...is "Celebrating (un)Common Creativity!" Fan fiction, artworks, extreme genres & smashing the formal "Fourth wall"...Join the revolution!!! - Mohit Trendster

Thursday, July 25, 2013

Freelance Talents Championship (2013-14) Top 8 Authors

Inaugural Freelance Talents Championship 2013-14 towards its conclusion. Whos your favorite(s)?


Tuesday, June 25, 2013

देश की कमज़ोर दूर की नज़र




बसे पहले तो उत्तराखंड त्रासदी में निस्वार्थ और निरंतर लगे सेना के जवानों, अर्धसैनिक बलो और जुडी एजेंसियों को नमन और धन्यवाद। अब मुद्दे पर आते है।

देश में आम लोगो की एक ख़ास आदत है। किसी आपदा, या राष्ट्रीय सुर्खियों में आयी घटना, अपराध  से हर चीज़ अतार्किक रूप से जोड़कर देखी जाने लगती है तब तक जब तक कोई अलग, नयी घटना उन सुर्ख़ियों में ना आ जाये। अक्सर ऐसे मामलो मे पता चलता है की जनता के एक बड़े हिस्से की दूर की नज़र कमज़ोर है। हाँ ये दुर्भाग्यपूर्ण है की एक त्रासदी घटी पर उसके कारको को हटाने पर काम की बजाये दोषारोपण, हर बात मे उस दुखद घटना को घुसा देना कितना सही है?

जैसे एक कॉमिक फैन ने बाइस हज़ार की कॉमिक्स खरीदी तो उसे ऑनलाइन ये नसीहतें/ताने दिये गये की उत्तराखंड त्रासदी मे दान करना चाहिये था। क्या जो कलाकार अपने घरों से इतनी दूर आकर मेहनत कर रहे है उन्हें और उनके परिवारों को जीने के लिए पैसो की ज़रुरत नहीं? उस त्रासदी के अलावा कहीं कश्मीर मे जवानों के काफिले पर आतंकी हमले में 8 जवान मारे गए और कुछ घायल हुए ...इसी तरह और छोटी-बड़ी दुखद घटनायें हुयी .....क्या उन घटनाओ के पीड़ितों को मदद की ज़रुरत नहीं? बिल्कुल है पर आपको तो महीनो एक घटना के तले जो काटने की आदत है। 

देश एक मशीन की तरह है जिसकी इकाइयाँ अपने क्षेत्र के काम करने में माहिर है, सब रुक कर एक दिशा मे जायेंगे तो देश रुक जाएगा जिस से और अधिक पीड़ित होंगे। वैसे कहने वाले कह बड़ी आसानी से देते है पर अगर देखा जाए तो उस दिशा में सबसे कम योगदान ऐसे ही लोगो का होता है। प्रकृति पर किसी का बस नहीं चलता पर खुद को व्यतिगत रूप से बदलकर अपने आस-पास के समाज को बदलने की कोशिश कीजिये, सही लोक उम्मीदवार चुनिए। इस से ज्यादा करना चाहते है तो पहले उस स्तर तक पहुँचिये जहाँ से लोगो की मदद कर पायें आप। नीचे से कोसना या बंदर घुड़की देना कुछ न करने के समान है।

- Mohit

Friday, June 7, 2013

Baali (Aryan Creations) Promo


Art - Harish A. Thakur


प्रकृति भी अपने नियमो में खुद को बाँधे रखती है। वो अपना प्रारूप बदलती है पर मानव की तरह अपने स्वार्थ साधने के लिये नहीं जिसको लाभ दिखाई देने पर नैतिकता दिखनी बंद हो जाती है, जो अपने मित्र, संबंधी को स्वार्थ के तराज़ू में तोलता है और उनसे लाभ न दिखने पर निकटता समाप्त कर देता है अथवा निकटता का नाटक करता है। जहाँ तक ऐसा मानव देख पाता है या सोचता है स्वार्थ प्रेरित कर्म उसको अपने जीवन के लिए लाभकारी प्रतीत होते है पर यही भ्रमित होकर पथभ्रष्ट होने का प्राथमिक चरण है।

धर्मपरायण जनता ईश्वर से त्राहीमाम करती कहती है की धर्म, सत्य की राह इतनी विकट क्यों है? इसका उत्तर सीधा सा है ईश्वर सत्य की राह पर चलने वाले अनेको में कुछ व्यक्तियों की परीक्षा लेते है की वो इतने सक्षम है जो कलियुग मे हर और फैले अधर्म से युद्ध कर उसे हरा पायें ....अगर कुछ परीक्षाओ बाद भी व्यक्ति सफल नहीं होता तो ईश्वर उसको या तो मूक जनता का सदस्य बना देते है जो चुप सब देखती है या वो समय के साथ अपना चरित्र खोकर अधर्म का अंग बन जाता है।

जब बाली अधर्म के साथ था तो वो शक्तिशाली था और अंतिम समय तक उसको अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ा। पर इस युग में जब वो धर्म और सत्य के साथ है तो भगवान ने उसकी और उसके चरित्र की परीक्षा के लिये उसको कई सीमाओ में बाँध दिया ....बाली प्रभु की
परीक्षा देगा ....सीमान्त तक संघर्ष करेगा।


- Mohit 

Sunday, April 28, 2013

नकलची समाज (भाग - 2)

नक़ल आज के दौर में विकराल रूप ले चुकी है, समाज में इतनी रच बस चुकी है कि अब इसे लोगो ने स्वीकार कर लिया है। किसी को बताया जाए कि भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए भेजी गयी एंट्री "बर्फी" में 3 दर्जन से अधिक फिल्मो के दृश्य जस के तस दिखाए गए थे दूसरे कलाकारों पर फिल्माने के बाद तो वो कहता है की कोई बात नहीं हमे तो मज़ा आने से मतलब है और इस्सी मानसिकता का फायदा फिल्मो, लेखन में ही नहीं विभिन्न माध्यमो पर लोग उठाते है। मै चौंक जाता हूँ की खुले आम नक़ल के बाद लोग प्रमोशंस, साक्षात्कार, आदि के दौरान इतने आत्मविश्वास से कैसे कह लेते है कि ये एक अलग काम है, हटकर है।

संयोग से कहानी का कुछ हिस्सा कहीं पहले लिखी रचना से मिल जाना कोई बड़ी बात नहीं, ऐसे केसों में रचनाओ को देख कर पता चल जाता है की ये संयोग है कॉपी नहीं, और ऐसी रचनाओं से मुझे कोई आपत्ति नहीं है, ये रचनाएँ खुद मे नयी और अलग है। मेरी कुछ रचनाएँ ऐसे सामाजिक मुद्दों पर लिखी गयी थी जिन मुद्दों पर आगे चलकर कुछ सालो बाद फ़िल्में, नाटक, आदि बने जो बहुत से लोगो तक पहुंचे पर मेरी रचनाएँ संयोग से उन मुद्दों पर होते हुए भी काफी अलग थी। कई लेखक या कवियों से मिला हूँ और काफी बातें की है। वो अक्सर बाहरी देशो की तरफ देखते है, विदेशी फ़िल्में, कॉमिक्स, गेम्स, किताबें, विडियोज़ देखने मे अपना काफी समय व्यतीत करते है। फिर उनके अनुसार ही अपनी रचनाएँ बनाते है।

जनता की मांग का हवाला देकर प्रकाशक ऐसा करते है। पर एक समय मे अगर बड़े प्रकाशक नया काम छापें तो लोगो के पास वही ऑप्शन होते है। कुछ पेशेवर लेखक या कवि कहते है उन्हें उनका परिवार पालना है इसलिए सीधी चोरी करते है पर जब आपमें क्षमता ही नहीं थी तो लेखन मे आये ही क्यों? नक़ल बस एक शॉर्टकट है नया, अलग काम करने मे समय लगता है जबकि कहीं से उठाया गया कांसेप्ट जल्दी पूरा हो जाता है, इस वजह से एक लेखक अगर नक़ल से साल मे 10-15 या ज्यादा किताबें पूरी कर पायेगा वहीँ बिना नक़ल किये अपनी क्षमता से वो 5-10 किताबें लिख पायेगा। पर अगर वो दूसरे माध्यमो पर से अपनी निर्भरता हटाये और मेहनत करे तो ये संख्या बढ़ सकती है, दुर्भाग्यवश ऐसा करते ना के बराबर लोग है।

कई लेखकों का भाग्य अच्छा है की जहाँ से वो अपना काम उठाते है वो मेटर आम जनता (जहाँ उनका काम बिकता है) में इतना लोकप्रिय नहीं है और उनकी गाडी सालो तक चलती रहती है। लोग कहते है कि वो महान है तभी तो इतने साल काम किया जबकि इतने सालो मे "असली" काम साहब ने गाहे-बगाहे मूड बदलने को किया होगा। चलिए पैसे और परिवार चलाने जैसे इमोशनल चोचले मान भी लें तो जिस कांफिडेंस के साथ कुछ बड़े, "अनुभवी" लेखक चोरी करने के बाद हज़रो-लाखो लोगों द्वारा अपना अभिनंदन, तारीफ़ स्वीकार करते है तो घृणा होती है इनसे। चलो काम का प्रोमोशन कर लो, अपना काम बेच लो पर जिस से चुराया है उसके सम्मान में कम से कम अपना कुत्ते की तरह प्रोमोशन तो मत करो हो सके तो असल सोर्स लिख दो काम की (ये तो करना यहाँ निषिद्ध मानते है लोग)। कहावत है की सच्चाई, कल्पना से अधिक अजीब होती है .....असल समाज से प्रेरणा लो, सच्चाई से कल्पना बनाओ, अनछुई बातें और पैटर्न ढूँढो, नए काल्पनिक समीकरण बनाओ। अगर प्रकाशक का आप पर इतना प्रेशर है तो उसके हिसाब से काम कर दो पर बीच में "अपना" काम भी दिखाओ .....अगर ऐसा नहीं कर सकते तो खुद को कलाकार, रचनाकार मत कहो। शायद यही कारण है जो मुझे ऐसे कलाकार बहुत कम मिलते है जिन्हें अपनी कला से प्रेम हो और जो अपनी कला के प्रति इमानदार हों। मेरा निवेदन है पाठको, दर्शको यानी आम लोगो से कि कला को प्रोत्साहन दीजिये पर चोरी को नहीं क्योकि कहीं न कहीं आपका प्रोत्साहन और खर्च किया हुआ पैसा ही है जो कलाकारों को चोरी की लथ लगवा देता है।

- Mohit Sharma ( Trendster)

Wednesday, April 24, 2013

नकलची समाज (भाग - 1)

नकलची समाज (भाग - 1)



रचनात्मक कार्यो में मुझे नक़ल से सख्त नफरत है और ये बात मैंने पहले भी अपनी रचनाओ, लेखों में रखी है। मेरे कुछ अच्छे दोस्तों ने मुझसे कहा कि उन्हें नक़ल/चीटिंग का मतलब समझाऊँ। तो इन दो लेखों से समझाने की कोशिश करता हूँ, पहली कड़ी आज लिख रहा हूँ।

नक़ल करने का अर्थ है किसी कि रचना को उठा कर अपने तरीके से कर देन। सब तो बैठे-बिठाये मिल गया, एक रचना से जुड़ीं जो महत्वपूर्ण बातें है वो तो आपने की ही नहीं तो आप सच्चे रचनाकार कहाँ हुआ, आप एक तरह से अच्छे प्रबंधक, संपादक कहे जा सकते है पर रचनाकार नहीं। मै यहाँ लेखन के क्षेत्र से उदाहरण दूंगा जो दूसरे पेशों पर भी लागू होतें है, अधिकतर लोकप्रिय रचनाओ  कि बेशर्मी से चोरी की जाती है क्योकि लेखक और प्रकाशक सोचते है कि ऐसा करना एक सुरक्षित निवेश का निर्णय है क्योकि दूसरे देशो के पाठक वैसी कहानियों को सराह चुके है तो यहाँ भी उनकी स्वीकृति की गुंजाइश बढ़ जाती है। एक गलत धारणा ये भी रहती है मन मे की इतनी बड़ी दुनिया मे हर तरह की चीज़ लिखी जा चुकी है, की जा चुकी है  तो अब कुछ भी नया या ओरिजनल नहीं बनाया जा सकता।

आप अगर गौर करें तो हर किताब, फिल्म में घटनाओं का क्रम, कहानी का फ्लो आदि अलग रहता है और कुछ संवाद, घटना अलग रहती है पर मुख्य कहानी का आईडिया नक़ल रहता है, अगर इतनी ही मजबूरी और दबाव है हमे एक फिल्म में कुछ अलग सीन्स और संवाद की जगह पूरी फिल्म को नए संवाद और अलग सीन्स देने की कोशिश करनी चाहिए और कहानी को छोटी-छोटी इकाइयों मे बांट कर देखना चाहिए की वो कुछ नयी और अलग लग रही है या नहीं।

अब देता हूँ कॉपी या नक़ल पर अपना निष्कर्ष, बात नया काम करने कि तो बाद में आती है पर आपका काम और कहानी में वर्णित घटनाएँ अब तक आयीं रचनाओं से अलग तो हों, पाठको को लगे तो सही की आपने मेहनत कि है। अगर आपकी कहानी पढ़ते हुए दिमाग में कोई विदेशी कॉमिक, किताब, सीरियल, फिल्म आ जाए तो ये बेशर्मी से की गयी नक़ल है।  आप सुरक्षित खेल रहे हो (और अपना समय, धन बचाना चाहते हो) पर लम्बे समय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने के लिए अपने अलग पहचान चिन्ह होना ज़रूरी है, कुछ लोग तो हद ही कर देते है जो ओरिजिनल कहानी का क्रम तक ज्यूं का त्यूं रखते है। ये बहाना देना कि अलग कहानियों को पाठक पसंद नहीं करेंगे तो यह आपकी भूल है, विश्व में कई ऐसे प्रकाशक है जो लगातार अलग काम कर रहे है और सफल है। 

ये एक बहुत बड़ी चोरी है पर विडंबना यह है कि इस अपराध की कोई सज़ा नहीं है, और जिस देश में बड़ी सज़ा वाले अपराधो की संख्या इतनी अधिक है उसमे बिना सज़ा वाले अपराध की क्या औकात होगी? नए वाकये, लोग, बातें यहीं हमारे सामने है बस उन्हें महसूस कर पहचानने की ज़रुरत है। पेशेवर लेखकों, कवियों पर अगले लेख में प्रकाश डालूँगा अभी शौकिया चोरों की हरकतें देखते है। इंटरनेट की अनंत दुनिया का फायदा उठा कर कुछ लोग बड़ी शान से दूसरो के काम को अपना नाम दे देते है (कभी कबार अपने दोस्तों का ध्यान आकर्षित करने के लिए कुछ लोग ऐसा करते है और कभी-कभी ऐसा करना चल जाता है पर लगातार हर दूसरे-तीसरे दिन आदतवश  नहीं), फिर ये आदत बन जाती है, ज़रा सी तारीफ़ के लिए झूठे दावे किये जाते है और नक़ल का स्तर बढ़ जाता है। धीरे-धीरे इनके बिना कुछ किये इनके हजारो-लाखों प्रशंषक बन जाते है और तब ये लोग पीछे न हटने वाली स्थिति में आ जाते है। और जिन कलाकारों का काम चोरी किया जाता है वो नेट के किन्ही छोटे से कोनो में लोगो कि प्रतिक्रिया के लिए तरसते रह जाते है। आप अपना समय और मेहनत किसी और काम में लगा सकते है। 1-2 साल बाद कोई महान हस्ती आपकी इस नक़ल कि समीक्षा नहीं करने वाली, कोई विकिपीडिया पेज नहीं बनने वाला आपका ऐसा करके। तो यही निवेदन है की आज आज से ही नक़ल को तौबा कीजिये क्योकि अपने देश में पहले से ही बहुत से फ्री की खाने वाले प्रीतम, बप्पी लहरी जैसे लोगो की फ़ौज पड़ी है।
.............क्रमशः

- मोहित शर्मा (ट्रेंडी बाबा)

Thursday, March 28, 2013

Chor ka Logic!!!


....Filmy Clicheness, Jo wakai mein chor NAHI hota wo bhi to ye hi bolega Uncle ki "Mai Chor NAHI hun..."
 "Maine Chori Nahi ki..."
 "Chup! Har chor ye hi bolta hai..."
"To jo chor nahi hai wo bhi to wo kya bolega?....Mai Tumhare bachche ki maa banne waali hun!!!"
- Mohit Sharma (Trendster / Trendy Baba) 

Wednesday, March 27, 2013

Meri Bhaang Wali Ice Cream !!!! (Poem, 18+)


Masti mey ye rhyming ki hai hip hop style with naughty punches. Aap sabhi ko ek baar phir se Happy Holi!!! Just for fun...



Meri Bhaang Wali Ice Cream !!!!

Aetbaar karegi to jaanegi….
Labo se lagayegi to baat maanegi…
Dil bolega tring-tring….jo legi tu..
Meri Bhaang waali Ice Cream !!!!

Pila deta hai ye saaki bade auhdo tak ko paani….
Ek to fitting ka salwar-suit tera…
Aur doosra qatil tera dupatta Dhaani…
Ban jaa janeman mere naatiyon ki Nani…
Nikalva degi teri multiple Screams…
Meri Bhaang waali Ice Cream !!!!

Festive season ki chhut mujhe bhunani…
Point Blank range se apni pichkari hai chalani…
Free ki nahi hai ye Ice Cream…teri haath ki ghujiya hai khaani….
Itne nakhre sehat kharab kar denge meri Rani....
Kar degi tera har signal Green...
Meri Bhaang waali Ice Cream !!!!

Uncle nahi hai ghar pe…
Nashe mey apna ghar samajh ke abhi unhe aadhe ghante peeche ke gharo ki kundi hai khatkhatani...
Anyway, phir bhi chhupa di hai maine unki bandook Dunali…
Ab ye teri zimmedari hai…..tumhe sirf Aunty hai sulaani…
Kab samjhogi bada ho gaya hai….teri colony ka Chhota Bheem….le na..
Meri Bhaang waali Ice Cream !!!!

Gum ho jaayegi teri double chin…
Mera Intezaar karegi taare gin-gin…
Phir chahe jab bhi milegi…gaal par haath phira kar bolegi…”How have you been?”
Jamegi apni tagdi tag team…
Bhaang ki kick better than vodka-desi-rum ya jin….
Ghoomayegi muft mey tujhe London se Chin…
Charsi ho gaya tere pehlu ke bin…
Mat kar mera dil tod ke sin…
Jaldi muh mey le…arre, ab to pakad…pighalne lagi hai…
Meri Bhaang Waali Ice Cream !!!!

- Mohit Sharma (Trendy Baba)