...is "Celebrating (un)Common Creativity!" Fan fiction, artworks, extreme genres & smashing the formal "Fourth wall"...Join the revolution!!! - Mohit Trendster
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Thursday, March 8, 2018

भूमिका या परिणाम? #ज़हन


परिचय में एक व्यापारी हैं जो फिल्मों, साहित्य में रूचि लेते हैं। वो एक स्थानीय फिल्म बना रहे हैं जिसमें खुद ही हीरो बन गये हैं। उन्होंने ये भी एलान किया है कि अभी इस क्रम में अपनी सोची कहानियों पर कुछ फिल्में और करेंगे, जिनमें भी वो खुद ही नायक होंगे। साथ वाले बहुत से चाटुकार खुश हैं कि लंबे समय का आसान रोज़गार मिल गया है। इन्ही व्यापारी सज्जन के शहर में मौकों की तलाश में हज़ारों थिएटर अभिनेता, लेखक, कलाकार घिसटते हुए जीवन व्यतीत कर रहे हैं....लेकिन हर विधा का हीरो तो साहब को खुद बनना है। यहाँ एक और ध्यान देने वाली बात है कि "हर विधा" मतलब ग्लिटर वाली-चमकदार शेखी बघारने लायक विधा, बाकी लाइटिंग, साउंड आदि नहीं। 

अपने जीवन की फिल्म में हर कोई मुख्य किरदार में होता है। समय के साथ उसे अपनी क्षमताएं, सीमाएं पता चलती हैं और उनके अनुसार वह जीवन जीता है। किन्ही बातों और अवसर पर उसका नायक का किरदार जँचता है पर बाकी अधिकतर जगहों पर उसका नायक के रोल में आना अटपटा लगता है। अनगिनत समीकरणों से बनी दुनिया में बहुत भीड़ है और प्रकृति सभी को भिन्न-भिन्न बातों में नायक बनने के अवसर देती है। ऐसा हो सकता है कि कोई सामान्य से अधिक जगहों पर नायक बना अच्छा लगे पर अपने मन में ये ग़लतफ़हमी पालकर हर जगह ज़बरदस्ती मुख्य रोल में घुसना गलत है। तो हीरो बनने चले इन व्यापारी सज्जन के साथ होगा ये कि इनकी फिल्म इनके परिचय तक सिमट कर रह जायेगी। हाँ, अगर ये अपने अनुभव और हुनर वाले रचनात्मक काम करते हुए अन्य कामों का ज़िम्मा अपने-अपने क्षेत्र के महारथीयों को देते तो इनका इतना पैसा लगाना सार्थक होता और फिल्म के व्यावसायिक रूप से हिट होने की सम्भावना भी बढ़ जाती। 

कुछ दशमलव प्रतिशत में ऐसे प्रयोग चल सकते हैं पर उन अपवादों में वाकई अनेक हुनर होते हैं जो दूसरों को बिना बताये दिख जाते हैं। हर जगह हीरो/हीरोइन बनने के पीछे ये दंभ होता है कि "हमें तो ऊपरवाले ने औरों से अलग ख़ास मिट्टी से बनाया है।" ये सोचने वाले भूल जाते हैं कि ऊपरवाले ने तो सभी को अलग बनाया है। इसी अहंकार के कारण ना जाने कितने महान काम होने से रह जाते हैं। खुद सोचें जब नयी सोच के साथ अपनी-अपनी विधा में दक्ष लोग साथ काम करेंगे तो क्या कमाल कर डालेंगे! बस श्रेय लेने के चक्कर में बात बिगड़ जाती है। अगर आप वाकई किसी नयी जगह श्रेय पाना चाहते हैं तो पहले उसमे उचित समय, मेहनत दें नहीं तो मन ही मन खुद को 56 बातों का हीरो माने लोग तो हर गली में बैठे हैं। काम में अपनी भूमिका को बढ़ाने या मुख्य बनाने के बजाय अगर काम के परिणाम को बेहतर बनाने पर ज़ोर हो तो भविष्य के कामों में अपनेआप व्यक्ति की भूमिका बड़ी होने लगती है। 

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Tuesday, December 12, 2017

कला में संतुलन की कला :) #Hindi_Article


“लाइफ इज़ नॉट फेयर”, ये प्रचलित कहावत है। मैंने पहले कई बार कलाकारों की दयनीय स्थिति पर बात रखी है। आज एक अलग सिरे से विचार रख रहा हूँ।  कलाकार अगर प्रख्यात हो जाये तो जीवन सही है और अगर ना हो तो लाइफ इज़ नॉट फेयर? नहीं! मैंने अलग क्षेत्रों के कई तरह के कलाकारों में एक बात देखी, जिसे शायद वो समझा ना पाएं। प्रख्यात होना बहुत से कलाकारों के लिए हानिकारक होता है। कई लोग लगातार अपनी कला में कुछ ना कुछ करते, उसके बारे में सोचते रहना चाहते हैं। प्रख्यात होने के बाद व्यक्ति को अवसर मिलते हैं, जीवन-यापन सुगम हो जाता है, पर उस स्तर पर आने के बाद व्यक्ति क्या खो देता है…

जब आपके हर काम पर जनता की नज़र हो और हर कला के पीछे किसी और के लाखों या करोड़ों रुपये लगे हों तो अपने आप दबाव बन जाता है। वो स्वच्छंदता जो इंडिपेंडेंट आर्टिस्ट के पास होती है, उसका काफी सीमा तक बलिदान देना पड़ता है। उदाहरण के लिए बड़े स्तर पर एक म्यूजिक एल्बम या किताब प्रकाशित होने पर उसके प्रचार-प्रसार, लोगों को उस किताब/संगीत के अवयव बार-बार समझाने में काफी समय व्यर्थ होता है। कई वर्षों तक ऐसा होने पर कलाकार अपने सक्रीय जीवन का (जब उसका मस्तिष्क और शरीर अच्छी हालत में रचनात्मकता का साथ देते हैं) बहुत बड़ा हिस्सा और शक्ति प्रमोशन, फॉलो-अप आदि गतिविधियों में बिता देता है।

कलाकार की रचनात्मक स्वतंत्रता केवल उसके लिए ही नहीं समाज के लिए महत्वपूर्ण है। सफल होने के बाद जुड़े लेबल, पैसे और औद्योगिक प्रतिबद्धता के सीमित दायरे में वह पूरी तरह अपनी मर्ज़ी का मालिक नहीं हो पाता। चाहे बाहर से वह अपने निर्णय लेता दिखे पर उसके अवचेतन मन में आ चुकी बातें अक्सर उसे रोक लेती हैं। साथ ही प्रयोगों के आभाव में एक कलाकार के रूप में उसका विकास धीमा पड़ जाता है। हालाँकि, छोटी संख्या में कलाकार ऐसे भी हैं जो इन दो बातों के बीच संतुलन बनाने में सफल हो जाते हैं। ये संतुलन पूर्णतः व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। ऐसा तभी संभव है जब कला को अपनी प्राथमिकता रखा जाए, चाहे व्यक्ति किसी भी स्तर पर पहुँच चुका हो।

इस नये कोण से बातों को देखने का आशय संतुलन बनाने का महत्त्व बताना था। याद रखें कला चलाये रखने के लिए कुछ हद तक सफलता भी ज़रूरी है। पैसों के अभाव, मजबूरियों में कला ही छोड़नी पड़े से बेहतर चाहे खालिस कमर्शियल ही सही कला का जारी रहना है। 

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Artwork - Richard F.
#ज़हन

Thursday, December 7, 2017

ख़बरों की ऊपरी सतह


एक नामी कलाकार हैं जिनका नाम नहीं लूँगा, जिनका नाम उनके काम से ना होकर उनकी मार्केटिंग और ब्रांडिंग से हुआ है। थोड़े वर्ष पूर्व अपने क्षेत्र में उन्होंने कुछ व्यंगात्मक काम किये जो देश की व्यवस्था, सरकार पर कटाक्ष थे। ये काम काफी जेनेरिक नेचर के थे यानी आज़ादी के बाद से हर रोज़ देश भर में ऐसे कई व्यंग बनते हैं, चलते हैं, प्रकाशित होते हैं...पर पता नहीं कैसे उनकी 'कला' पर किसी की नज़र पड़ी और उन्हें गिरफ्तार कर कुछ दिनों के लिए जेल भेज दिया गया। छोटी बात पर ना किसी का ध्यान जाता है और ना आसानी से गिरफ्तारी होती है। हाँ, अगर किसी को स्टंट करके करोड़ों की भीड़ (जिनमें हज़ारों ऐसे भी हैं जो वैसी कला बल्कि बेहतर कला दशकों से कर रहें है) से बिना 20-25 वर्ष की मेहनत एक झटके में ऊपर आना है...तो अलग बात है। गिरफ्तारी हुई और उसके फोटो फैले बाकायदा ऐसे जैसे फोटोशूट चल रहा हो। छोटी बात की कुछ दिनों की सजा काट साहब बाहर आये और तब तक ये ख़बर अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया पकड़ चुका था। वहाँ के लोगों ने बिना दिमाग पर ज़ोर डाले इस बात को 'तीसरी दुनिया' के देशों की बर्बरता की श्रेणी में रख दिया और ये कलाकार स्टार बन गया। टीवी, रेडियो पर आने लगा। अच्छी बात है, अगर प्रतिभा नहीं है तो स्टंट के दम पर कुछ समय के लिए ही सुर्ख़ियों में रहा जा सकता है। जो अच्छी बात नहीं हैं वो इसके बाद की है। बात ठंडी होने के बाद इन्होने समाज सुधारक का तमगा ले लिया और उसके आधार पर इनसे जुडी संस्थाओं को फंड मिलने लगे, ऐसी जगहों, आयोजनों पर ये "वक्ता" बन जाने लगे जहाँ विशेषज्ञ भी सोच में पड़ जाये। 

पहली आपत्ति - आम विचारों को स्टंट की आड़ में छुपाकर दार्शनिक बनना। 
दूसरी आपत्ति - दशमलव हुनर लेकर 95-100 प्रतिशत स्तर पर मौजूद कलाकारों की जगह वाली इज़्जत पाना। 
तीसरी आपत्ति - एक स्टंट के बल पर जीवन भर मुफ्त की खाना। 
चौथी आपत्ति - बाद में पैसे के दम पर 'ऑन रिकॉर्ड' काम के मामले में जाने कितने पहाड़ उखाड़ने वाले की तरह पहचाने जाना। 
पांचवी आपत्ति - इस सफलता के बाद बहुत से लोग इस तरह के शॉर्टकट लेने को प्रेरित होंगे।

किसी विषय पर मन बनाने से पहले ख़बरों की ऊपरी सतह को हटाकर ज़रूर देखें।
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Sunday, March 27, 2016

लेखकों के लिए कुछ सुझाव

हर लेखक (या कवि) अपनी शैली और पसंद के अनुसार कुछ रचना-पद्धतियों (genres) में अच्छा होता है और कुछ में उसका हाथ तंग रह जाता है। यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि कुछ विधाओं में लेखक अधिक प्रयास नहीं करता। समय के साथ यह उसकी शैली का एक हिस्सा बन जाता है। अक्सर किसी अनछुई विधा को कोई लेखक पकड़ता भी है तो उसमे अनिश्चितता और असंतोष के भाव आ जाते है। सबसे बड़ा कारण लेखक ने इतने समय में स्वयं के लिए जो मापदंड बनाए होते हैं, उनपर इस नयी विधा की लेखनी खरी नहीं बैठती। ऐसा होने पर लेखक रही उम्मीद भी छोड़ कर वापस अपनी परचित विधाओं की तरफ वापस मुद जाता है। अपने अनुभव की बात करूँ तो मुझे हास्य, हॉरर, ट्रेजेडी, इतिहास, ड्रामा, सामाजिक संदेश जैसे विषयों पर लिखना अधिक सहज लगता है, जबकि रोमांटिक या साइंस फिक्शन जैसी थीम पर मैंने काफी कम लेखन किया है। नयी श्रेणियों में पैर ज़माने का प्रयास कर रहे लेखकों और कवियों के लिए कुछ सुझाव हैं। 

*) - अपनी वर्तमान लेखन क्षमता, शैली और उसकी उसकी लोकप्रियता की तुलना नयी विधा में अपने लेखन से मत कीजिये। ऐसा करके आप नयी रचना-पद्धति में अपने विकास को शुरुआती चरण में रोक देते हैं। खुद को गलती करने दें और नए काम पर थोड़ी नर्मी बरतें। याद रखें बाकी लेखन शैलियों को विकसित करने में आपको कितना समय लगा था तो किसी अंजान शैली को अपना बनाने में थोड़ा समय तो लगेगा ही। 

*) - शुरुआत में आसानी के लिए किसी परचित थीम के बाहुल्य के साथ अंजान थीम मिलाकर कुछ लिखें। इस से जिस थीम में महारत हासिल करने की आप इच्छा रखते हैं उसमे अलग-अलग, सही-गलत समीकरण पता चलेंगे। थोड़े अभ्यास के बाद परिचित थीम का सहारा भी ख़त्म किया जा सकता है।    

*) - आदत अनुसार कहानी, लेख या कविता का अंत करने के बजाए उस थीम में वर्णन पर ध्यान दें। चाहे एक छोर से दूसरा छोर ना मिले या कोई अधूरी-दिशाहीन रचना बने फिर भी जारी रहें। इस अभ्यास से लेखन में अपरिचित घटक धीरे-धीरे लेखक के दायरे में आने लगते हैं। 

*) - यह पहचाने की आपकी कहानी/रचना इनसाइड-आउट है या आउटसाइड-इन। इनसाइड-आउट यानी अंदर से बाहर जाती हुयी, मज़बूत किरदारों और उनकी आदतों, हरकतों के चारो तरफ बुनी रचना। आउटसाइड-इन मतलब दमदार आईडिया, कथा के अंदर उसके अनुसार रखे गए किरदार। वैसे हर कहानी एक हाइब्रिड होती है इन दोनों का पर कहानी में कौन सा तत्व ज़्यादा है यह जानकार आप नए क्षेत्र में अपनी लेखनी सुधार सकते हैं।

 - मोहित शर्मा ज़हन 

Read रचनात्मक प्रयोगों से डरना क्यों?


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Monday, November 16, 2015

#Update


मेरी नयी बाल कहानी और लेख बागेश्वरी पत्रिका के नवंबर 2015 अंक में प्रकाशित। #मोहितपन #मोहित_ज़हन #mohitness #mohit_trendster #Bageshwari

Thursday, July 16, 2015

भूरा हीरो बनाम ग्रीक गॉड - मोहित शर्मा (ज़हन)

उम्र बढ़ने के साथ हम जीवन के विभिन्न पहलुओं में सामाजिक ढाँचे के अनुसार ढलते है और कभी-कभी ढाले जाते है। जैसे किसी देश में अगर मनोरंजन के किसी साधन या स्रोत पर पाबंदी है या प्रोत्साहन है वहाँ जनता की पसंद-टेस्ट उस अनुसार ढल जायेगी, यहाँ तक कि सामाजिक परिदृश्य को देखने में भी वैसा ही चश्मा पहना जाने लगेगा। दुनिया भर के मनोरंजन स्रोत देखने पर आप पाएंगे कि हर जगह कितना दूषितवर्गीकरण व्याप्त है साथ ही पश्चिमी देशो के गोरे वर्ण के लोगो को इतना अधिक इस तरह प्रोजेक्ट किया जाता है कि दुनिया में मानवजाति के वह सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। धीरे-धीरे समय के साथ हम बाकी किस्म के लोगो में भी वो मनोरंजन के साधन देखते-देखते यह बात और भावना घर कर जाती है। एक निश्चित सीमा और प्रारूप (format) के आदि हो जाने के कारण अगर उस से अलग या नया कुछ होता है तो कई लोग उसे सिरे से नकार देते है।

बाहुबली मेरे कुछ जानने वालो को सिर्फ इसलिए पसंद नहीं आई क्योकि ऐसे एक्शन और स्टोरीलाइन में वो गोरे रंग के ग्रीक गॉड मॉडल जैसे हीरोज़ को देखते आये है और यह दक्षिण भारतीय नायक प्रभास उन्हें जमा नहीं। यह नायक उन्हें किसी बॉलीवुड या स्थानीय मसाला फॉर्मेट में ही जमता। ऐसा शायद इस फिल्म के समापन भाग में अभिनेत्री अनुष्का शेट्टी को भी सुनने को मिले जो तब युवा अवस्था के किरदार में दिखेंगी। क्या इतना कड़ा है यह फॉर्मेट की आदत पड़ जाने का बंधन जो हम सौइयों अन्य बातों को भूलकर सिर्फ वर्ण या स्थान का रोना रोने बैठ जाएँ? मेहनत और प्रयोगो को सराहना सीखें क्योकि दुनिया के आगे बढ़ने में इन दोनों बातों का महत्वपूर्ण योगदान है। किसी ने टोका कि यह तो लोमड़ी के अंगूर खट्टे वाली बात हो गयी, भारत में ऐसे लोग मिलेंगे ही नहीं जो फॉर्मेट में फिट बैठे तो उन्हें बता दूँ कि भारत आपकी सोच से कहीं अधिक विशाल है, रैंडम देश के 15 - 20 शहरों का दौरा करें आपको हर तरह के प्रारूप के अनेको लोग मिल जायेंगे।

एक सम्बंधित एक्सट्रीम उदाहरण और उसका परिणाम भी बताना चाहूंगा, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अलग होने के पीछे भी यह भावना थी। वही भावना कि वह हमारे जैसे नहीं है तो हम में से एक कैसे होंगे? पाकिस्तानी नेतृत्व, भारत के दूसरी तरफ बसे अपने बंगाली भाग के नागरिको से दोयम दर्जे सा व्यवहार करता था (दोनों रीजन्स के विकास में बहुत अंतर था) और उनका मखौल सा उड़ाता था (regional, ethnic ego) जिस वजह से दोनों स्थानो में दरार बढ़ती चली गयी और बांग्लादेश अलग हुआ। अलग बातों, चीज़ों, लोगो के प्रति लचीला रवैया अपनाये, ज़रूरी नहीं कि अगर कोई प्रारूप अनदेखा है तो बेकार ही होगा।

- मोहित शर्मा (ज़हन)
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Wednesday, April 1, 2015

सपनो की एक्सपायरी डेट - मोहित शर्मा (ज़हन)


अपने सपनो के लिए जगदोजहद, मेहनत करते लोगो को देखना प्रेरणादायक होता है। एक ऐसा आकर्षण जिसकी वजह से हम फिल्मो, टीवी सीरियल्स से बंधे रहते है, उनके किरदारों में अपने जीवन को देखते है, ऐसा आकर्षण जिसके कारण कठिन समय में हम खुद को दिलासा देते है कि यह सब झेलने के बाद, यह वक़्त गुजरने के बाद हमे अपना सपना मिल जायेगा या उस से दूरी और कम हो जायेगी। कुछ ख्वाबो का महत्व इतना होता है कि उनके पूरे या ना पूरे होने पर जीवन की दिशा बदल जाती है, जबकि कुछ सपने बस किसी तरह अपनी जगह आपके ज़हन में बना लेते है - बाहर से देखने पर यह सपने बचकाने लगते है पर फिर भी अक्सर यह आपको परेशान करते है। 

व्यक्ति की आयु, परिस्थिति अनुसार सपने बदलते है, नए सपने इतने बड़े हो जाते है जो किसी उम्र के अधूरे-पुराने सपनो के आड़े आकर धुँधला कर देते है। मैंने कहीं सुना था कि सपनो को साकार करने का कोई समय नहीं होता जब साधन, भाग्य साथ हों तब उन्हें पूरा कर उनका आनंद लीजिए। पर जीवन तमाम चुनौतियाँ, उबड़-खाबड़ रास्ते लेकर आता है जिसके चलते निरंतर कुछ न कुछ सोचता दिमाग उन बिन्दुओं से काफी आगे बढ़ चुका होता है।  

अपना ही उदाहरण देता हूँ। मुझे बचपन से ही प्लेन में बैठने बड़ी इच्छा थी पर समस्या यह थी कि उस समय लगभग सभी करीबी रिश्तेदार दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के सीमावर्ती शहरों में रहते थे जहाँ 100 से 600 किलोमीटर्स के दायरे में होने के कारण अगर कोई आपात्कालीन स्थिति ना हो तो वैसे शादी आदि समाहरोह में पहुँचने के लिए साधनो में एरोप्लेन से पहले वरीयता ट्रैन, बसों को मिलती है। ऊपर से मध्यमवर्गीय परिवार तो 90 के दशक में टीवी पर ही प्लेन देखकर खुश हो लेता था। (अब घरेलु यात्रा हवाई टिकटों के दामो में काफी कमी आयी है खासकर पहले बुक करने पर, कभी-कभी तो बहुत लम्बी दूरी की हवाई यात्रा ट्रैन यात्रा से सस्ती पड़ती है) तो स्थिति यह रही कि बचपन से किशोरावस्था आई, जिसमे हवाई यात्रा की प्रबल इच्छा बनी रही पर कभी ऐसा मौका नहीं बना। वर्तमान में जहाँ सक्रीय हूँ यानी मेरठ, दिल्ली इनकी दूरी 70-75 किलोमीटर्स है और अब तक प्लेन में नहीं "घूमा"। 

पर अब वो सपना मर गया है, इच्छा कहीं गुम हो गयी जैसे उसकी एक्सपायरी डेट निकल गयी हो। किसी समय एक बच्चे की जो सबसे बड़ी विश होती थी जिसके लिए वो भगवान जी से प्रार्थना करता था, आज उसके पूरे होने ना होने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। उल्टा चिढ होती है, बेवजह गुस्सा आता है इस ख्वाईश के कभी याद आने पर। अब अगर कभी हवाईजहाज़ में बैठने का अवसर मिलेगा तो मन किसी प्रौढ़ उधेड़बुन में लगा होगा, रूखी आँखों में उस बच्चे या किशोर की चंचलता नहीं होगी जो अक्सर सपनो में प्लेन में बैठकर दुनियाभर की सैर कर आता था। 

कुछ सपनो का पूरा होना आपके हाथ में होता है और कुछ का भाग्य पर निर्भर। अपने बस में जो बातें हो उन्हें प्रगाढ़ता से पूरा करें ताकि इच्छाएँ मरने या बदलने से पहले....सपनो की एक्सपायरी डेट से पहले वो पूरे हो जायें।  :) 

 - मोहित शर्मा (ज़हन)
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Wednesday, March 4, 2015

झूठ की नोक पर बंदी भारत - मोहित शर्मा (ज़हन)


Note - वैसे तो आर्टिकल में मीडिया की आलोचना है पर आशय मुख्यधारा, बहुसंख्य मीडिया से है। इस क्षेत्र में भी हर जगह की तरह अच्छे, ईमानदार लोग, संस्थायें भी है। 

क्या भारत दुनिया के सबसे अच्छे राष्ट्रों में है? नहीं! क्या भारत दुनिया के सबसे बुरे देशो में है? नहीं! भारत लगभग हर पक्ष में कहीं बीच में है। तकनीक, पर्यटन, विकास, खेल, अपराध सब में। फिर कैसे हमे हिंसक अपराधो, महिला के विरुद्ध अपराधों, घोटालो जैसे मुद्दों में सबसे शीर्ष पर आ जाते है? कैसे पूरे विश्व की कैपिटल बन जाते है इन आपराधिक, अनैतिक मामलो में? मैं मानता हूँ कि अपराध से, बुराई से लड़ाई तेज़ होनी चाहिए और भारत में बहुत से सुधारों की आवश्यकता है पर हर पक्ष में योजनाबद्ध तरीके से, "कोसनाबद्ध" तरीके से नहीं। 

भारतीय मीडिया के बहुसंख्य हिस्से में एक ट्रेंड चला है पिछले कुछ वर्षो से जो मुझे चिंतित कर रहा है। हैरतअंगेज, होश उड़ा देने वाली, घृणित कर देने वाली ख़बरों को वरीयता 
देना। साथ ही देश और उस से जुडी बातों को कोसना। बाकी नियमित स्तर पर इतने विशाल देश से आयी सामान्य-अच्छी ख़बरें, उपलब्धियाँ इन "चौंका" देने वाले खुलासों में कहीं खो जाती है। परेशानी यहीं ख़त्म नहीं होती अक्सर घटनाओं से अधिक कवरेज बड़े लोगों के बयानों को मिलती है की फलाना ने फलाना बोलकर फलाना मानसिकता दर्शायी। देश में विचारों को व्यक्त करने की आज़ादी है और अगर वो बयान किसी के प्रति हिंसा नहीं फैला रहे (जो अधिकतर होता है) तो आप क्यों ठेकेदार बन रहे हो किसी के एक बयान के बल पर उसका पूरा व्यक्तित्व नापने वाले? आप जो खुद कॉर्पोरेट्स आदि निजी हितों से प्रायोजित ख़बरें दिखाते फिरते हो। वह भी एक इंसान है और कम से कम असली इंसान की हर मामले में नपी-तुली राय हो ही नहीं सकती। 

दूसरी बात जो मैं अक्सर दोहराता हूँ की लगभग 130 करोड़ के देश मे दशमलव प्रतिशत अपराध भी बाकी छोटे देशो के मुकाबले बड़े लगेंगे पर इसका मतलब यह नहीं की अपराधों के मामले में भारत पहले नंबर पर है। दुनिया के 200 कुछ देशों में अपराध दर में भारत कहीं बीच में है, 147 देशो के उपलब्ध डाटा में भारत का स्थान 72वां था, अगर सभी देशो से रिकार्ड्स आते तो भारत 100 की संख्या पार कर जाता, यानी भारत से अधिक अपराध दर वाले दर्जनो देश है। पर खबर पहले दिखाने का, सेन्शेसनलाइज़ करने का ऐसा भूत सवार है न्यूज़ चैनल्स, प्रिंट न्यूज़ मीडिया को कि ख़बरें वेरीफाई करना तो दूर, ख़बरें ईजाद तक कर दी जाती है। दिक्कत खबरें देने से नहीं है, दिक्कत है एक आपातकाल, मुसीबत का माहौल दिखाते रहने कि है। जिस से आम जन में पूर्वाग्रह बनने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक असर बैठता है, देश और लोगो के लिए हिकारत की भावना आती है की "मैं तो अच्छा/अच्छी हूँ, दुनिया बुरी है, और ऐसे लोग के साथ ऐसा ही होना चाहिए।" तो पहली बात देश, समाज उतना बुरा नहीं है जितना समय के साथ आपके मन में बैठा दिया गया है। हमारे विशालकाय देश का 2-3 प्रतिशत ही ऑस्ट्रेलिया की जनसँख्या से अधिक है, बाकी आप खुद समझदार है। तो अगली बार कोई संख्या देख कर पूरी जाँच कीजिये हल्ला काटने से पहले। 

अब इस एमरजेंसी के माहौल का पहला नुक्सान विदेशों में यह ट्रेंड कम है तो जब कोई देश खुद ही अपनी खिल्ली उड़ाए तो कंटेंट और वैरायटी के लिए यहाँ का "कोसना" वहाँ स्थानांतरित हो जाता है। तभी जिन देशो में भारत से ऊँची अपराध दर है वो तक हमारे ऊपर डॉक्यूमैंटरीज़, स्टोरीज, कार्टून्स, न्यूज़ रिपोर्ट्स दिखा कर अपनी जनता का ध्यान बँटाकर, अपनी सरकाओं की मदद करते है। 

दूसरा घाटा...कानून, संविधान, नीतियों के गलत बनने से होता है क्योकि समय के साथ लगातार ऐसी ख़बरों से गलत दबाव बनता है सिस्टम पर। फिर जल्दबाज़ी में गठित कानून, संवैधानिक बदलाव एक बड़े वर्ग को नुक्सान पहुँचाने लगते है। साथ ही वर्गों, स्थानो, लोगो के बीच पूर्वाग्रह, नकारात्मक वर्गीकरण बढ़ने लगता है I जिसमे वो अधपकी, अधूरी जानकारी के आधार पर फैसला सुनाकर पब्लिक ट्रायल से दबाव बनाते है। 

पर प्रोपोगंडा नहीं होगा, हल्ला नहीं होगा तो चैनल्स को दर्शक, विज्ञापन और स्पोंसर्स कैसे मिलेंगे? कागज़ पर चलने वाली या खानापूर्ति को स्टोर रूम में ऑफिस खोले हज़ारो स्वयंसेवी संस्थाओं को जनता, सरकार और विदेशी डोनेशन, ग्रांट्स कैसे मिलेंगी? विनती कुछ गलत होने पर हल्ला ना करने की नहीं है, बल्कि जितनी बात है उस स्तर का हल्ला करने की है। अपराध, अनैतिकता के खिलाफ आवाज़ और एक्शन दोनों ज़रूरी है पर कायदे में। अपने प्रतिद्वंदीयों को हराने की होड़ में देश की छवि तो धूमिल ना करें। मुझे गर्व है कि मैं समृद्ध विरासत वाले विविध देश भारत का नागरिक हूँ और सामान्य जीवन जीने वाले उन देशवासियों कि मेजोरिटी का हिस्सा हूँ जो खबरों के मामले में आपके मानको पर बोरिंग बैठते है, पर उनको दिखाये बिना भारत में त्राहि-त्राहि की तस्वीर दुनिया पर प्रोजेक्ट करना मेरे लिए किसी जघन्य अपराध से कम नहीं क्योकि क्योकि एक भारतीय होने पर गर्व की बात या भारत से जुडी कोई भी बात जिसमे अपराध का ज़िक्र ना हो सुनते ही बिना आगे कुछ सुने लोग हँसने लगते है या मुँह मोड़ लेते है। बाकी चीज़ों में तो पता नहीं पर देश को कोसने और हल्ला काटने में हम नंबर एक है। 

- मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohitsharma #mohit_trendster

Saturday, February 21, 2015

बदलते दौर में स्थाई सवाल! II लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


जैसा अपने बड़ो से सुना और जितना समझा उसमे एक बात गौर की, पहले संसाधनो-सुविधाओं की कमी थी पर जनता में धैर्य और दूसरो के लिए आदर था। एक  बुज़ुर्ग गाइड ने बताया कि पहले विदेशी पर्यटकों के लिए आम जन में सम्मान, आत्मीयता का भाव रहता था। बाहरी लोगो को अपनी संस्कृति दिखाने की ललक रहती थी। इसलिए हर टूरिस्ट मैन्युअल, डाक्यूमेंट्री आदि में यह ज़रूर बताया जाता था कि भारत का अनुभव लिए बिना घूमने का तो दूर ज़िन्दगी का अनुभव अधूरा है। विदेशी लोगो के कोतूहल का विषय यह भी रहता था कि किस तरह सादे जीवन में अधिकतर भारतीय इतनी सारी खुशियाँ ढूँढ लेतें है? 


आज के दौर की बात करें तो उन्होंने बताया कि जनसँख्या के मुद्दे के अलावा लोगो में वो आदर, आत्मीयता के भाव कहीं लुप्त हो गए है। सबको अपनी काबिलियत, हुनर से ज़्यादा पैसा चाहिए और विदेशी उनके लिए इंसान ना होकर चलते-फिरते नोटों की गड्डी बन गए है, लालच में अंधे हम सब, अपने देश से उनका यहाँ आने का आनंद, मुसीबत और सरदर्द में बदल देते है। ऐसा नहीं है की पहले ये सब नहीं होता था पर तब यह संख्या नज़रअंदाज़ करने लायक काफी कम होती थी। शायद इसी वजह से चुन्नू-मुन्नू द्वीप समूहों वाले देशो तक में भारत से ज़्यादा पर्यटक आते है। ऊपर से हमारे द्वारा अपनी संस्कृति का पूर्ण परित्याग कर देने से उन्हें यहाँ का जनमानस उनकी संस्कृति का दोयम दर्जे का घटिया प्रतिबिंब लगता है। अब आप यह कहें की समय के साथ बदलना चाहिए तो मैं सहमत हूँ पर यह बताइये क्यों कई हर मायने में विकसित देश अपनी भाषा, संस्कृति को महत्व देते है और फिर भी समय-समय पर नयी तकनीक, तरीके अपना लेते है? दोनों बातें साथ भी चल सकती है, मॉडर्न बनने की होड़ में अपनी पहचान की बलि क्यों देना, उसे हेय दृष्टि से क्यों देखना?  सुधार की कोशिश के बजाये सिर्फ कोसते ही क्यों रह जाना?
#mohit_trendster

Sunday, January 11, 2015

कॉमिक्स शास्त्र अगर होता तो... - मोहित ट्रेंडस्टर

अगर कॉमिक्स की भी स्कूली शिक्षा होती तो कुछ यूँ नज़ारे देखने को मिलते। 


*) - पेरेंट्स-टीचर मीटिंग 

अभिभावक 1 - लड़का तो पूरे दिन पढ़ता रहता है फिर नंबर क्यों नहीं आते इसके कॉमिक्स शास्त्र में ?
शिक्षक - जी, ध्यान सिर्फ तौसी, गमराज औऱ क्रुकबांड जैसे ग्रेडिंग सब्जेक्ट के कैरक्टर्स में रहता है नालायक का ! चाचा चौधरी, नागराज,  डोगा, अघोरी के पन्ने पलटना तो जैसे पाप है इसके लिए, तो आप ही बतायें, नंबर कहाँ से आएंगे इसके? 

अभिभावक 2 - आप यह बताईये गुप्ता जी कि जब जम्बू, फैंटम, प्रेत अंकल और काली विध्वा CBSE ने कोर्स से हटवा दिए पिछले साल तो आप लोग बच्चो से ज़बरदस्ती उनकी किताबें और मरकंडाइज़ क्यों खरीदवा रहें है? लूट मचा रखी है! ऊपर से तिलिस्म देव को आपने आधा चैप्टर दे रखा है और Marvel, DC 3 headings में निपटा दिए! मैं RTI फाइल करूँगा। 

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*) - एक लड़की - आई लाइक नागपाशा बट उसमे फरसा वाला चार्म नहीं है।  
अनेक लड़की - Awwwwwww........

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*) - एग्जाम के बाद लड़को का ग्रुप पेपर डिस्कस करता हुआ। 

"यार टीचर पगला गये है। इंस्पेक्टर स्टील पर 15 नंबर का लोंग question दे दिया और चंडिका पर 2 नंबर का शार्ट, फिर कहते है मार्क्स कम क्यों रह गये...." 
"हाँ! तिरंगा की जीवनी पूछ ली। अब उसमे लिखने को है ही क्या? उस से ज़्यादा तो फूजो बाबा के एडवेंचर्स है।"

"अब तो आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ नागराज के आगे फिल इन थे ब्लैंक्स में क्या भरा?"
"पुराने चैप्टर्स मैंने नहीं देखे, अपने से राइम बना दी - 'अब तो आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ नागराज....शेक योर एज़ ! भाई शेक योर एज़ !' यार, इसके बाद यही राइम सही बैठ रही थी।"
"अरे उल्लू ऐसा थोड़े था, ये था - 'अब तो आ जाओ, आ जाओ, आ जाओ नागराज....हमको तेरी ही है एस....आई मीन आस, हमको तेरी ही है आस!"

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*) - एक लड़की - यार नयी कॉमिक में आई noticed बौना वामन की ऐब्स, एंड आई was लाइक OMG !
एक और लड़की - वो तो कुछ भी नहीं एक विंटेज एड में जादूगर शकूरा के किलर कट्स है with 8 पैक ऐब्स और जब वो मुंडी टिल्ट करके डायलॉग देता है, इट्स  जस्ट...जस्ट आई गो वीक इन माई नीज़ !
अनेक लड़की - Wowwwww....

- Mohit Trendy Baba

Saturday, March 1, 2014

आपको कला का वास्ता...Mohitness

Pic Pichhle Mahine li....posts mey thumnail k vaaste :p

अभी हाल में आयी इम्तियाज़ अली कि फ़िल्म 'हाईवे' को मिलती प्रशंषा देख रहा हूँ। आज इस पर ही कुछ लिखना चाहता हूँ, अक्सर लोगो को किसी फिल्मकार, कलाकार को पूजते, अपना आदर्श मानते देखता हूँ तो अच्छा लगता है कि कला कि कद्र करने वाले कितने लोग है। पर इंटरनेट के इस ज़माने में अंधभक्ति मुझे बिलकुल समझ नहीं आती। ज्यादा समय न लेते हुए बता दूँ कि हाईवे, २० साल पहले आयी एक हॉलीवुड पिक्चर "द चेज़" से लगभग पूरी तरह उठायी गयी है - दृश्य, किरदार यहाँ तक कि घटनाओं का क्रम एवम परिस्थितियाँ और ऐसा पहली बार नहीं है इनके द्वारा - "जब वी मेट (2007)', 1995 में आयी फ़िल्म "ए वाक इन द क्लाउड्स' कि चोरी थी, 'लव आज कल (2009)' - थ्री टाइम्स, 'रॉकस्टार (2011)' - द डोर्स (1991) बाकी बची इनकी 2-3  फिल्मे मैंने  देखी नहीं पर आप इंटरनेट सर्च कर सकते है और जवाब खुद मिल जायेंगे आपको। मेरी या नेट पर किसी कि बात ठीक ना लगे तो खुद यह फिल्म्स देखें और निर्णय लें।

एक होता है अपने अनुसार प्रयोग कर कुछ नया करना (जो बहुत कम होता है पर होता है), एक होता है रीमेक के अधिकार लेकर फ़िल्म बनाना, एक होता है कि किसी आईडिया से प्रेरित हो उस तरह का कुछ पर फिर भी अपने इनपुट्स से काफी अलग फ़िल्म बनाना और एक बेशर्म कॉपी जिसमें नाम के लिए कुछ सीन अलग रहें ताकि रीमेक के अधिकार का जो कुछ प्रतिशत असल मूवी बनाने वालों को देना पड़ता वो भी बच जाए....उल्टा देखने को मिलता है कि ऐसे व्यक्तियों को सबसे ज्यादा नाम, सराहना और पुरस्कार मिलते है। इम्तियाज़ अली या उन जैसे और निर्देशको को आप किस श्रेणी में रखते है यह आप पर छोड़ता हूँ।

मेरा निवेदन है

*) - आपको मनोरंजन चाहिये, लीजिये - ऐसे व्यापारियों को पैसा दीजिये ठीक! कोई दिक्कत नहीं, क्योकि इनकी यूनिट में कई लोग होते है जिन्हे ये काम देते है - बाकी फ़िल्म कि वजह से देश भर मे वितरकों से लेकर पॉपकॉर्न मशीन वाले तक कमर्शियल मूवीज़ कि जनता पर निर्भर है। 

*) - पर दिक्कत मुझे तब होती है जब आप इन व्यापारियों को दूरदर्शी कलाकार, समाजसेवी  कहकर इन्हे इज्जत देते है, पूजते है-अपना आदर्श मानते है। रिसर्च कीजिये (जो इतनी मुश्किल नहीं है, नेट पर कुछ क्लिक्स काफी है)।

*) - कई फ़िल्मकार, कलाकार मूलभूत मुद्दो, नए मुद्दों पर फिल्मे बनाते है जिनका इतना प्रचार नहीं होता पर आप अगर मध्यम वर्ग से है और थोड़े पैसे खर्च कर सकते है तो वो फिल्मे आप देख सकते है। ऐसी फिल्मो को भी  बढ़ावा दें, ऐसे कलाकारों पर भी अपना पैसा लगायें। ताकि इनकी संख्या और नाम भी बढे!

हाईवे मे काफी सम्भावनायें थी उसकी दिशा अगर पहले से जाँची परखी राह पर ना जाकर अपने इनपुट्स से कि तय कि जाती, इसमें एक सामाजिक पहलु है जिसकी मैं सराहना करता हूँ पर वहाँ भी इतना स्कोप होते हुए भी बस उसको छू भर लिया गया। पर मैं पूरा निश्चिन्त हूँ कि इस मूवी को अधूरा बताने वालों को या निर्देशक निंदा करने वालो को कई लोग छोटी मानसिकता वाला करार दे देंगे।

- Mohit Sharma (Trendy Baba / Trendster)

Monday, January 20, 2014

Online Community - 421 Brand Beedi Federation

421 Brand Beedi Federation, a community blog & online group of people & their audience who post Multilingual Previews, Reviews, Interviews & Point of Views of/for/with/about various products, movies, books, people, things & events...we try to be as random as possible.

*) - Blog: 421 Brand Beedi Federation 

*) - FB Page: 421 Brand Beedi Federation | Facebook

*) - Partner Groups: Freelance Talents, Spandan, Indian Comics Fandom. 

Founded - September 2012

            Contributors

Friday, September 6, 2013

मेरे लिए आस्था, तुम्हारे लिए डर.....



मेरठ में घर के पास एक शांत स्थान है जहाँ आस-पास शिव जी-दुर्गा माता का एक मंदिर, शनि देव का मंदिर, हनुमान जी का मंदिर और साईं बाबा की कुटी है। वहाँ सोमवार को शिव भक्तो का जमावड़ा रहता है, मंगल को बजरंग बलि महाराज के भक्तो का गुरूवार को साईं बाबा को मानने वालो की भीड़ रहती है और शनिवार को शनि देव और हनुमान जी के भक्तो की। 

तो एक शनिवार मेरा एक नास्तिक दोस्त मेरे साथ था और हमे थोडा समय लग गया सड़क पर भक्तो की भीड़ से निकलने मे। दोस्त ने कहा की सब नौटंकी है, ये लोग आस्था या श्रद्धा से नहीं आते बल्कि डर से आते है की शनि देव सब भला करें इनका या शिव भगवान, बजरंग बलि इनके किये पापो से छुटकारा दे दें इनको। उसने मुझसे पूछा इस सबमे कोई भी सकारात्मक बात है या सब पाखण्ड है। 

अब आजकल एक तो फेशन बन गया है भगवान की बेईज्ज़ती करना और खुद को नास्तिक बताना। उसको भगवान के बारे मे समझाना व्यर्थ था इसलिए मैंने इस भीड़-जमावड़े से जुडी सकारात्मक बात बताई उसको।

मैंने कहा यहाँ रास्ते मे दर्जनों गरीब परिवारों को ये भक्त लोग (चाहे भगवान के डर से या आस्था से) खाना, प्रसाद और पैसे देते है, जिस से इतने सारे गरीबों का जीवन चलता है सिर्फ यहाँ ही नहीं देश भर मे। उसने तुरंत कहा की ऐसा तो हफ्ते के 3-4 दिन ही रहता है बाकी के दिनों का क्या? अगर भक्ति करनी ही है तो उसके लिए कोई दिन या समय निश्चित करने से क्या फायदा? जब मन आये तब
करो पूजा, भक्ति। इसपर गृह-नक्षत्रो की बात करता तो फिर वो प्रूफ मांगता इसलिए मैंने यहाँ भी उसी की जुबां मे बोलना ठीक समझा। 

मैंने कहा तुम्हारी बात सही है बिना दिन-समय देखे भी भक्ति करने वाले बहुत से लोग है रही आम जनता की बात तो उनका यह डर या नियत समय पर किसी ख़ास देव की पूजा अर्चना करना भी इन गरीबों के हित मे है। कैसे? ये मानवीय सोच है उसका व्यवहार है ...जैसे अधिकतर बच्चे परीक्षा की तिथि आने पर ही पढना शुरू करते है, अगर कुछ नियत न हो तो दिमाग मनुष्य को दिलासा देता रहता है की अभी तो काफी समय है आराम करो। इसी तरह ज़्यादातर लोगो को अगर ये बताया जाए की रोज़ हर बड़े देव या अपने इष्ट देव-देवी की पूजा-आराधना करो तो दिनचर्या समझ कर वो इसको गंभीरता से नहीं लेंगे और जो हफ्ते मे 4 दिन ये गरीब सही से खा-पी लेते है वो भी अनियमित हो जाएगा, और सिर्फ बड़े त्योहारों तक सीमित होकर रह जाएगा। पर जब उनके इष्ट देव के लिए हफ्ते मे एक ख़ास दिन निश्चित होता है तो वो अपने देव को खुश करने के लिए वो सही से पूजा करने के अलावा दान पुण्य भी करते है जिस से इन गरीबो का और आस-पास पूजा से जुडी सामग्री बेचने वालो का भला करते है। कुछ स्थान ऐसे भी है जहाँ हफ्ते के सातो दिन मेला सा लगा रहता है और हर दिन किसी ख़ास भगवान् मे आस्था रखने वाली या तुम्हारी भाषा मे डरने वाली भीड़ इन गरीबो का, दुकानदारों का भला कर जाती है।

- मोहित शर्मा (ट्रेंडस्टर / ट्रेंडी बाबा)

Saturday, August 17, 2013

Difference between Copied Product & Unique Product

As per few of my friends "Everything created these days is copied...everyone copies." Such statements are insult to those people who work their hearts out in creative fields. Now please consider few examples.



*) - If everyone copies then by that logic Music Directors like Pritam or Anu Malik or Bappi Lahiri should be as great as AR Rahman.....NO!! because he and his team work hard to find unique permutations and combinations instead of lifting music from around the world.

*) - *Hypothetical* You want to make a Political Thriller movie. Now, mainstream Bollywood chooses copied themes, story plots. Political movies similar to USA or big European nations scene are done to death all over the word ...so a lot of stats on the Box Office Response, Critics, Budget etc are already there...for me adapting all that in your country's backdrop is no big deal. Now, many Hollywood as well as independent movie makers take risk and cover Historical Fiction stories on roads less (or not at all) traveled...like Political scenes of not so mainstream countries like Fiji, Moldova..(this is new, this is trying unique permutations-combinations)...if these risks are commercially successful then shameless Bollywood camps, big production houses copy the theme or even scene-by-scene copy the movie (this is copy, no excuse). Artist-Author Mr. Sumit Kumar while reviewing a story in Freelance Talents Championship wrote - "World is a complex place, there are so many stories which have never been told. Holocaust has been done to death - something similar could be the mass killings in Mizoram in 60's. You could write about that."

*) - I agree that volume of creative work, art created over thousands of years is humongous but still there are countless unused permutations-combinations...I guess the commercial barriers restrict people to try something new, unique and they chose 'tried and tested' safe paths over an over again...maybe thats why often a 2 minute trailer can remind 4-5 movies or books to even a casual fan....So, please respect the brainstorming, several experiments few people do to bring those unseen probabilities to life.

P.S. Jab itna paisa aur mehnat casting, shooting mey kharch kar rahe ho to thoda sa story mey bhi kar lo...

Image Source - Koleksi Stiker Atau Logo (Deltakomputer-kediri.blogspot.com)

Tuesday, June 25, 2013

देश की कमज़ोर दूर की नज़र




बसे पहले तो उत्तराखंड त्रासदी में निस्वार्थ और निरंतर लगे सेना के जवानों, अर्धसैनिक बलो और जुडी एजेंसियों को नमन और धन्यवाद। अब मुद्दे पर आते है।

देश में आम लोगो की एक ख़ास आदत है। किसी आपदा, या राष्ट्रीय सुर्खियों में आयी घटना, अपराध  से हर चीज़ अतार्किक रूप से जोड़कर देखी जाने लगती है तब तक जब तक कोई अलग, नयी घटना उन सुर्ख़ियों में ना आ जाये। अक्सर ऐसे मामलो मे पता चलता है की जनता के एक बड़े हिस्से की दूर की नज़र कमज़ोर है। हाँ ये दुर्भाग्यपूर्ण है की एक त्रासदी घटी पर उसके कारको को हटाने पर काम की बजाये दोषारोपण, हर बात मे उस दुखद घटना को घुसा देना कितना सही है?

जैसे एक कॉमिक फैन ने बाइस हज़ार की कॉमिक्स खरीदी तो उसे ऑनलाइन ये नसीहतें/ताने दिये गये की उत्तराखंड त्रासदी मे दान करना चाहिये था। क्या जो कलाकार अपने घरों से इतनी दूर आकर मेहनत कर रहे है उन्हें और उनके परिवारों को जीने के लिए पैसो की ज़रुरत नहीं? उस त्रासदी के अलावा कहीं कश्मीर मे जवानों के काफिले पर आतंकी हमले में 8 जवान मारे गए और कुछ घायल हुए ...इसी तरह और छोटी-बड़ी दुखद घटनायें हुयी .....क्या उन घटनाओ के पीड़ितों को मदद की ज़रुरत नहीं? बिल्कुल है पर आपको तो महीनो एक घटना के तले जो काटने की आदत है। 

देश एक मशीन की तरह है जिसकी इकाइयाँ अपने क्षेत्र के काम करने में माहिर है, सब रुक कर एक दिशा मे जायेंगे तो देश रुक जाएगा जिस से और अधिक पीड़ित होंगे। वैसे कहने वाले कह बड़ी आसानी से देते है पर अगर देखा जाए तो उस दिशा में सबसे कम योगदान ऐसे ही लोगो का होता है। प्रकृति पर किसी का बस नहीं चलता पर खुद को व्यतिगत रूप से बदलकर अपने आस-पास के समाज को बदलने की कोशिश कीजिये, सही लोक उम्मीदवार चुनिए। इस से ज्यादा करना चाहते है तो पहले उस स्तर तक पहुँचिये जहाँ से लोगो की मदद कर पायें आप। नीचे से कोसना या बंदर घुड़की देना कुछ न करने के समान है।

- Mohit

Sunday, April 28, 2013

नकलची समाज (भाग - 2)

नक़ल आज के दौर में विकराल रूप ले चुकी है, समाज में इतनी रच बस चुकी है कि अब इसे लोगो ने स्वीकार कर लिया है। किसी को बताया जाए कि भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए भेजी गयी एंट्री "बर्फी" में 3 दर्जन से अधिक फिल्मो के दृश्य जस के तस दिखाए गए थे दूसरे कलाकारों पर फिल्माने के बाद तो वो कहता है की कोई बात नहीं हमे तो मज़ा आने से मतलब है और इस्सी मानसिकता का फायदा फिल्मो, लेखन में ही नहीं विभिन्न माध्यमो पर लोग उठाते है। मै चौंक जाता हूँ की खुले आम नक़ल के बाद लोग प्रमोशंस, साक्षात्कार, आदि के दौरान इतने आत्मविश्वास से कैसे कह लेते है कि ये एक अलग काम है, हटकर है।

संयोग से कहानी का कुछ हिस्सा कहीं पहले लिखी रचना से मिल जाना कोई बड़ी बात नहीं, ऐसे केसों में रचनाओ को देख कर पता चल जाता है की ये संयोग है कॉपी नहीं, और ऐसी रचनाओं से मुझे कोई आपत्ति नहीं है, ये रचनाएँ खुद मे नयी और अलग है। मेरी कुछ रचनाएँ ऐसे सामाजिक मुद्दों पर लिखी गयी थी जिन मुद्दों पर आगे चलकर कुछ सालो बाद फ़िल्में, नाटक, आदि बने जो बहुत से लोगो तक पहुंचे पर मेरी रचनाएँ संयोग से उन मुद्दों पर होते हुए भी काफी अलग थी। कई लेखक या कवियों से मिला हूँ और काफी बातें की है। वो अक्सर बाहरी देशो की तरफ देखते है, विदेशी फ़िल्में, कॉमिक्स, गेम्स, किताबें, विडियोज़ देखने मे अपना काफी समय व्यतीत करते है। फिर उनके अनुसार ही अपनी रचनाएँ बनाते है।

जनता की मांग का हवाला देकर प्रकाशक ऐसा करते है। पर एक समय मे अगर बड़े प्रकाशक नया काम छापें तो लोगो के पास वही ऑप्शन होते है। कुछ पेशेवर लेखक या कवि कहते है उन्हें उनका परिवार पालना है इसलिए सीधी चोरी करते है पर जब आपमें क्षमता ही नहीं थी तो लेखन मे आये ही क्यों? नक़ल बस एक शॉर्टकट है नया, अलग काम करने मे समय लगता है जबकि कहीं से उठाया गया कांसेप्ट जल्दी पूरा हो जाता है, इस वजह से एक लेखक अगर नक़ल से साल मे 10-15 या ज्यादा किताबें पूरी कर पायेगा वहीँ बिना नक़ल किये अपनी क्षमता से वो 5-10 किताबें लिख पायेगा। पर अगर वो दूसरे माध्यमो पर से अपनी निर्भरता हटाये और मेहनत करे तो ये संख्या बढ़ सकती है, दुर्भाग्यवश ऐसा करते ना के बराबर लोग है।

कई लेखकों का भाग्य अच्छा है की जहाँ से वो अपना काम उठाते है वो मेटर आम जनता (जहाँ उनका काम बिकता है) में इतना लोकप्रिय नहीं है और उनकी गाडी सालो तक चलती रहती है। लोग कहते है कि वो महान है तभी तो इतने साल काम किया जबकि इतने सालो मे "असली" काम साहब ने गाहे-बगाहे मूड बदलने को किया होगा। चलिए पैसे और परिवार चलाने जैसे इमोशनल चोचले मान भी लें तो जिस कांफिडेंस के साथ कुछ बड़े, "अनुभवी" लेखक चोरी करने के बाद हज़रो-लाखो लोगों द्वारा अपना अभिनंदन, तारीफ़ स्वीकार करते है तो घृणा होती है इनसे। चलो काम का प्रोमोशन कर लो, अपना काम बेच लो पर जिस से चुराया है उसके सम्मान में कम से कम अपना कुत्ते की तरह प्रोमोशन तो मत करो हो सके तो असल सोर्स लिख दो काम की (ये तो करना यहाँ निषिद्ध मानते है लोग)। कहावत है की सच्चाई, कल्पना से अधिक अजीब होती है .....असल समाज से प्रेरणा लो, सच्चाई से कल्पना बनाओ, अनछुई बातें और पैटर्न ढूँढो, नए काल्पनिक समीकरण बनाओ। अगर प्रकाशक का आप पर इतना प्रेशर है तो उसके हिसाब से काम कर दो पर बीच में "अपना" काम भी दिखाओ .....अगर ऐसा नहीं कर सकते तो खुद को कलाकार, रचनाकार मत कहो। शायद यही कारण है जो मुझे ऐसे कलाकार बहुत कम मिलते है जिन्हें अपनी कला से प्रेम हो और जो अपनी कला के प्रति इमानदार हों। मेरा निवेदन है पाठको, दर्शको यानी आम लोगो से कि कला को प्रोत्साहन दीजिये पर चोरी को नहीं क्योकि कहीं न कहीं आपका प्रोत्साहन और खर्च किया हुआ पैसा ही है जो कलाकारों को चोरी की लथ लगवा देता है।

- Mohit Sharma ( Trendster)

Wednesday, April 24, 2013

नकलची समाज (भाग - 1)

नकलची समाज (भाग - 1)



रचनात्मक कार्यो में मुझे नक़ल से सख्त नफरत है और ये बात मैंने पहले भी अपनी रचनाओ, लेखों में रखी है। मेरे कुछ अच्छे दोस्तों ने मुझसे कहा कि उन्हें नक़ल/चीटिंग का मतलब समझाऊँ। तो इन दो लेखों से समझाने की कोशिश करता हूँ, पहली कड़ी आज लिख रहा हूँ।

नक़ल करने का अर्थ है किसी कि रचना को उठा कर अपने तरीके से कर देन। सब तो बैठे-बिठाये मिल गया, एक रचना से जुड़ीं जो महत्वपूर्ण बातें है वो तो आपने की ही नहीं तो आप सच्चे रचनाकार कहाँ हुआ, आप एक तरह से अच्छे प्रबंधक, संपादक कहे जा सकते है पर रचनाकार नहीं। मै यहाँ लेखन के क्षेत्र से उदाहरण दूंगा जो दूसरे पेशों पर भी लागू होतें है, अधिकतर लोकप्रिय रचनाओ  कि बेशर्मी से चोरी की जाती है क्योकि लेखक और प्रकाशक सोचते है कि ऐसा करना एक सुरक्षित निवेश का निर्णय है क्योकि दूसरे देशो के पाठक वैसी कहानियों को सराह चुके है तो यहाँ भी उनकी स्वीकृति की गुंजाइश बढ़ जाती है। एक गलत धारणा ये भी रहती है मन मे की इतनी बड़ी दुनिया मे हर तरह की चीज़ लिखी जा चुकी है, की जा चुकी है  तो अब कुछ भी नया या ओरिजनल नहीं बनाया जा सकता।

आप अगर गौर करें तो हर किताब, फिल्म में घटनाओं का क्रम, कहानी का फ्लो आदि अलग रहता है और कुछ संवाद, घटना अलग रहती है पर मुख्य कहानी का आईडिया नक़ल रहता है, अगर इतनी ही मजबूरी और दबाव है हमे एक फिल्म में कुछ अलग सीन्स और संवाद की जगह पूरी फिल्म को नए संवाद और अलग सीन्स देने की कोशिश करनी चाहिए और कहानी को छोटी-छोटी इकाइयों मे बांट कर देखना चाहिए की वो कुछ नयी और अलग लग रही है या नहीं।

अब देता हूँ कॉपी या नक़ल पर अपना निष्कर्ष, बात नया काम करने कि तो बाद में आती है पर आपका काम और कहानी में वर्णित घटनाएँ अब तक आयीं रचनाओं से अलग तो हों, पाठको को लगे तो सही की आपने मेहनत कि है। अगर आपकी कहानी पढ़ते हुए दिमाग में कोई विदेशी कॉमिक, किताब, सीरियल, फिल्म आ जाए तो ये बेशर्मी से की गयी नक़ल है।  आप सुरक्षित खेल रहे हो (और अपना समय, धन बचाना चाहते हो) पर लम्बे समय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने के लिए अपने अलग पहचान चिन्ह होना ज़रूरी है, कुछ लोग तो हद ही कर देते है जो ओरिजिनल कहानी का क्रम तक ज्यूं का त्यूं रखते है। ये बहाना देना कि अलग कहानियों को पाठक पसंद नहीं करेंगे तो यह आपकी भूल है, विश्व में कई ऐसे प्रकाशक है जो लगातार अलग काम कर रहे है और सफल है। 

ये एक बहुत बड़ी चोरी है पर विडंबना यह है कि इस अपराध की कोई सज़ा नहीं है, और जिस देश में बड़ी सज़ा वाले अपराधो की संख्या इतनी अधिक है उसमे बिना सज़ा वाले अपराध की क्या औकात होगी? नए वाकये, लोग, बातें यहीं हमारे सामने है बस उन्हें महसूस कर पहचानने की ज़रुरत है। पेशेवर लेखकों, कवियों पर अगले लेख में प्रकाश डालूँगा अभी शौकिया चोरों की हरकतें देखते है। इंटरनेट की अनंत दुनिया का फायदा उठा कर कुछ लोग बड़ी शान से दूसरो के काम को अपना नाम दे देते है (कभी कबार अपने दोस्तों का ध्यान आकर्षित करने के लिए कुछ लोग ऐसा करते है और कभी-कभी ऐसा करना चल जाता है पर लगातार हर दूसरे-तीसरे दिन आदतवश  नहीं), फिर ये आदत बन जाती है, ज़रा सी तारीफ़ के लिए झूठे दावे किये जाते है और नक़ल का स्तर बढ़ जाता है। धीरे-धीरे इनके बिना कुछ किये इनके हजारो-लाखों प्रशंषक बन जाते है और तब ये लोग पीछे न हटने वाली स्थिति में आ जाते है। और जिन कलाकारों का काम चोरी किया जाता है वो नेट के किन्ही छोटे से कोनो में लोगो कि प्रतिक्रिया के लिए तरसते रह जाते है। आप अपना समय और मेहनत किसी और काम में लगा सकते है। 1-2 साल बाद कोई महान हस्ती आपकी इस नक़ल कि समीक्षा नहीं करने वाली, कोई विकिपीडिया पेज नहीं बनने वाला आपका ऐसा करके। तो यही निवेदन है की आज आज से ही नक़ल को तौबा कीजिये क्योकि अपने देश में पहले से ही बहुत से फ्री की खाने वाले प्रीतम, बप्पी लहरी जैसे लोगो की फ़ौज पड़ी है।
.............क्रमशः

- मोहित शर्मा (ट्रेंडी बाबा)

Friday, March 8, 2013

Not a Potential Rapist!!!

Apne kuch jigri doston (naam nahi likhunga) se khul kar baaten kar pata hun. Halaki, ab Lucknow chhut gaya to ye cheez miss karunga. Unhi khaas dosto mey se ek k saath baitha tha mai last month.

Dost - "Ye heading padh, likha hai...every man is a potential rapist..."

Mohit - "Nahi!!! Maafi sarkaar maafi de do mujhe.....yaar yahan to baksh de TV, Internet, Akhbar, Society...sab jagah blame karoge to kisi din bina crime kiye in blames ka hawala dekar jail mey guilty feel karta hua life kaatunga..."

Dost - "Kaisi Life Inspector Vinay??? Fansi milni chahiye tujhe..."

Mohit - "To tu bhi marega soch lo....ya phir OMG aaj pata chala mera dost mard nahi hai...ha ha ha...medical report k baad jail ka doctor kahega...jaa Shikhandi ji le apni zindagi...."

Dost - "Achchha ek baat bata teri favorite actress, athletes kaun hai....matlab skip a beat...wonder woman type..."

Mohit - "Aajkal to Esha Gupta achchhi lag rahi hai, sports mey Ana Ivanovic...aur bhi hai kuch....kyu?"

Dost - "Achchha imagine kar....tu kahin ka raja hai, tu matlab us desh ka supreme hai tujhe koi darr nahi hai, kuch bhi kar....koi nahi pakadega tujhe...tab tujhe sunsaan sadak par koi Ana Ivanovic ya Esha Gupta jaisi ladki mil jaaye..."

Mohit - "C grade horny movie ka hero bana de mujhe kaminey...."

Dost - "Sun to....khuli chhut hai...koi darr nahi, bandish nahi...kya tu us ladki ka rape karega?"

Mohit - "Nahi...koi chance hi nahi hai."

Dost - "Bhai ko khush karne ko mat bol sach bata....mujhse sach bol sakta hai Bhai...chal tu nashe mey hai...dimaag mannd ho gaya hai kuch der k liye...tab karega uska rape?"

Mai darr gaya ye sochkar, kya karunga mai tab? Kya mai rape kar dunga us ladki ka? Maine pehli baar khud ko kisi aur vyakti k angle se rape karte dekha...us ek second mey hi mai bas kya bataun...hil gaya...

Mohit - "Bhai..maan li teri baaten ki mai raja hun, mujhe koi darr nahi, mai supreme hun, koi saza nahi hone waali mujhe, mera dimaag mand pad gaya hai....par jab wo ladki chillayegi, royegi na to mere haathon ki pakad apne aap dheeli pad jaayegi....aage kuch nahi karega tera bhai....ye antar hota hai mard aur jaanvar mey..."

Dost khush hokar gale lag gaya.

Dost - "Mohit Bhai dil khush kar diya...mai yahi test kar raha tha..."

So, ye hai mera conclusion.....

"Mana India mey 1-2 Australia ki population jitne dooshit mansikta waale purush hai par unke liye 4-5 Russia ki population jitne sahi purusho par gaaj kyu? Kyoki jab laws banti hai to unke ghere mey kai nirdosh bhi pis jaate hai. Ye kaisi victim mentality hai ki doosre group (is case mey gender) k har bande ko criminal bata do. Majority of men would never rape anyone. Men don't just rape people because they feel horny, it's not that basic. Most can resist the lust they have....many men can see what they are doing is wrong. Can I be swayed by my anger and turned into a murderer? Nope. People can't just be "swayed" by emotions and turned into something they weren't already.

Don't trust the secondary info sources to the level that they brainwash you...understand other aspects related to the matter and VERIFY!!!.....Every man has the ability to rape, but so what? If a man has the ability to rape, would you call him a 'potential rapist'? Every woman has the ability to kill a baby, does that mean every woman is a potential child killer? Everyone (except disabled people) has the ability to kill, does that make everyone a potential serial killer?....Every human being has the potential to be anything. Rape is not an act of lust nor is it gender specific. Rape is an act of power and violence. Women rape fellow humans every day. Yes, I mean actual sexual assault kind of rape. Men are just more associated with rape because, as a group, they tend to be more physically violent than women."
- Mohit Sharma (Trendster)

Sunday, September 30, 2012

Public Service Announcement *Naming Your Baby*


 *****Public Service Announcement*****



Internet par dependent hoti duniya mey...Apne bachcho k ya apne near-dear ones k bachcho k naam unique rakhen. Common name aur surname k saath aapka bachcha agar celebrity nahi banta tab tak us "common" name k hazaro-lakho log usko duniya k liye invisible rakhenge. Agar aapka surname unique hai like "Satrona", "Rambujh", "Aritra" tab aapko kaafi edge milegi. Unique naam na hone k kuch ghaate.

*) - Bina kuch kiye, bina kisi mehnat k apne naam k search results mey besharmi se top pages gher lene ki advantage aapke bachche ko nahi milegi. Jo unique naam waale besharm balak-balikaon ko milti hai...he he..

*) - There are 1398 professionals by falana COMMON NAME on linkedin...le lo kaddu. :p

*) - Aapke bachche ko national level award milna aur kisi unique combination waale naam like "Adars Kukku" ka internet k kisi chhote kone mey 8 lines likhna barabar asar karega google aur baaki search engines par. Swaahaa! :p

*) - Approximately 976000000 search results with this name on google with your bachche k works, profiles nowhere in top 736 pages. 

*) - Kaam aapka bachcha karega aur aksar log usko kisi social media par zyada active rehne waale bando se confuse kar jaayenge jinka naam same hai.

*) - Duniya ki to chhodiye ye bhi possibility hai ki aapke bachche ki class mey hi usko uske naam k 5-7 bande mil jaaye. 

Peon - "Madam ji, Rahul k parents aaye hai."

Teacher - "Kiske? Rahul Gupta, Rahul Sharma, Rahul Garg ya Rahul Yadav...."

*) - Domain names aur kai websites ki profiles mey aapke bachche ko uske naam ka domain nahi milega balki itni population aur competition ki wajah se chahe wo hash laga le, underscore laga le, dot laga le...sadak par nanga dance kar le....sabka combination laga le...kuch nahi milne ka...end mey kuch aesa milega - WWW.Ramesh27985491_sharma.638.COM

- Mohit Sharma (Trendster / Trendy Baba)

Help > Ideology!


 

Namastey!

I am here with an important universal message. :)

Passionately following an ideology is usually a great thing but I see people restricting themselves (& others in their group) helping other people who fall under certain groups (due to reasons beyond their control), because their ideology doesn’t allow them to help ‘such people’. They give excuses that we are already helping oppressed people or working for equilibrium....and the given person belongs to privileged, oppressor group…firstly, be flexible, nothing is absolute a person can be from poor General category family...you work for betterment of Palestine but there are few social issues in Israel too.…a male can be victim of domestic violence by his wife or false accusations of rape, dowry, molestation…custodial rights…"poor people are dying why should we help animals?" Oh Really?..tell me how many "dying or poor people" you helped/saved...you work for yourself and just gave a dirty excuse to save your thing...there are many such examples where people in need never get help due to such generalization, stereotype theories…just be flexible and open for every possibility God throws at you....

......and generally, the word HELP (for a good cause) is always above any ideology!

I request everyone to spread the message if they agree. Thank you!

- Mohit Sharma (Trendy Baba)