और ध्यान बंटने के बाद फिर डिस्कशन चालू।

भोलू भूत - "यार तू भरी सुबह में क्यों निकलता है। कोई तांत्रिक पकड़ ले, कुछ उंच नीच हो जाए तो क्या इज़्ज़त रह जायेगी तेरी फैमिली की?"

भक भूत - "अबे भाई-यार भक बे! तुम डरपोक सुबह साढ़े तीन बजे निकल लेते हो, हम साढ़े 6 से पहले वापस नहीं जाते, अपनी शान में रहते है।" 

पीछे से आवाज़ -  "....और तभी रोशनी से झुलस कर फ्राइड मोमोज़ हुए फिरते हो।" 

भक भूत ने मण्डली के हंसने से पहले ही नया दावा किया - "मेरे सुबह घूमने की आदत की वजह से...बाय चांस मुझे देख कर एक बार एक अंकल जी को हार्ट अटैक आ गया और वो मर गए।"

पीछे से आवाज़ - "वो उन्हें पहले से ही अटैक पड़ा था, तू तो बस क्रेडिट लेने कूद पड़ा उनके सामने उनके मरने के बाद।" 

भक भूत - "अरे! ये कौन है पीछे से अफवाहें फैला रहा है? अब एक हीरो शान्ति से अपने किस्से भी नहीं सुना सकता !!"

पीछे की आवाज़ का मालिक आगे आया - "मै वही अंकल जी का भूत हूँ, जिसकी नेचुरल डेथ का क्रेडिट तू अपनी दहशत के नाम चढ़ा रहा था। आजा मेरी नन्ही परी...कुछ छड़ी खा ले....तेरे अंदर का स्वैग निकालू।"

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents

Saturday, December 12, 2015

सपने वाले अंकल जी (Micro Fiction Experiment # 05) #mohitness



एक रात वृद्ध अंकल जी को अचानक सपने दिखने लगे।
रंग-बिरंगे, प्रकृति के, खेल-खिलोनो के, बच्चो के, समुद्र के, युद्ध के, मौसम के, अश्लील वाले, यात्रा के और विभिन्न विजुअल्स। 

सपने उन्हें आते थे कभी कबार पर इतने अधिक और इस तरह के रोलरकोस्टर दृष्टांत तो कतई नहीं। 
अंदाज़ लगाया कि शायद ईश्वर ने उन्हें मरने से पहले अपने आस-पास मौजूद दूसरो के सपने देखने की शक्ति दी है, चलो इस बहाने रोज़ नींद में ही सही कुछ मनोरंजन हो जाएगा। 

ध्यान केंद्रित कर उन्होंने किसी भी व्यक्ति के नये-पुराने सपने पढ़ने की शक्ति अर्जित कर ली, चलो इस बहाने संपत्ति का अधिक हिस्सा किसे दूँ यह निर्णय हो जाएगा। 
पहले बेटे के सपने नीरस थे, हुंह जैसे ये कुछ नहीं बोलता वैसे ही इसके सपने भी बोगस। छोटे बेटे के सपने देखता हूँ, वो मुझे बहुत प्यार और सम्मान देता है। 
अरी मईया! पहले ही सपने में मेरी चिता जला कर उसके अराउंड शादी के फेरे ले रहा है। अब ना देने का इसे रुड़की वाला प्लाट। 

छोटे बेटे के कई सपनो में बूढ़े अंकल ने अपनी मौत, पिटाई, बेइज़्ज़ती देखी। 
वैसे तो बड़ा भी कुछ ख़ास नहीं पर लुच्चो की इस टक्कर में कुछ दशमलव अंको से मैं उसे जिताता हूँ। ज़्यादा संपत्ति बड़े को, बाकी थोड़ा बहुत हिस्सा राम गोपाल वर्मा के उस विकृत रूप, मेरे छोटे बेटे को। 

अंकल ये भी हो सकता था कि आपके छोटे बेटे को मनोविज्ञान, अपराध, डार्क आदि विषयों में रूचि हो और आप उसके दिल के सबसे करीब होने के कारण उसके विकृत ख्वाबों में कहीं ना कहीं आ जाते हों। अंकल-अंकल....लो बिना ये विचार किये ही काल के ग्रास में समा गए अंकल !  

- मोहित शर्मा (ज़हन) 
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Read Micro Fiction Experiment # 04

Friday, September 4, 2015

सबकी अनैतिक बढ़त - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


अंतर्राष्ट्रीय साइकिल रेस के लिए चुना गया नेचुरल कोर्स शिव के लिए नया नहीं था। आखिर यही वह रास्ता था जहाँ वो वर्षो से प्रतिदिन अभ्यास करता था। उसके मित्रों और जानने वालो को पूरा विश्वास था कि यह रेस जीतकर शिव अंतर्राष्ट्रीय सितारा बन जाएगा। कॉलेज में कुछ हफ्ते पहले ही उसको यह दर्जा मिल गया था। शिव के कोच राजीव मेहरा मानकर बैठे थे कि अगर उस दिन कुछ ऊँच नीच हुयी, तब भी शिव शुरुआती कुछ रेसर्स में आकर बड़ी इनामी राशि अर्जित कर लेगा। स्थानीय कंपनियों में यह बात फैली तो उससे कुछ स्पोंसर्स जुड़ गये। 

रेस का दिन आया और रेस शुरू हुयी। पहले चरण में शिव काफी पीछे रहा, लोगो ने माना कि शायद वह अपनी ऊर्जा बचा रहा है या यह उसकी कोई रणनीति  है। पर रेस ख़त्म होने पर कुशल साइकिलिस्ट शिव औसत 17वें स्थान पर आया। स्थानीय लोगो और उसके करीबियों में अविश्वास और रोष था। जो रेस शुरू होने से पहले लाइमलाईट लेने में सबसे आगे थे, वही कोच और स्पोंसर्स रेस के बाद ताने देने वालो में सबसे आगे थे। जबकि एक शून्य में खोया शिव प्रतियोगिता की घोषणा के दिन से ही अलग उधेड़बुन में था। 

माहौल शांत होने के बाद एक शाम अपने मित्र सुदीप्तो के सामने उसने अपना दिल खोला। 

शिव - "मैंने खुद को बहुत समझाया पर मन को समझा नहीं पाया। मुझे लगा कि एक रास्ता जिसके हर मोड़, उंच-नीच यहाँ तक कि हवाओं की दिशा तक से मैं इतना करीब से परिचित हूँ पर मेरा जीतना अनैतिक होगा, एक चीटिंग होगी बाकी साइकिलिस्टस के साथ। धीरे-धीरे यह बातें मेरे दिमाग पर इतनी हावी हों गयी कि रेस के दिन वो बोझ मेरे पैरों, मेरे शरीर पर महसूस होने लगा और परिणाम तुम जानते ही हो।"

सुदीप्तो - "भाई, पहली बात तो ये कि दिमाग बड़ी कुत्ती चीज़ है, किसी मामले में बिलकुल परफेक्ट और कहीं-कहीं बिलकुल फ़िर जाता है। तो यह जो तुम्हारे साथ हुआ ये किसी के साथ भी हो सकता था। किसी बात में जब हमे सीधा लाभ मिलता है और हम किसी भी रूप में प्रतिस्पर्धा का हिस्सा होतें है तो कभी-कभी अपराधबोध लगता है कि हमे मिली यह बढ़त तो गलत है। पर इस बढ़त को एक मौके की तरह देखो जिसे पाकर तुम अपने और अपने आस-पास के लोगो के लिए एक बेहतर कल सुनिश्चित कर सकते हो। सोचो अगर यह रेस तुम जीतते तो अपने साथ-साथ कई लोगो का जीवन बदल देते और क्या पता आगे इस पूरे कस्बे की तस्वीर बदल देते। जहाँ तक अनैतिक बढ़त या चीटिंग की बात है वह तो तुम अब भी कर रहे हो, बल्कि हम सब करते है।"

शिव - "भला वो कैसे?"

सुदीप्तो - "तुम्हारे साधन-संपन्न माता-पिता है, क्या यह उन लोगो के साथ चीटिंग नहीं जो बचपन में ही अनाथ हो गए या जो किसी स्थिति के कारण गरीब है? तुम 6 फुट और एथलेटिक बॉडी वाले इंसान हों, क्या यह उन लोगो पर अनैतिक प्राकृतिक बढ़त नहीं जो अपाहिज है? तुम्हारे क्षेत्र में शान्ति है, क्या यह देश और दुनिया के उन लोगो पर बढ़त नहीं जिन्हे युद्ध के साये में जीवन काटना पड़ता है?"

शिव - "इस तरह तो मैंने कभी सोचा ही नहीं।"

सुदीप्तो - "इस तरह सोचोगे तो कभी जीवन में कोई मौका भुना नहीं पाओगे। ऐसे एंगल से सब सोचने लगे तो दुनिया के सारे काम उलट-पुलट जायेंगे। हाँ, हमे कुछ बातों में दूसरो पर प्राकृतिक या अन्य बढ़त हासिल है पर कुछ बातों में दूसरो को लाभ है। पते की बात यह है कि हम स्वयं को बेहतर बनाने में और अपने काम को अच्छे ढंग से करने पर ध्यान दें, अब अगली रेस कि तैयारी करो। गुड लक!"

समाप्त!

- मोहित शर्मा (ज़हन)

#mohitness #freelancetalents #trendster #freelance_talents #trendybaba

Thursday, July 17, 2014

Doga (Raj Comics) ka Message - मोहित शर्मा (ट्रेंडी बाबा)



इसके भी थे अपने...इसका भी था घर,
कुचल दिये सब सपने...अरमानो का गाला घोंट कर,
तुझे बड़े होने का हक़ नहीं...तू नाबालिग़ ही मर।

तेरे लड़कपन की नादानी में कितनी ज़िंदगियाँ हारी,
बदन क्या गवाही देगा...जब चले रूखी आँखों की आरी,
हल्की उम्र पर गुनाह है भारी।

नातेदारों ने यूँ आसानी से कह दिया "बच्चे को एक और मौका दिया जाये !"
मैंने उनसे कहा सिर्फ़ चंद पल इस लड़की के घर की दहलीज़ पर बिताकर आयें।

#Doga

Harish Atharv Thakur, Ajay Thapa, Mohit Trendster, Youdhveer Singh
 — with Shiva Ji Aryan, Ajay Thapa, Ravendra Singh, Mohit Sharma, Harish Atharv Thakur, Deepak Pooniya and Youdhveer Singh.

Monday, June 2, 2014

मोहित शर्मा (ज़हन) - May 2014 Logs & Info

May 2014 Logs - Mohit Sharma Trendster

I spent 2 weeks away from everything in a colorful town Mursan (Hathras) near the Holy city of Mathura. Then back to work. 


Published in National Daily "Janwani" (10 May 2014)


WIP for a children educational book with artist Mr. Prince Ayush.


International Freelance Talents Championship 2013 winner Mr. Kapil Chandak featured in Tata Magazine circulated in 89 countries. Awesome feeling as an organizer. :)



Finally, another cover article for Roobaru Duniya (May 2014) where I included my friend Mr. Shiva ji Aryan also. :)

- मोहित शर्मा (ज़हन)

Thursday, April 10, 2014

Mohit Sharma Trendster : Mohitness {मोहितपन} - April 2014 Update

 
Roobaru Duniya Magazine Special Story on Indian Comics and a Chitr Thitholi Toon. 

'Jai Ashleela Gang' getting mixed reviews on different websites. Working on a poetry anthology. Heavy Backlog!

Page from 'Jai Ashleela Gang'

Wednesday, November 13, 2013

Deadly Deal (Indi Horror Series) by Mohit Sharma


Wrote "Deadly Deal" (Horror) way back in 2006 & last year (2012) Kuldeep Babbar liked the idea so I wrote a 20 Page script on this story. He made that in record time within 3 weeks but then project got delayed due to other commitments & hurdles. Finally, another artist Atharv Thakur is giving the artworks final touch up. Coming this Decemeber!!!!

- Mohit Sharma (Trendy Baba / Trendster)